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अलीगढ़ : लोकतंत्र में हर वोट की कीमत..रूठ जाती आपके माननीय की किस्मत
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अभिषेक शर्मा
सियासत में किस्मत कब चमक जाए और कब रूठ जाए, ये कभी किसी को पता नहीं रहता। मगर आपके माननीय की इस किस्मत को राह दिखाने में सबसे महत्वपूर्ण है आपका एक-एक कीमती वोट। इसलिए मतदान अवश्य करें और लोकतंत्र के उत्सव में अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने माननीय की किस्मत चमकाने का मौका न गवाएं। जिले में कई ऐसे उदाहरण हैं, जब 64 से लेकर 500 से 600 और एक हजार वोटों से प्रत्याशी चुनाव हारे हैं। हार के बाद समर्थक पछताते दिखते हैं। मगर उस पछतावे से कोई लाभ नहीं। जिले का सबसे बड़ा उदाहरण सियासी दिग्गज चौ. राजेंद्र सिंह की 64 वोट से हार का है। इस हार के बाद उनका सबसे बड़ा सियासी कदम ठहर गया था।
जीवनभर सताती है कम अंतर से हार की कसक
सियासी समर में जी तोड़ मेहनत करने वाले सूरमाओं और उनके समर्थकों को जब परिणाम सुनने को मिलता है कि चंद वोटों से हार का सामना करना पड़ा है तो खुद उनको और उनके समर्थकों को जीवन भर चंद वोटों के अंतर से हार की कसक सताती है। अपने जिले में एक नहीं कई ऐसे किस्से हैं, जिनमें बेहद कम वोटों से कई सूरमाओं को हार का सामना करना पड़ा।
मंच से विकास की बात, धरातल पर जात-पात
बृहस्पतिवार को होने वाले मतदान से पहले सियासी बिसात जब से बिछी है, तब से अब तक अलग-अलग मंचों से हर दल ने विकास की बात की है। कहीं कोई कुछ कहते सुना गया तो कहीं कोई कुछ कहते सुना गया। मगर मैदान में सूरमाओं को उतारने से लेकर मतदान के लिए खेमेबंदी तक करने में विकास से दूर जात-पात का गणित बैठाते देखा गया है। सीटों पर प्रत्याशी जातीय ध्रुवीकरण और समीकरण के सहारे उतारे गए। प्रत्याशियों ने भी उसी ध्रुवीकरण और समीकरण के सहारे मतदान के लिए लोगों को अपने हक में प्रेरित किया है। मगर यह सब मतदान प्रतिशत पर कितना असरकारी होगा, यह बृहस्पतिवार को साफ हो जाएगा। हर स्तर पर प्रयास मतदान प्रतिशत बढ़ाने का चल रहा है।
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मतदान प्रतिशत बढ़ाने की कवायद
मतदान से पहली रात कत्ल की रात के नाम से पुकारी जाती है। बुधवार रात में हर स्तर पर खेमेबंदी अपने हक में करने का प्रयास रहेगा। इस दौरान सभी दलों व प्रत्याशियों का सबसे अधिक जोर अपने-अपने खेमे का मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर है। सभी के प्रयास हैं कि किसी भी कीमत पर मतदान प्रतिशत कम न रह जए। ऐसे में मतदाताओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे मतदान प्रतिशत बढ़ाकर लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभाएं।
- ये देखें पुराने परिणाम
-1967 में कोल पर जनसंघ के किशनलाल दिलेर ने कांग्रेस के रमेश करन को 485 मतों से हराया।
-1969 में अतरौली पर जनसंघ के कल्याण सिंह ने कांग्रेस के अमर सिंह को 538 मतों से हराया।
-1974 शहर पर जनसंघ के इंद्रपाल सिंह ने कांग्रेस के ख्वाजा हलीम को 619 मतों से हराया।
-1989 में इगलास पर कांग्रेस के बिजेंद्र सिंह ने जनता दल के राजेंद्र सिंह को 64 मतों से हराया।
-2002 में खैर पर बसपा के प्रमोद गौड़ ने रालोद के सत्यपाल सिंह को 362 मतों से हराया।
