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इविवि की लाइब्रेरी में किताबों की हालत खराब
Updated Fri, 25 May 2018 01:09 AM IST
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इविवि की लाइब्रेरी में किताबों की हालत खराब
0 एक दशक से रिवाइज नहीं हुआ स्नातक का पाठ्यक्रम
0 यूजीसी की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में गिनाईं हैं कई खामियां
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
पिछले साल नवंबर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में परफॉर्मेंस ऑडिट के लिए आई विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की पांच सदस्यीय टीम ने विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कमेटी की ओर रिपोर्ट के अनुसार सेंट्रल लाइब्रेरी में सात लाख 31 हजार 589 किताबों और बाउंड जर्नल्स का संकलन है लेकिन, रखरखाव ठीक न होने से किताबों की हालत काफी खराब है।
देश से सबसे पुराने पुस्तकालयों में एक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय की इस हालत पर कमेटी ने चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान लाइब्रेरी की बिल्डिंग चार दशक पुरानी है और इसके नवीनीकरण की जरूरत है। इसके अलावा विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय में लाइब्रेरी की अलग से कोई बिल्डिंग नहीं है। विज्ञान संकाय के छोटे कमरों में किताबें अस्त-व्यस्त तरीके से रखी जाती हैं। ऐसे में शिक्षकों और छात्र-छात्राओं को लाइब्रेरी की सुविधा ठीक से नहीं मिल रही है। उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई है कि एक दशक से अधिक समय से विश्वविद्यालय में स्नातक का पाठ्यक्रम रिवाइज नहीं हुआ है और छात्र-छात्राओं को पुराना पाठ्यक्रम पढ़ना पड़ रहा है।
इसके अलावा प्रयोगशालाओं में कैमिकल्स की कमी है। ऐसे में छात्र-छात्राओं को प्रैक्टिकल करने में दिक्कत झेलनी पड़ रही है। किसी भी विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। इसके अलावा इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर रिसर्च पब्लिकेशन की लिस्ट वर्ष 2014 से अपडेट नहीं हुई है। पर्याप्त संख्या में गुणवत्ता परक रिसर्च का पब्लिकेशन भी नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय में रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए कोई अभिलेखीय योजना भी तैयार नहीं की गई है। इसके अलाव जो छात्र जेआरएफ-नेट क्वालीफाई हैं, उनका भी पंजीकरण पीएचडी के लिए नहीं किया जा रहा है। उनको दो साल की फेलोशिप से वंचित किया जा रहा है।
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छात्रों और इविवि प्रशासन के बीच संवादहीनता
- यूजीसी की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में विद्यार्थियों और इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच संवादहीनता का मुद्दा भी उठाया है। साथ ही कमेटी ने विश्वविद्यालय प्रशासन की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठाए हैं।
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0 एक दशक से रिवाइज नहीं हुआ स्नातक का पाठ्यक्रम
0 यूजीसी की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में गिनाईं हैं कई खामियां
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
पिछले साल नवंबर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में परफॉर्मेंस ऑडिट के लिए आई विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की पांच सदस्यीय टीम ने विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कमेटी की ओर रिपोर्ट के अनुसार सेंट्रल लाइब्रेरी में सात लाख 31 हजार 589 किताबों और बाउंड जर्नल्स का संकलन है लेकिन, रखरखाव ठीक न होने से किताबों की हालत काफी खराब है।
देश से सबसे पुराने पुस्तकालयों में एक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय की इस हालत पर कमेटी ने चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान लाइब्रेरी की बिल्डिंग चार दशक पुरानी है और इसके नवीनीकरण की जरूरत है। इसके अलावा विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय में लाइब्रेरी की अलग से कोई बिल्डिंग नहीं है। विज्ञान संकाय के छोटे कमरों में किताबें अस्त-व्यस्त तरीके से रखी जाती हैं। ऐसे में शिक्षकों और छात्र-छात्राओं को लाइब्रेरी की सुविधा ठीक से नहीं मिल रही है। उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई है कि एक दशक से अधिक समय से विश्वविद्यालय में स्नातक का पाठ्यक्रम रिवाइज नहीं हुआ है और छात्र-छात्राओं को पुराना पाठ्यक्रम पढ़ना पड़ रहा है।
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इसके अलावा प्रयोगशालाओं में कैमिकल्स की कमी है। ऐसे में छात्र-छात्राओं को प्रैक्टिकल करने में दिक्कत झेलनी पड़ रही है। किसी भी विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। इसके अलावा इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर रिसर्च पब्लिकेशन की लिस्ट वर्ष 2014 से अपडेट नहीं हुई है। पर्याप्त संख्या में गुणवत्ता परक रिसर्च का पब्लिकेशन भी नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय में रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए कोई अभिलेखीय योजना भी तैयार नहीं की गई है। इसके अलाव जो छात्र जेआरएफ-नेट क्वालीफाई हैं, उनका भी पंजीकरण पीएचडी के लिए नहीं किया जा रहा है। उनको दो साल की फेलोशिप से वंचित किया जा रहा है।
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छात्रों और इविवि प्रशासन के बीच संवादहीनता
- यूजीसी की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में विद्यार्थियों और इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच संवादहीनता का मुद्दा भी उठाया है। साथ ही कमेटी ने विश्वविद्यालय प्रशासन की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठाए हैं।