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निलंबन के दौरान नहीं किया जा सकता स् थानांतरण
Updated Sun, 15 Jul 2018 12:30 AM IST
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निलंबन के दौरान नहीं किया जा सकता स्थानांतरण
0 दो सबइंस्पेक्टरों के तबादले पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के निलंबन के दौरान उसका स्थानांतरण नहीं किया जा सकता है। ऐसा किया जाना कठोर दंड देने के समान और मनमाना कार्य है। कोर्ट ने इस आदेश के साथ गोरखपुर में तैनात दो उपनिरीक्षकों लाल बहादुर शर्मा और देवेंद्र कुमार के स्थानांतरण का आदेश रद्द कर दिया है। उपनिरीक्षकों की याचिका पर न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र ने सुनवाई की।
याचीगण के अधिवक्ता विजय गौतम का कहना था कि दोनों एसआई पीपीगंज थाना गोरखपुर में तैनात थे। इसी दौरान इनके खिलाफ रंजना निषाद ने फर्जी मुकदमा दर्ज कराया, जिस पर दोनों को निलंबित कर दिया गया। निलंबन आदेश 22 जून 2018 को जारी हुआ। इससे पूर्व 16 जून 2018 को इनका स्थानांतरण क्रमश: कन्नौज और ललितपुर के लिए कर दिया गया। 24 जून 2018 को दोनों को रिलीव कर दिया गया।
अधिवक्ता का कहना था कि याचीगण को स्थानांतरण की जानकारी निलंबित होने के बाद मिली और उनको कार्यमुक्त करने का आदेश भी निलंबन के बाद मिला है, इसलिए स्थानांतरण आदेश अवैध है। प्रदेश सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि निलंबन से पूर्व स्थानांतरण हो चुका था, इसलिए स्थानांतरण आदेश में कोई गलती नहीं है। कोर्ट ने साधना गुप्ता बनाम राज्य सरकार और जितेंद्र कुमार बनाम राज्य सरकार के केस में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए पूर्व के निर्णयों के आलोक में कहा कि निलंबन के दौरान स्थानांतरण करना अनुचित है और यह काफी कठोर दंड देने जैसा कार्य है। याचीगण को निलंबन के बाद कार्यमुक्त किया गया और तभी स्थानांतरण का पता चला, इसलिए स्थानांतरण आदेश अवैध है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए स्थानांतरण आदेश रद्द कर दिया है।
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निलंबन के दौरान नहीं किया जा सकता स्थानांतरण
0 दो सबइंस्पेक्टरों के तबादले पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के निलंबन के दौरान उसका स्थानांतरण नहीं किया जा सकता है। ऐसा किया जाना कठोर दंड देने के समान और मनमाना कार्य है। कोर्ट ने इस आदेश के साथ गोरखपुर में तैनात दो उपनिरीक्षकों लाल बहादुर शर्मा और देवेंद्र कुमार के स्थानांतरण का आदेश रद्द कर दिया है। उपनिरीक्षकों की याचिका पर न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र ने सुनवाई की।
याचीगण के अधिवक्ता विजय गौतम का कहना था कि दोनों एसआई पीपीगंज थाना गोरखपुर में तैनात थे। इसी दौरान इनके खिलाफ रंजना निषाद ने फर्जी मुकदमा दर्ज कराया, जिस पर दोनों को निलंबित कर दिया गया। निलंबन आदेश 22 जून 2018 को जारी हुआ। इससे पूर्व 16 जून 2018 को इनका स्थानांतरण क्रमश: कन्नौज और ललितपुर के लिए कर दिया गया। 24 जून 2018 को दोनों को रिलीव कर दिया गया।
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अधिवक्ता का कहना था कि याचीगण को स्थानांतरण की जानकारी निलंबित होने के बाद मिली और उनको कार्यमुक्त करने का आदेश भी निलंबन के बाद मिला है, इसलिए स्थानांतरण आदेश अवैध है। प्रदेश सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि निलंबन से पूर्व स्थानांतरण हो चुका था, इसलिए स्थानांतरण आदेश में कोई गलती नहीं है। कोर्ट ने साधना गुप्ता बनाम राज्य सरकार और जितेंद्र कुमार बनाम राज्य सरकार के केस में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए पूर्व के निर्णयों के आलोक में कहा कि निलंबन के दौरान स्थानांतरण करना अनुचित है और यह काफी कठोर दंड देने जैसा कार्य है। याचीगण को निलंबन के बाद कार्यमुक्त किया गया और तभी स्थानांतरण का पता चला, इसलिए स्थानांतरण आदेश अवैध है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए स्थानांतरण आदेश रद्द कर दिया है।
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