-2012 में कोल पर सपा के जमीरउल्लाह ने कांग्रेस के विवेक बंसल को 599 मतों से हराया।
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सियासत में किस्मत कब चमक जाए और कब रूठ जाए, ये कभी किसी को पता नहीं रहता। मगर आपके माननीय की इस किस्मत को राह दिखाने में सबसे महत्वपूर्ण है आपका एक-एक कीमती वोट। इसलिए मतदान अवश्य करें और लोकतंत्र के उत्सव में अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने माननीय की किस्मत चमकाने का मौका न गवाएं। जिले में कई ऐसे उदाहरण हैं, जब 64 से लेकर 500 से 600 और एक हजार वोटों से प्रत्याशी चुनाव हारे हैं। हार के बाद समर्थक पछताते दिखते हैं। मगर उस पछतावे से कोई लाभ नहीं। जिले का सबसे बड़ा उदाहरण सियासी दिग्गज चौ. राजेंद्र सिंह की 64 वोट से हार का है। इस हार के बाद उनका सबसे बड़ा सियासी कदम ठहर गया था।
जीवनभर सताती है कम अंतर से हार की कसक
सियासी समर में जी तोड़ मेहनत करने वाले सूरमाओं और उनके समर्थकों को जब परिणाम सुनने को मिलता है कि चंद वोटों से हार का सामना करना पड़ा है तो खुद उनको और उनके समर्थकों को जीवन भर चंद वोटों के अंतर से हार की कसक सताती है। अपने जिले में एक नहीं कई ऐसे किस्से हैं, जिनमें बेहद कम वोटों से कई सूरमाओं को हार का सामना करना पड़ा।
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मंच से विकास की बात, धरातल पर जात-पात
बृहस्पतिवार को होने वाले मतदान से पहले सियासी बिसात जब से बिछी है, तब से अब तक अलग-अलग मंचों से हर दल ने विकास की बात की है। कहीं कोई कुछ कहते सुना गया तो कहीं कोई कुछ कहते सुना गया। मगर मैदान में सूरमाओं को उतारने से लेकर मतदान के लिए खेमेबंदी तक करने में विकास से दूर जात-पात का गणित बैठाते देखा गया है। सीटों पर प्रत्याशी जातीय ध्रुवीकरण और समीकरण के सहारे उतारे गए। प्रत्याशियों ने भी उसी ध्रुवीकरण और समीकरण के सहारे मतदान के लिए लोगों को अपने हक में प्रेरित किया है। मगर यह सब मतदान प्रतिशत पर कितना असरकारी होगा, यह बृहस्पतिवार को साफ हो जाएगा। हर स्तर पर प्रयास मतदान प्रतिशत बढ़ाने का चल रहा है।
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मतदान प्रतिशत बढ़ाने की कवायद
मतदान से पहली रात कत्ल की रात के नाम से पुकारी जाती है। बुधवार रात में हर स्तर पर खेमेबंदी अपने हक में करने का प्रयास रहेगा। इस दौरान सभी दलों व प्रत्याशियों का सबसे अधिक जोर अपने-अपने खेमे का मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर है। सभी के प्रयास हैं कि किसी भी कीमत पर मतदान प्रतिशत कम न रह जए। ऐसे में मतदाताओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे मतदान प्रतिशत बढ़ाकर लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभाएं।
- ये देखें पुराने परिणाम
-1967 में कोल पर जनसंघ के किशनलाल दिलेर ने कांग्रेस के रमेश करन को 485 मतों से हराया।
-1969 में अतरौली पर जनसंघ के कल्याण सिंह ने कांग्रेस के अमर सिंह को 538 मतों से हराया।
-1974 शहर पर जनसंघ के इंद्रपाल सिंह ने कांग्रेस के ख्वाजा हलीम को 619 मतों से हराया।
-1989 में इगलास पर कांग्रेस के बिजेंद्र सिंह ने जनता दल के राजेंद्र सिंह को 64 मतों से हराया।
-2002 में खैर पर बसपा के प्रमोद गौड़ ने रालोद के सत्यपाल सिंह को 362 मतों से हराया।
-2012 में कोल पर सपा के जमीरउल्लाह ने कांग्रेस के विवेक बंसल को 599 मतों से हराया।