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अतिक्रमण में अटका शहर, कैसे होगी आगे गुजर-बसर
ब्यूूराे, अमर उजाला, अलीगढ़।
Updated Tue, 14 Nov 2017 01:49 AM IST
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शाहकमाल रोड पर किया गया अतिक्रमण।
- फोटो : Amar Ujala
कभी शहर की संवेदनशीलता का हवाला देकर तो कभी प्रभावित होने वाले की आर्थिक स्थिति का हावला देकर वजह कोई भी हो, शहर में सफल अतिक्रमण हटाओ अभियान कभी चल ही नहीं सका। जबकि पिछले दो दशकों में शहर के सीमित स्थानों वाली सड़कें अतिक्रमण के चलते सिकुड़कर रह गई हैं।
अधिकांश प्रमुख सड़कों का 40 से 60 फीसदी तक हिस्सा अतिक्रमण की चपेट में है। ऐसे में शहर का जनजीवन दिन भर ठिठक ठिठक कर चलता है। जाम इससे जुड़ी समस्या है। थोड़ी सी दूरी तय करने में भी जरूरत से ज्यादा वक्त लगता है। पुलिस, प्रशासन, नगर निगम या अन्य विभाग, सभी के पास अपने अपने तर्क हैं। लेकिन ऐसे में एक आम शहरी रास्ते से गुजरते वक्त यह सवाल खुद से जरूर पूछता है कि हम चल क्यों रहे हैं?
अतिक्रमण को वैधानिक बनाने की कई तरकीबें
नगर निगम द्वारा मूविंग स्टाल के नाम पर लाइसेंस जारी होता है। लेकिन अधिकांश स्टाल मूव ही नहीं करते हैं। हालात तो यह हैं कि घंटा घर के सामने ही और जिलाधिकारी के घर के सामने ही ठेले और ढकेलें लगती हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्यवाही देखने को नहीं मिलती। अगर वह हटे भी हैं तो दो दिन बाद फिर से वहीं ढकेल लगा लेते हैं। कभी तहबाजारी रसीद कटवा कर स्वयं को वैधानिक होने की दलील दी जाती है।
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कई मार्केटों में जाने से कतराते हैं लोग
राजेंद्र नगर कालोनी निवासी राम किशन तिवारी कहते हैं कि महावीर गंज, रेलवे रोड और इन जैसे इलाकों में गाड़ी खड़ी करने के लिए भी जगह नहीं है। इसलिए ऐेसे मार्केटों में जाना बंद कर दिया है। क्योंकि वाहन खड़ा करने को लेकर लोगों से नोकझोंक की स्थिति हो जाती है। बाजारों में अतिक्रमण की वजह से जाम और पार्किंग के न होने से शहर का स्वाभाविक विकास प्रभावित होता है। कई मार्केट की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं
ढकेल और खोखों का कारोबार शोरूमों पर भारी
कुछ दिनों पहले उड़ान सोसायटी द्वारा शहर में एक अध्ययन किया गया। उसमें पाया कि सड़क की पटरियों पर ठेला, ढकेल और खोखों में हो रहा कारोबार दुकानों और शोरूमों से भी ज्यादा हो गया है। इसका एक कारण ठेल ढकेल में लगने वाली कम लागत भी है। एक कचौड़ी की दुकान को खोलने में करीब 10 से 15 लाख रुपये चाहिए। जबकि ढकेल पर वही काम 15 हजार में हो जाता है। जबकि मुनाफे का औसत दोनों ही मामले में एक सा है। अब 15 लाख रुपये निवेश कर जितनी कमाई होगी, वह ढकेल वाला 15 हजार निवेश कर हासिल कर लेता है।
बिजली विभाग के ट्रांसफार्मर,कूड़ा कलेक्शन प्वाइंट भी हैं समस्या
शहर में विभिन्न स्थानों पर बिजली विभाग ने ही ट्रांसफार्मर रख दिए हैं और उनके घेरे बना दिए हैं। सबसे सटीक उदाहरण रामघाट रोड पर इंद्रप्रस्थ स्टेट के सामने रखे बिजली के ट्रांसफार्मर का है। इससे रामघाट रोड पर यह स्थान पर मात्र 15 से 20 फीट चौड़ा रह गया है। यहीं पर कू़ड़े का डंप है। जिससे समस्या और गंभीर हो जाती है।
कहां कितनी गंभीर है समस्या?
