एएमयू के वीसी बोले- मगरमच्छ के आंसू बहाने नहीं... हमदर्दी है, इसलिए आया हूं
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नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में एएमयू में 15 दिसंबर को हुए बवाल के बाद बाब-ए-सैयद पर चल रहे धरने में गुरुवार को पहली बार कुलपति प्रो. तारिक मंसूर पहुंचे। दिल्ली जाने से पहले उन्होंने छात्रों से बातचीत की, उन्हें समझाने का प्रयास किया। साथ ही कैंपस में पुलिस बुलाने की स्थितियां, हालात संभालने के लिए अपनी ओर से किए गए प्रयासों के बारे में भी बताया।
साथ ही कहा कि 15 दिसंबर की रात को जो हुआ, उसका उन्हें ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नी और पूरे परिवार को बेहद अफसोस है। कहा कि मैं यहां पर मगरमच्छ के आंसू बहाने नहीं आया हूं, बल्कि वास्तव में हमदर्दी है, इसलिए आया हूं। कुलपति ने कहा कि जब वह यहां छात्र थे तो उनके साथ भी मारपीट हुई लेकिन पढ़ना नहीं छोड़ा।
कुलपति और छात्रों की बातचीत के अंश -
गुरुवार सुबह ठीक 7.30 बजे कुलपति बाब-ए-सैयद पर धरना स्थल पर पहुंचते हैं। उनके हाथ में सोशल मीडिया पर की गई कुछ पोस्ट के प्रिंट होते हैं। छात्रों को वह प्रिंट दिखाते हैं। इसके साथ शुरू होती है बातचीत ---
कुलपति - इसमें लिखा है कैंपस खुलने के बाद जनरल डायर के जनाजे की नमाज पढ़ी जाएगी।
छात्र- (तर्क करते हुए) इसमें लिखा है नमाज पढ़ी जाए? पूछा गया है और सवालिया निशान भी है।
कुलपति - इसका क्या मतलब है?
छात्र - यह चीज दो बातों में अटक रही है, हां या न। (इसके बाद छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष फैजुल हसन कहते हैं कि इस एक पोस्ट की वजह से हम 36 हजार छात्रों को कटघरे में क्यों खड़ा करें? इसके बाद कुलपति छात्रों से कहते हैं सुनिए मेरी बात)
कुलपति - वह जो लेटर मैंने लिखा था, वह सिर्फ एसएसपी को सीक्रेट लेटर लिखा था। किसी को बदनाम करने के लिए नहीं लिखा था। पहले से ही सावधानी बतौर लिखा था। यह सरकारी संस्थान है। इसमें सरकार हर साल 1100 करोड़ रुपये देती है। अगर कोई हादसा कल हो जाता तो हमसे पूछते यह क्यों हुआ? आप ही (छात्रों) के ऊपर अगर कोई आदमी अटैक कर देता तो क्या? हमने गेंद उनके (शासन, पुलिस और प्रशासन) कोर्ट में डाल दी। वो जिम्मेदार होंगे। अखबार वालों पर मत जाइए। वीसी लॉज पर पुलिस पिकेट तैनात कर दूंगा। लाइब्रेरी पर तैनात कर दूंगा। कोई पिकेट वीसी लॉज पर आपको नजर आ रही है। मैं पूरी यूनिवर्सिटी में अकेला घूम रहा हूं। रोज आपके धरने के सामने से चार बार गुजरता हूं।
छात्र- फिर भी पुलिस आ रही है। अवैध रूप से कैंपस में रह रही है।
कुलपति - कोई पुलिस नहीं रह रही। जो सिक्योरिटी का मामला है, मैं उसे देख लूंगा। देखिए, जो कैंपस में हुआ, मुझे उसका इतना अफसोस है कि आप यकीन नहीं कर सकते हैं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा होगा। वाकई मुझे अफसोस है। मैं मगरमच्छ के आंसू बहाने यहां नहीं आया हूं। मुझे, मेरी पत्नी, मेरे पूरे परिवार को अफसोस है। जब कभी ऐसी चीजें होती हैं तो आप सोच नहीं सकते कि क्या होगा? मुझे तो पता भी नहीं कि कब मोरिसन हास्टल में कब आफताब में वह लोग गए। मुझे तो पता ही नहीं चला।
(इस पर छात्र दखल देते हुए कहते हैं कि छह घंटे तक आपको पता नहीं चला। फैजुल हसन कहते हैं कि घायलों को लेने आ रही एंबुलेंस को तोड़ा गया, डाक्टरों को पीटा गया। पुलिस को पत्र भी दिया गया)
कुलपति - यह सभी बातें हम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताएंगे। हमारा वकील बताएगा।
छात्र - 70 बच्चे, जिनको चोट लगी, उनको वहां से भगाया गया
कुलपति - देखिए ऐसा है। किसी को नहीं भगाया। कुछ लड़कों ने खुद ही अपना ट्रीटमेंट कार्ड नहीं बनवाया और वह छोटी मोटी चोट थी। हर लड़के की इंजुरी को मैने खुद मानीटर किया। हर दो घंटे बाद फोन किया। जिसको सर गंगाराम रेफर किया, उसके बारे में खुद वहां के डायरेक्टर मेरी बात हो गई थी। डॉ. निमेष मेहता, बड़े आदमी हैं। जिन्होंने प्रियंका गांधी की डिलीवरी भी कराई थी। मैं कोई अपनी तारीफ नहीं कर रहा, अपनी शेखी नहीं झाड़ रहा। खुद जाकर उन्होंने सीटी स्कैन कराया। दोस्ती है उनसे मेरी। मैंने कहा इसको आप बेस्ट ट्रीटमेंट दीजिए। दो लाख रुपये फौरन ट्रांसफर कराए। 50 हजार रुपये यहां से उसको दिए। किसी के ट्रीटमेंट में कोताही नहीं हुई। अब आप कह रहे हैं कि पिट गए, अब हम कैसे पढ़ें? तो देखिए जेएनयू में भी हूलीगंस (उपद्रवी) नहीं घुस गए। उन्होंने नहीं मारा, दो लड़कों को बंद कर दिया। जब हम स्टूटेंड थे, तब क्या हमारी पिटाई नहीं हुई है। तो क्या पढ़ना छोड़ दें।
(इसके बाद कुलपति प्रस्थान कर जाते हैं। )