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जिन क्षेत्रों में ठीक अंक नहीं मिले उनमें काम करेंगे:नगर आयुक्त
अमर उजाला ब्यूूराे
Updated Sat, 06 May 2017 02:03 AM IST
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नगर आयुक्त संतोष कुमार शर्मा
- फोटो : Amar Ujala
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केंद्र सरकार की क्वालिटी कंट्रोल ऑफ इंडिया द्वारा किए गए स्वच्छता सर्वेक्षण में कुल 2000 में से अलीगढ़ को कुल 1115 अंक मिले हैं, जिससे वह उत्तर प्रदेश में दूसरे और पूरे देश में कुल 445 शहरों में से 145 स्थान पर आ सका। नगर आयुक्त संतोष कुमार शर्मा ने वह कारण बताए जहां पर अलीगढ़ को अंक नहीं मिल सके। साथ ही अब आगे के सफर पर भी चर्चा की।
अमर उजाला- और क्या किया जा सकता था बेहतर रैंकिंग के लिए?
नगर आयुक्त- जो किया जा सकता था अब किया जा सकता है। हमने जब सर्वेक्षण के लिए काम शुरू किया था उस समय का यह अधिकतम प्रयास है। जिन चीजों में हम पीछे रहे वह नगर निगम के पार्ट की नहीं थी।
अमर उजाला- क्या क्षेत्र थे वह ?
नगर आयुक्त- घर-घर से कूड़े को अलग-अलग रखने की व्यवस्था (गीला और सूखा कूड़ा अलग) नहीं हो सकी। बल्क गारबेज जहां हैं वहीं ट्रीटमेंट होना था वह नहीं हो सका। (जैसे हास्टल, बैंक्वेट हाल, होटल आदि) पूरे शहर के 70 वार्डों में से कुल 42 ही खुले में शौच से मुक्त हो सके। प्लास्टिक वेस्ट का यूज सड़क के निर्माण में होना था, लेकिन नहीं हो सका। यही वह बिंदु हैं जिन पर अंक मिलते, लेकिन नहीं मिले।
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अमर उजाला- वह क्या चीजें हैं जो नगर निगम के पक्ष में गई?
नगर आयुक्त- मेकओवर ठीक रहा। कर्मचारियों का बायोमैट्रिक हाजिरी का काम हुआ। कूड़ा निस्तारण के लिए एटूजेड का प्लांट बंद पड़ा था उसे चालू करवाया। व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण 98 फीसदी तक हुआ। इसके अलावा आईईसी यानी इन्फोर्मेशन, एजूकेशन और कम्यूनिकेशन में भी अच्छा काम हुआ। विशेष मौकों पर विशेष सफाई व्यवस्था करायी। इन्हीं सब बातों का फायदा मिला।
अमर उजाला- अब आगे का क्या सफर है?
नगर आयुक्त- कूड़े के अलग-अलग निस्तारण, डोर टू डोर कूड़े का कलेक्शन, जिससे कूड़ा प्वाइंट तक आ ही न सके। और इस काम में नागरिकों और एनजीओ आदि का सहयोग लेने की व्यापक योजना है।
प्रति वर्ष 50 करोड़ का खर्च है सफाई पर
शहर की सफाई व्यवस्था पर प्रति वर्ष 50 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। इस प्रकार प्रति महीने शहर की सफाई पर 4.16 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। अगर नागरिक थोड़ा सा सहयोग करें तो इसमें 20 से 25 फीसदी की कमी आ सकती है। सफाई के इस काम में सफाई कर्मचारियों के साथ-साथ सुपरवाइजर और अधिकारी भी लगे हैं। सभी की कुल संख्या करीब 2100 है। इसमें करीब दो हजार तो सफाई कर्मचारी हैं। इसमें स्थायी, संविदा और ठेके के कर्मचारी शामिल हैं।
सेवा भवन में है ऑनलाइन मानीटरिंग की व्यवस्था
शहर के सभी कूड़ा कलेक्शन प्वाइंटों पर सीधे निगरानी की व्यवस्था है। नगर निगम के सेवा भवन में बैठकर ऑनलाइन स्थिति को देखा जा सकता है। इसके अलावा ऑफ लाइन भी मानीटरिंग की जाती है। इसमें नगर स्वास्थ्य अधिकारी के आधीन निरीक्षक और सेनेटरी सुपरवाइजरों की टीम तैनात रहती है।
नागरिक थोड़ा साथ दें तो तस्वीर बदल जाएगी : मेयर
यूपी में दूसरा स्थान हासिल करने पर महापौर शकुंतला भारती ने शहर के नागरिकों के साथ-साथ पूरी नगर निगम की टीम को इस बात के लिए बधाई दी है। उन्होंने बताया कि नगर निगम अपने प्रयास कर रहा है, लेकिन इन प्रयासों को नागरिकों का भी सहयोग चाहिए। नागरिक नगर निगम को अपनी संस्था समझें। उन्होंने कहा कि यह देखा गया है कि किसी प्वाइंट पर सफाई होती है और चूना डाल दिया जाता है, लेकिन कुछ मिनटों के बाद ही वहां फिर से कूड़ा डाल दिया जाता है। कूड़े के डंप के लिए एक समय निर्धारित करें। घर और दुकान में डस्टबिन रख लें। शहर को साफ सुथरा रखने की सभी की वैसे ही जिम्मेदारी है जैसे घर को साफ रखने की जिम्मेदारी परिवार के सभी सदस्यों की होती है।
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अमर उजाला- और क्या किया जा सकता था बेहतर रैंकिंग के लिए?
