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किस पर पड़ेगी हार की मार, अब इसका इंतजार

Sun, 03 Dec 2017 01:47 AM IST
अमर उजाला, अलीगढ़
अमर उजाला, अलीगढ़ Updated Sun, 03 Dec 2017 01:47 AM IST
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What will be the defeat of the neck, now it is waiting for
अपने आवास पर कार्यकर्ताओं से वार्ता करते डा. राजीव अग्रवाल। - फोटो : अमर उजाला
कौशल कुमार ओझा
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मेयर पद पर 22 साल की बादशाहत का सत्ताधारी किला कैसे दरक गया? यह प्रश्न पार्टी के प्रति समर्पित सभी नेता व कार्यकर्ताओं के मन में हलचल मचाए हुए है। तरह-तरह के कारण गिनाए जा रहे हैं। भीतर घात करने वाले नेता इसी बहाने अपने-अपने दुश्मनों को साधने में लगे हैं। अभी तक तो कोई खुलकर किसी के खिलाफ नहीं आया है, लेकिन किसी भी तरफ से वार हुआ तो स्थिति विस्फोट होना तय माना जा रहा है। वहीं हर किसी को प्रत्याशी के रुख का इंतजार है। 

इधर, सीएम योगी आदित्यनाथ के अलीगढ़ की हार पर समीक्षा के संकेत दिए जाने के बाद हर कोई आगे पैदा होने वाली इस विस्फोटक स्थिति के अंदेशे से परेशान है। विस्फोटक स्थिति पैदा होने पर किला दरकने की गाज किसी न किसी पर गिरना भी तय माना जा रहा है। अब यह गाज किस पर गिरेगी, यह वक्त बताएगा।
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अभी तक तो हार को लेकर जितने मुंह उतनी बात हो रही हैं। वहीं प्रत्याशी राजीव अग्रवाल शुक्रवार को ही प्रशासन पर हार का आरोप लगा चुके हैं। मगर अंदरखाने विरोधी खेमा इसे कुछ बाहरी नेताओं की जिम्मेदारी बता रहा है। कह रहा है कि लोक सभा चुनाव में भाजपा से जुड़ा दलित वर्ग पार्टी सिंबल और बसपा से आए ठा. जयवीर सिंह के विरोध में लामबंद हुआ। वहीं अंतरकलह पर भी जोर दिया जा रहा है। अंदरखाने सभी शांत हैं और कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। पार्टी नियम की बात करें तो प्रत्याशी अगर किसी के खिलाफ लिखकर देगा तो उस पर भी सोच विचार कर निर्णय होगा।
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     मगर दूसरी ओर लोग यह भी कह    रहे हैं कि लोक सभा चुनाव आ रहे हैं, इसलिए पार्टी किसी झमेले से बचने के लिए सबको साधने की कोशिश करेगी।

अंदरखाने की प्रमुख वजहें 
फुरकान के कुर्ते ने पैदा किया भाजपा के खिलाफ करंट  

चुनाव के कुछ दिन पहले डीएस कॉलेज में एक टीवी चैनल का कार्यक्रम हुआ था। इसमें हुए हंगामे व झड़प में बसपा प्रत्याशी मो. फुरकान का कुर्ता तक फट गया था। राजनीति के जानकार लोग इस घटना को भाजपा के खिलाफ टर्निंग प्वाइंट के रूप में देख रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि इस हरकत से मुस्लिम एवं दलित बसपा प्रत्याशी के पक्ष में मजबूती से गोलबंद हुए। लोगों का यह भी कहना है कि इस घटना के पहले देहली गेट क्षेत्र में एक दलित महिला की दुकान को लेकर भी विवाद हुआ था, जिसे मुश्किल से सुलझाया गया था। 

टिकट वितरण और समन्वयक के अनुभव पर उठे सवाल 
दबी जुबान भाजपा महानगर कमेटी पर भी सवाल उठने लगे हैं। कुछ लोग कह रहे है कि भाजपा के महामंत्री मनीष राय को चुनाव समन्वयक बना दिया गया। इनके पास अनुभव का अभाव था और पहली बार भाजपा में कोई पद मिला था। उनका कहना है कि कांग्रेस ने मधुकर शर्मा को टिकट देकर ब्राह्मण वोटों को अपनी ओर आकर्षित किया, जबकि करीब एक दर्जन से अधिक पार्षद टिकट देने के बावजूद भाजपा ब्राह्मण समाज के बीच मजबूती से संदेश देने में विफल रही। पार्षद टिकट वितरण में वाल्मीकि समाज का ध्यान नहीं रखा गया। पार्टी के कद्दावरों के पार्षद का टिकट न मिलने पर बागी होने को भी अहम कारण माना जा रहा है। इसके साथ ही महानगर की टीम जन प्रतिनिधियों का सही इस्तेमाल करने में विफल रही। 

टिकट पैनल में एक वर्ग के नाम भी परेशानी का कारण
हार का एक अन्य प्रमुख कारण यह भी माना जा रहा है कि मेयर के पैनल में एक ही समाज के लोगों का नाम भेजा गया। इससे अन्य समाज के लोगों में नाराजगी बढ़ गई। यदि दूसरे समाज के नेताओं का भी नाम जाता और अंत में राजीव अग्रवाल को टिकट मिलता तो इतनी नाराजगी नहीं रहती। कार्यकर्ताओं को किनारा कर धन कुबेरों का नाम पैनल में भेजे जाने से भी लोग नाराज थे।  


मेयर पद पर हम लोग चुनाव हार गए, इसकी समीक्षा ही नहीं, जांच भी होनी चाहिए। जो भी दोषी हो, उसे सजा मिलनी चाहिए। आरोप लगाने वाले लोगों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रबंधन में गड़बड़ी होती तो पूर्व मेयर शकुंतला भारती से अधिक वोट डॉ. राजीव अग्रवाल को कैसे मिलते? इतना ही नहीं नगर निगम के इतिहास में पार्टी सिंबल पर पहली बार 35 पार्षद जीते हैं। काम करने वाले लोग जुबान नहीं चलाते।  -मनीष राय महानगर महामंत्री व चुनाव समन्वयक 
 
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