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यूपी का रण : जातिवाद के प्रचंड वेग में लड़ी जाएगी बरौली की जंग, भाजपा से नए ‘वीर’ विपक्ष से कई तीर

Fri, 28 Jan 2022 05:54 AM IST
दुष्यंत शर्मा अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
अभिषेक शर्मा, अलीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 28 Jan 2022 05:54 AM IST
सार

मौजूदा विधायक का टिकट कटने के बाद सभी दल बसपा से भाजपा में आए जयवीर सिंह को घेरने में जुटे हैं। महंगाई-बेरोजगारी से भी बड़ा है यहां साथा चीनी मिल का मुद्दा।

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The battle of Barauli will be fought in the fierce velocity of casteism
demo pic - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अलीगढ़ जिले की बरौली सीट अपनी अलग सियासी पहचान रखती है। दल और मुद्दों से अलग हटकर यहां सियासी योद्धाओं के अपने रसूख और वजूद पर चुनाव लड़े जाते रहे हैं। कमोबेश ऐसे ही हालात इस बार भी देखने को मिल रहे हैं। भाजपा ने मौजूदा विधायक ठा. दलवीर सिंह का टिकट काटकर उनके सियासी प्रतिद्वंद्वी  ठा. जयवीर सिंह को मैदान में उतारा है। उन्हें चुनौती दे रहे रालोद-सपा के संयुक्त उम्मीदवार प्रमोद गौड़ का भी अपना सियासी कद है। अब  विपक्ष जातीय गणित, क्षेत्र के मुद्दों को लेकर उन्हें घेरने में जुटा हुआ है। भितरघात के भी पूरे आसार बन रहे हैं। भाजपा नेता हेमवंत चौहान टिकट न मिलने पर जनसत्ता दल लोकतांत्रिक से मैदान में कूद पड़े। हालांकि,उनका पर्चा खारिज हो गया।

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यह पहला मौका है जब दो विरोधी जयवीर व दलवीर एक ही दल भाजपा में हैं। एक ही सीट पर दोनों का प्रबल दावा था। दोनों का अपना-अपना सियासी रसूख है और सीट पर अपना प्रभाव है। हालांकि, इस बार दोनों खुद के बजाय अपनी सियासी विरासत परिवार को सौंपने के लिए प्रयासरत थे। दलवीर सिंह अपने नाती और जयवीर सिंह अपने बेटे को इस सीट से मैदान में उतारने की तैयारी में थे। मगर अंत समय पर भाजपा ने विधायक का टिकट काटकर जयवीर सिंह को कमान सौंपी है। इसको लेकर भाजपा खुद नाराजगी जैसे संकट का सामना करती दिखाई दे रही है।
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बहरहाल, जयवीर सिंह के समर्थकों को उनकी मजबूत सियासी जमीन, मोदी-योगी की लोकप्रियता और पुराने प्रतिद्वंद्वी दलवीर के सामने न होने की वजह से चुनाव आसान लग रहा है। जबकि किसान आंदोलन से उपजी नाराजगी, जातीय समीकरणों और सपा-रालोद के गठबंधन की वजह से प्रमोद गौड़ के समर्थकों के भी हौसले बुलंद हैं। बसपा के नरेंद्र शर्मा और कांग्रेस के गौरांग देव चौहान भी पूरा जोर लगाए हुए हैं।
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बात अगर मुद्दों की करें तो जिले में महंगाई-बेरोजगारी और विकास जैसे मुद्दों पर विपक्षी खेमा सत्ताधारी भगवा खेमे को घेरने की तैयारी कर रहा है। मगर, बरौली के भाजपा विधायक पूरे साढ़े चार साल सिर्फ साथा चीनी मिल की समस्या का समाधान न हो पाने के मुद्दे से जूझते नजर आए। हाल ही मुख्यमंत्री ने नई चीनी मिल स्थापना का एलान किया है। मगर इस एलान का किसानों पर कितना असर पड़ता है, यह भविष्य के गर्त में है।

प्रमुख मुद्दे...

  • साथा चीनी मिल का जीर्णोद्धार इस बार भी नहीं हो पाना
  • हरदुआगंज-जवां के सुदूर क्षेत्र को अलग से तहसील का न मिल पाना
  • जवां-गोधा क्षेत्र में राजकीय डिग्री कॉलेज की स्थापना नहीं हो पाना
  • कासिमपुर परियोजना से निकलने वाली राख से होने वाली समस्या
  • जवां-गोधा क्षेत्र में युवाओं के लिए स्टेडियम की जरूरत है

वोटों का गणित
85 हजार क्षत्रिय
50 हजार ब्राह्मण
50 हजार बघेल
40 हजार लोध
30 हजार मुस्लिम
40 हजार जाटव
25 हजार जाट
20 हजार वैश्य

2017 के नतीजे
दलवीर सिंह, भाजपा 1,25,545
जयवीर सिंह, बसपा  86,782
केशव सिंह बघेल, कांग्रेस 17,238
नीरज शर्मा, रालोद  1829

साथा मिल सबसे बड़ा मुद्दा, क्षमता बढ़ाने की दिशा में नहीं हुए प्रयास
पूर्व विधायक स्व. केशवदेव हरियाणा के पुत्र संजीव हरियाणा बताते हैं कि उनके पिताजी ने निर्दलीय विधायक बनने के बाद साथा मिल की स्थापना के लिए प्रयास किए। वे इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिले। प्रयास रंग लाया और फरवरी 1974 में जब इंदिरा गांधी कासिमपुर की सी यूनिट का शुभारंभ करने आईं तो उन्होंने साथा मिल का भी शिलान्यास किया।

करीब साढ़े पांच करोड़ की लागत से बनी इस मिल का 1977 में तत्कालीन सीएम नारायण दत्त तिवारी ने शुभारंभ किया था। क्षेत्र को रोजगार मिला। मगर, अब मलाल होता है कि मौजूदा जनप्रतिनिधि इस सियासी विरासत को संभाल नहीं पा रहे। हमें तो अब मुख्यमंत्री की घोषणा के साकार होने का इंतजार है। वहीं, वीरपुरा के कृष्णा ठाकुर भी ऐसे ही सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, साथा मिल की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं हुए हैं।



कद्दावर चेहरों की वजह से वीआईपी सीट
मौजूदा विधायक ठा. दलवीर सिंह पूर्व की सरकारों में मंत्री भी रह चुके हैं। पिछले दो दशक से उनके सियासी प्रतिद्वंद्वी पूर्व मंत्री व एमएलसी ठा. जयवीर सिंह रहे हैं। जयवीर सिंह मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं। अब वे भाजपा से मैदान में उतरे हैं। दलवीर व जयवीर के दौर से पहले इस सीट पर सुरेंद्र सिंह चौहान प्रदेश की सियासत में कद्दावर नेता रहे हैं। वे गृह मंत्री तक रहे।

बरौली की लहर का दूसरी सीटों पर रहता है असर
जिले की अतरौली, खैर, कोल, इगलास सीटें बरौली से सटी हैं। ठाकुर और ब्राह्मण बहुल इस सीट की लहर का असर बगल की इगलास, खैर और कोल सीट पर दिखाई देता है।

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