नगर आयुक्त- जो किया जा सकता था अब किया जा सकता है। हमने जब सर्वेक्षण के लिए काम शुरू किया था उस समय का यह अधिकतम प्रयास है। जिन चीजों में हम पीछे रहे वह नगर निगम के पार्ट की नहीं थी।
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अमर उजाला- क्या क्षेत्र थे वह ?
नगर आयुक्त- घर-घर से कूड़े को अलग-अलग रखने की व्यवस्था (गीला और सूखा कूड़ा अलग) नहीं हो सकी। बल्क गारबेज जहां हैं वहीं ट्रीटमेंट होना था वह नहीं हो सका। (जैसे हास्टल, बैंक्वेट हाल, होटल आदि) पूरे शहर के 70 वार्डों में से कुल 42 ही खुले में शौच से मुक्त हो सके। प्लास्टिक वेस्ट का यूज सड़क के निर्माण में होना था, लेकिन नहीं हो सका। यही वह बिंदु हैं जिन पर अंक मिलते, लेकिन नहीं मिले।
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अमर उजाला- वह क्या चीजें हैं जो नगर निगम के पक्ष में गई?
नगर आयुक्त- मेकओवर ठीक रहा। कर्मचारियों का बायोमैट्रिक हाजिरी का काम हुआ। कूड़ा निस्तारण के लिए एटूजेड का प्लांट बंद पड़ा था उसे चालू करवाया। व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण 98 फीसदी तक हुआ। इसके अलावा आईईसी यानी इन्फोर्मेशन, एजूकेशन और कम्यूनिकेशन में भी अच्छा काम हुआ। विशेष मौकों पर विशेष सफाई व्यवस्था करायी। इन्हीं सब बातों का फायदा मिला।
अमर उजाला- अब आगे का क्या सफर है?
नगर आयुक्त- कूड़े के अलग-अलग निस्तारण, डोर टू डोर कूड़े का कलेक्शन, जिससे कूड़ा प्वाइंट तक आ ही न सके। और इस काम में नागरिकों और एनजीओ आदि का सहयोग लेने की व्यापक योजना है।
प्रति वर्ष 50 करोड़ का खर्च है सफाई पर
शहर की सफाई व्यवस्था पर प्रति वर्ष 50 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। इस प्रकार प्रति महीने शहर की सफाई पर 4.16 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। अगर नागरिक थोड़ा सा सहयोग करें तो इसमें 20 से 25 फीसदी की कमी आ सकती है। सफाई के इस काम में सफाई कर्मचारियों के साथ-साथ सुपरवाइजर और अधिकारी भी लगे हैं। सभी की कुल संख्या करीब 2100 है। इसमें करीब दो हजार तो सफाई कर्मचारी हैं। इसमें स्थायी, संविदा और ठेके के कर्मचारी शामिल हैं।
सेवा भवन में है ऑनलाइन मानीटरिंग की व्यवस्था
शहर के सभी कूड़ा कलेक्शन प्वाइंटों पर सीधे निगरानी की व्यवस्था है। नगर निगम के सेवा भवन में बैठकर ऑनलाइन स्थिति को देखा जा सकता है। इसके अलावा ऑफ लाइन भी मानीटरिंग की जाती है। इसमें नगर स्वास्थ्य अधिकारी के आधीन निरीक्षक और सेनेटरी सुपरवाइजरों की टीम तैनात रहती है।
नागरिक थोड़ा साथ दें तो तस्वीर बदल जाएगी : मेयर
यूपी में दूसरा स्थान हासिल करने पर महापौर शकुंतला भारती ने शहर के नागरिकों के साथ-साथ पूरी नगर निगम की टीम को इस बात के लिए बधाई दी है। उन्होंने बताया कि नगर निगम अपने प्रयास कर रहा है, लेकिन इन प्रयासों को नागरिकों का भी सहयोग चाहिए। नागरिक नगर निगम को अपनी संस्था समझें। उन्होंने कहा कि यह देखा गया है कि किसी प्वाइंट पर सफाई होती है और चूना डाल दिया जाता है, लेकिन कुछ मिनटों के बाद ही वहां फिर से कूड़ा डाल दिया जाता है। कूड़े के डंप के लिए एक समय निर्धारित करें। घर और दुकान में डस्टबिन रख लें। शहर को साफ सुथरा रखने की सभी की वैसे ही जिम्मेदारी है जैसे घर को साफ रखने की जिम्मेदारी परिवार के सभी सदस्यों की होती है।