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टप्पल का आंदोलन : चार मौतें, नौ साल, लेकिन किसान आज भी बेहाल
Mon, 25 Mar 2019 01:37 AM IST
राजेश सिंह
अभिषेक शर्मा
अभिषेक शर्मा
Published by: राजेश सिंह
Updated Mon, 25 Mar 2019 01:37 AM IST
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14 अगस्त 2010 को हुए गोलीकांड के बाद 16 अगस्त 2010 को धरने पर जमा किसान
- फोटो : Amar Ujala
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और ताजनगरी आगरा को जोड़ने के लिए यमुना पट्टी पर विकसित हुए यमुना एक्सप्रेस वे पर बसे टप्पल क्षेत्र के किसानों की क्रांति गाथा एक इतिहास बन गई है। करीब नौ बरस पहले यह इलाका देश की राजनीति का केंद्र बन गया था। 14 अगस्त 2010 की शाम गांव जिकरपुर पर चल रहे किसानों के धरने पर हुए बवाल में बंदूकें गरजने पर तीन किसानों और एक पीएसीकर्मी की मौत के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार के मुख्य किरदार राहुल गांधी तक यहां पहुंचे।
उन्होंने किसानों की मांगों के अनुरूप आजादी काल से पुराने देश के भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का वायदा किया और कानून बदला भी गया। उस समय विपक्ष में मौजूद भाजपा सरकार ने भी किसानों के समर्थन में खूब आवाज बुलंद की। मगर यहां के किसानों की आवाज आज तक नक्कारखाने में तूती की मानिंद बनी हुई है। चार मौतों और नौ साल बीतने के बाद भी किसान लगातार जिकरपुर के उसी स्थान पर धरने पर हैं।
उनकी वही मांगें हैं। जिकरपुर के अंडरपास से लेकर दिल्ली की संसद तक खूब हायतौबा किसान मचा रहे हैं, मगर कोई सुनने वाला नहीं है। खुद इस मुद्दे से जुड़े किसान और उनके नेता यह नहीं जानते कि उन्हें आखिर कब न्याय मिलेगा और कौन उनकी मांगें सुनने व मानने वाला आएगा। अब चुनाव सिर पर है, धरनारत किसानों की मानें तो उनके लिए इससे बड़ा दूसरा कोई मुद्दा नहीं। या तो उन्हें उनकी मांग के अनुसार मुआवजा दिलाया जाए या फिर उनकी जमीन वापस कर दी जाए।
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इनकी गई थी जान
गांव जहानगढ़ के निवासी प्रशांत, गांव कृपालपुर के निवासी मोहित, गांव स्यारौल के निवासी धर्मेंद्र, सादाबाद, हाथरस के पीएसी सूबेदार बिजेंद्र सिंह
यह है जिकरपुर का मामला
1-जिकरपुर अंडरपास पर मई 2010 में नोएडा के बराबर मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने बेमियादी धरना प्रदर्शन किया था। 14 अगस्त 2010 को खूनी संघर्ष के दौरान तीन किसान शहीद हुए थे। एक पीएसी हवालदार की जान गई। तकरीबन नौ साल पहले शुरू हुए इस संघर्ष में जिकरपुर, जहानगढ़, कनसेरा, कुराना और टप्पल के सैकड़ों किसान शामिल हैं। इस प्रकरण में किसानों ने नोएडा आगरा यमुना एक्सप्रेस वे के लिए तो सहर्ष जमीनें दे दीं लेकिन जेपी टाउनशिप मामले में किसान एक सामान मुआवजा दिए जाने पर अड़े हैं और ये मुद्दा सुलझा नहीं है।
2-जिकरपुर के किसान धरने में ही वर्ष 2010 में तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का आना हुआ था। उस वक्त केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। राहुल गांधी के प्रयासों से यूपीए सरकार के पीएम मनमोहन सिंह ने वर्ष 2013 में आजादी से पुराने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन किया।
3-वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनने के लिए इस संशोधन बिल में नया प्रावधान कर किसानों को जमीन देने के लिए बाध्य करने की तैयारी हुई लेकिन कांग्रेस ने आठ बार इसका पुरजोर विरोध किया। फलस्वरूप दूसरा संशोधन नहीं हो पाया।
4-संशोधित कानून के अनुसार अगर पांच साल में सरकार अधिग्रहित की गई जमीन का भू उपयोग नहीं कर पाती है तो उस जमीन को किसानों को वापस किया जाएगा। मगर यहां मसला हाईकोर्ट में फंसा होने के कारण सरकार जमीन वापसी मसला टाल दे रही है।
