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Aligarh News: जहरीली मिट्टी में भी लहलहाएगी गेहूं की फसल
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का द्वार।
खेतों में बढ़ते भारी धातु प्रदूषण, विशेषकर कैडमियम से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन पर गंभीर असर पड़ रहा है। ऐसे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोजा है, जो गेहूं की फसल को जहरीले प्रभाव से बचाने के साथ उसकी वृद्धि भी बढ़ा सकती है। कैडमियम प्रदूषण से बचाने में फायदेमंद फफूंद और जिंक ऑक्साइड नैनोकण कारगर साबित हुए हैं। इसके प्रयोग से अब जहरीली मिट्टी में भी गेहूं की फसल लहलहाएगी।
वैज्ञानिकों ने गमलों में गेहूं उगाकर विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग किए। कुछ पौधों को केवल कैडमियम के संपर्क में रखा गया, जबकि कुछ में ग्लोमस मैक्रोकार्पम, जिंक ऑक्साइड नैनोकण और दोनों का संयुक्त प्रयोग किया गया। इसके बाद पौधों की ऊंचाई, ताजा और सूखा वजन, क्लोरोफिल मात्रा, एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम गतिविधि और जड़ों व तनों में कैडमियम की मात्रा का परीक्षण किया गया।
दोनों तकनीकों के संयुक्त प्रयोग से गेहूं की वृद्धि में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। पौधों की ऊंचाई में 25.51 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई। ताजा वजन में 30.80 फीसदी बढ़ोतरी रही।जड़ों में कैडमियम की मात्रा 52.26 फीसदी कम पाई गई। तनों में कैडमियम की मात्रा 58.96 फीसदी कम रही। साथ ही पौधों में क्लोरोफिल और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटीऑक्सीडेंट एंजाइमों का स्तर भी बढ़ गया।
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किसानों को होगा फायदा
यह तकनीक प्रदूषित भूमि में भी सुरक्षित और बेहतर गेहूं उत्पादन का रास्ता खोल सकती है। इससे फसल में जहरीली धातुओं का प्रवेश कम होगा, उत्पादन बढ़ेगा और मिट्टी की गुणवत्ता भी सुधरेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ तकनीक है, जो रासायनिक उपायों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। इसका उपयोग कैडमियम से प्रभावित कृषि भूमि को सुधारने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में किया जा सकता है।
वैज्ञानिक डॉ. फरीहा रागिब, मोहम्मद इरफान निक्को, फरीद अहमद खान, लुई एमए की शोध रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंग नेचर में छपी है। विभागाध्यक्ष प्रो. अबरार अहमद खान का कहना है कि कैडमियम से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन पर गंभीर असर पड़ता है। शोध में गेहूं की फसल की वृद्धि बताई गई है।
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वैज्ञानिकों ने गमलों में गेहूं उगाकर विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग किए। कुछ पौधों को केवल कैडमियम के संपर्क में रखा गया, जबकि कुछ में ग्लोमस मैक्रोकार्पम, जिंक ऑक्साइड नैनोकण और दोनों का संयुक्त प्रयोग किया गया। इसके बाद पौधों की ऊंचाई, ताजा और सूखा वजन, क्लोरोफिल मात्रा, एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम गतिविधि और जड़ों व तनों में कैडमियम की मात्रा का परीक्षण किया गया।
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दोनों तकनीकों के संयुक्त प्रयोग से गेहूं की वृद्धि में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। पौधों की ऊंचाई में 25.51 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई। ताजा वजन में 30.80 फीसदी बढ़ोतरी रही।जड़ों में कैडमियम की मात्रा 52.26 फीसदी कम पाई गई। तनों में कैडमियम की मात्रा 58.96 फीसदी कम रही। साथ ही पौधों में क्लोरोफिल और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटीऑक्सीडेंट एंजाइमों का स्तर भी बढ़ गया।
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किसानों को होगा फायदा
यह तकनीक प्रदूषित भूमि में भी सुरक्षित और बेहतर गेहूं उत्पादन का रास्ता खोल सकती है। इससे फसल में जहरीली धातुओं का प्रवेश कम होगा, उत्पादन बढ़ेगा और मिट्टी की गुणवत्ता भी सुधरेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ तकनीक है, जो रासायनिक उपायों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। इसका उपयोग कैडमियम से प्रभावित कृषि भूमि को सुधारने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में किया जा सकता है।
वैज्ञानिक डॉ. फरीहा रागिब, मोहम्मद इरफान निक्को, फरीद अहमद खान, लुई एमए की शोध रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंग नेचर में छपी है। विभागाध्यक्ष प्रो. अबरार अहमद खान का कहना है कि कैडमियम से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन पर गंभीर असर पड़ता है। शोध में गेहूं की फसल की वृद्धि बताई गई है।