Thalassemia: आम घरों तक पहुंचा थैलेसीमिया, अब तक 30 परिवार पीड़ित, नियमित खून पर टिकी है जिंदगी
2009 में प्रदेश का पहला थैलेसीमिया केंद्र अलीगढ़ में शुरू हुआ। तब से लेकर अब तक आगरा, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, सैफई, वाराणसी, चंदौली, गोरखपुर, इलाहाबाद और बरेली सहित 13 केंद्रों पर एक हजार मामले पंजीकृत हैं। अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को 60-60 मरीज बुलाए जाते हैं।
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थैलेसीमिया अब किसी एक समुदाय या वर्ग तक सीमित बीमारी नहीं रही। यह आनुवांशिक रक्त रोग अब सामान्य आबादी में तेजी से फैल रहा है और कई परिवारों के लिए जिंदगी भर का संघर्ष बन गया है। हालात यह हैं कि पीड़ित बच्चों को जिंदा रहने के लिए हर 7 से 15 दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूजन कराना पड़ रहा है।
विश्व थैलेसीमिया दिवस से एक दिन पहले 7 मई को जब अमर उजाला ने अलीगढ़ जिले में थैलेसीमिया प्रसार को लेकर पड़ताल की तो पाया कि जेएन मेडिकल कॉलेज में प्रदेश का पहला थैलेसीमिया सेंटर है जहां सिर्फ एक या दो नहीं बल्कि 14 से भी ज्यादा जिलों के थैलेसीमिया पीड़ित उपचार के लिए आते हैं। यहां 262 मामले पंजीकृत हैं जो अलीगढ़ के अलावा हाथरस, एटा, कासगंज, फिरोजाबाद, मैनपुरी, बदायूं, संभल, अमरोहा, रामपुर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, नोएडा और मथुरा के निवासी हैं।
इस बीच यह भी पता चला कि अलीगढ़ जिले में ही 30 परिवार थैलेसीमिया से लड़ रहे हैं। इनमें ऐसे परिवार भी हैं जिनमें एक से अधिक मामले हैं। गभाना के एक परिवार में बेटी के बाद बेटा भी थैलेसीमिया की चपेट में आया। अब तक दिल्ली जाकर तीन परिवारों ने बौनमेरो ट्रांसप्लांट भी कराया है जो काफी महंगा उपचार है।
दरअसल विश्व थैलेसीमिया दिवस प्रतिवर्ष आठ मई को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य आनुवंशिक रक्त विकार थैलेसीमिया के बारे में जागरूकता बढ़ाना, मरीजों का समर्थन करना और बेहतर उपचार की वकालत करना है। यह दिन रक्तदान के महत्व और योग्य स्वास्थ्य देखभाल तक समान पहुंच पर जोर देता है।
मेडिकल कॉलेज में थैलेसीमिया सेंटर पर 262 बच्चों का ब्लड ट्रांसफ्यूजन व केलेशन थेरेपी से इलाज चल रहा है। जरूरत के अनुसार मदद दी जा रही है। - डॉ. नीरज त्यागी, सीएमओ
नियमित खून पर टिकी जिंदगी
डॉक्टरों के अनुसार, थैलेसीमिया एक आनुवांशिक रक्त रोग है, जिसमें शरीर पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता और गंभीर एनीमिया हो जाता है। इसके इलाज में मरीज को नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन देकर शरीर में खून और ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखा जाता है। 2009 में प्रदेश का पहला थैलेसीमिया केंद्र अलीगढ़ में शुरू हुआ। तब से लेकर अब तक आगरा, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, सैफई, वाराणसी, चंदौली, गोरखपुर, इलाहाबाद और बरेली सहित 13 केंद्रों पर एक हजार मामले पंजीकृत हैं। अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को 60-60 मरीज बुलाए जाते हैं। आपात स्थिति में मरीज कभी भी आकर उपचार ले सकता है।
पीड़ित पिता ने शुरू की थैलेसीमिया सोसायटी
2004 में बेटी के थैलेसीमिया ग्रस्त होने की जानकारी मिलने के बाद 2018 से पिता विनय शर्मा अलीगढ़ में थैलेसीमिया सोसायटी संचालित कर रहे हैं। एक निजी विद्यालय के प्रधानाचार्य विनय शर्मा अन्य जिलों से आने वाले मरीजों को सरकारी दिशानिर्देश और योजनाओं के बारे में भी जानकारी दे रहे हैं ताकि कम खर्च में बेहतर उपचार हो सके। इनकी सोसायटी में अलीगढ़ जिले से 25 मामले पंजीकृत हैं। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी अब 22 साल की है और दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन कर रही है। उसका उपचार अभी भी जारी है। वे स्वीकारते हैं कि कभी विशिष्ट आबादी की यह बीमारी अब सामान्य आबादी में पहुंच रही है। हम खुद अपनी बेटी के कैरियर बने। मगर आज तक समझ नहीं पाए कि ऐसा कैसे संभव हुआ?