2010 में किसानों से हुए वादों की हकीकत
-सर्विस लेन का निर्माण आज तक नहीं किया गया
-जमीन देने वाले किसानों से टोल टैक्स वसूल रहे
-दस फीसदी विकसित जमीन अब तक नहीं मिली
-शहीद किसान स्मारक का निर्माण अब तक नहीं
-जेपी का स्कूल और अस्पताल अब तक नहीं बना
-जेपी ग्रुप ने जमीन देने वालों को नौकरी नहीं मिली
-64 फीसदी की दर से अतिरिक्त मुआवजा नहीं दिया
-फसली मुआवजा नहीं मिला तो खेती करनी पड़ी
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उन्होंने किसानों की मांगों के अनुरूप आजादी काल से पुराने देश के भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का वायदा किया और कानून बदला भी गया। उस समय विपक्ष में मौजूद भाजपा सरकार ने भी किसानों के समर्थन में खूब आवाज बुलंद की। मगर यहां के किसानों की आवाज आज तक नक्कारखाने में तूती की मानिंद बनी हुई है। चार मौतों और नौ साल बीतने के बाद भी किसान लगातार जिकरपुर के उसी स्थान पर धरने पर हैं।
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उनकी वही मांगें हैं। जिकरपुर के अंडरपास से लेकर दिल्ली की संसद तक खूब हायतौबा किसान मचा रहे हैं, मगर कोई सुनने वाला नहीं है। खुद इस मुद्दे से जुड़े किसान और उनके नेता यह नहीं जानते कि उन्हें आखिर कब न्याय मिलेगा और कौन उनकी मांगें सुनने व मानने वाला आएगा। अब चुनाव सिर पर है, धरनारत किसानों की मानें तो उनके लिए इससे बड़ा दूसरा कोई मुद्दा नहीं। या तो उन्हें उनकी मांग के अनुसार मुआवजा दिलाया जाए या फिर उनकी जमीन वापस कर दी जाए।
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गांव जहानगढ़ के निवासी प्रशांत, गांव कृपालपुर के निवासी मोहित, गांव स्यारौल के निवासी धर्मेंद्र, सादाबाद, हाथरस के पीएसी सूबेदार बिजेंद्र सिंह
यह है जिकरपुर का मामला
1-जिकरपुर अंडरपास पर मई 2010 में नोएडा के बराबर मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने बेमियादी धरना प्रदर्शन किया था। 14 अगस्त 2010 को खूनी संघर्ष के दौरान तीन किसान शहीद हुए थे। एक पीएसी हवालदार की जान गई। तकरीबन नौ साल पहले शुरू हुए इस संघर्ष में जिकरपुर, जहानगढ़, कनसेरा, कुराना और टप्पल के सैकड़ों किसान शामिल हैं। इस प्रकरण में किसानों ने नोएडा आगरा यमुना एक्सप्रेस वे के लिए तो सहर्ष जमीनें दे दीं लेकिन जेपी टाउनशिप मामले में किसान एक सामान मुआवजा दिए जाने पर अड़े हैं और ये मुद्दा सुलझा नहीं है।
2-जिकरपुर के किसान धरने में ही वर्ष 2010 में तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का आना हुआ था। उस वक्त केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। राहुल गांधी के प्रयासों से यूपीए सरकार के पीएम मनमोहन सिंह ने वर्ष 2013 में आजादी से पुराने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन किया।
3-वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनने के लिए इस संशोधन बिल में नया प्रावधान कर किसानों को जमीन देने के लिए बाध्य करने की तैयारी हुई लेकिन कांग्रेस ने आठ बार इसका पुरजोर विरोध किया। फलस्वरूप दूसरा संशोधन नहीं हो पाया।
4-संशोधित कानून के अनुसार अगर पांच साल में सरकार अधिग्रहित की गई जमीन का भू उपयोग नहीं कर पाती है तो उस जमीन को किसानों को वापस किया जाएगा। मगर यहां मसला हाईकोर्ट में फंसा होने के कारण सरकार जमीन वापसी मसला टाल दे रही है।
2010 में किसानों से हुए वादों की हकीकत
-सर्विस लेन का निर्माण आज तक नहीं किया गया
-जमीन देने वाले किसानों से टोल टैक्स वसूल रहे
-दस फीसदी विकसित जमीन अब तक नहीं मिली
-शहीद किसान स्मारक का निर्माण अब तक नहीं
-जेपी का स्कूल और अस्पताल अब तक नहीं बना
-जेपी ग्रुप ने जमीन देने वालों को नौकरी नहीं मिली
-64 फीसदी की दर से अतिरिक्त मुआवजा नहीं दिया
-फसली मुआवजा नहीं मिला तो खेती करनी पड़ी