रामघाट रोड पर एक ओर दुकानों के अलावा समानांतर ठेल ढकेल मार्केट नाले के ऊपर बना है। इनके पास रुकने वाले राहगीरों के वाहन अतिक्रमण के साथ जाम की समस्या को पैदा करते हैं।
स्टेट बैंक तिराहे पर रेलवे की जमीन के किनारे ठेल ढकेल वालों ने स्थायी कब्जा कर रखा है। यहां पर रुकने वाले ग्राहकों के वाहन अक्सर यहां जाम के हालात पैदा करते हैं।
सराय हकीम, बारहद्वारी और रसलगंज की पूरी सड़क पर दोनों ओर दुकानदार नाले नाली से आगे आकर सामान रखते हैं। यह अस्थायी अतिक्रमण है, इसमें यह नहीं कह सकते कि कब्जा कर लिया है, लेकिन सड़क का ट्रैफिक प्रभावित करने या रोकने के लिए काफी है।
सूतमिल चौराहे से एटा चुंगी चौराहे तक शहर का मुख्य मार्ग है, लेकिन सड़क के दोनों ओर जबरदस्त अतिक्रमण।
क्वार्सी चौराहे से सासनी गेट चौराहे तक शहर का दूसरा मुख्य मार्ग, लेकिन यहां पर जीटी रोड से भी ज्यादा खराब स्थिति है।
यहां पर दशकों पुरानी है समस्या
बारहद्वारी, महावीर गंज, घुड़िया बाग, कनवरी गंज, सब्जी मंडी चौराहा, फूल चौराहा, दही वाली गली, सर्राफा मार्केट, रेलवे रोड, सेठ मीरीलाल प्याऊ, पत्थर बजार, सराय हकीम, अप्सरा मार्केट, रसलगंज, देहली गेट चौराहा, सराय लबरिया, हाथरस अड्ड़ा, मानिक चौक, दुबे का पड़ाव, गांधी पार्क बस स्टैंड, अचल ताल, मसूदाबाद बस स्टैंड यह शहर के पुराने हिस्से हैं। यहां पर अतिक्रमण की समस्या अपने चरम रूप में है। सिविल लाइन वाले इलाके की बात करें तो रामघाट रोड, स्टेट बैंक तिराहे, सेंटर प्वाइंट, मैरिस रोड, अमिर निशा मार्केट, दोदपुर, मेडिकल रोड, क्वार्सी चौराहा, एटा चुंगी तक अतिक्रमण की समस्या है। इस तरह पूरा शहर अतिक्रमण की समस्या से परेशान है।
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अधिकांश प्रमुख सड़कों का 40 से 60 फीसदी तक हिस्सा अतिक्रमण की चपेट में है। ऐसे में शहर का जनजीवन दिन भर ठिठक ठिठक कर चलता है। जाम इससे जुड़ी समस्या है। थोड़ी सी दूरी तय करने में भी जरूरत से ज्यादा वक्त लगता है। पुलिस, प्रशासन, नगर निगम या अन्य विभाग, सभी के पास अपने अपने तर्क हैं। लेकिन ऐसे में एक आम शहरी रास्ते से गुजरते वक्त यह सवाल खुद से जरूर पूछता है कि हम चल क्यों रहे हैं?
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अतिक्रमण को वैधानिक बनाने की कई तरकीबें
नगर निगम द्वारा मूविंग स्टाल के नाम पर लाइसेंस जारी होता है। लेकिन अधिकांश स्टाल मूव ही नहीं करते हैं। हालात तो यह हैं कि घंटा घर के सामने ही और जिलाधिकारी के घर के सामने ही ठेले और ढकेलें लगती हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्यवाही देखने को नहीं मिलती। अगर वह हटे भी हैं तो दो दिन बाद फिर से वहीं ढकेल लगा लेते हैं। कभी तहबाजारी रसीद कटवा कर स्वयं को वैधानिक होने की दलील दी जाती है।
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कई मार्केटों में जाने से कतराते हैं लोग
राजेंद्र नगर कालोनी निवासी राम किशन तिवारी कहते हैं कि महावीर गंज, रेलवे रोड और इन जैसे इलाकों में गाड़ी खड़ी करने के लिए भी जगह नहीं है। इसलिए ऐेसे मार्केटों में जाना बंद कर दिया है। क्योंकि वाहन खड़ा करने को लेकर लोगों से नोकझोंक की स्थिति हो जाती है। बाजारों में अतिक्रमण की वजह से जाम और पार्किंग के न होने से शहर का स्वाभाविक विकास प्रभावित होता है। कई मार्केट की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं
ढकेल और खोखों का कारोबार शोरूमों पर भारी
कुछ दिनों पहले उड़ान सोसायटी द्वारा शहर में एक अध्ययन किया गया। उसमें पाया कि सड़क की पटरियों पर ठेला, ढकेल और खोखों में हो रहा कारोबार दुकानों और शोरूमों से भी ज्यादा हो गया है। इसका एक कारण ठेल ढकेल में लगने वाली कम लागत भी है। एक कचौड़ी की दुकान को खोलने में करीब 10 से 15 लाख रुपये चाहिए। जबकि ढकेल पर वही काम 15 हजार में हो जाता है। जबकि मुनाफे का औसत दोनों ही मामले में एक सा है। अब 15 लाख रुपये निवेश कर जितनी कमाई होगी, वह ढकेल वाला 15 हजार निवेश कर हासिल कर लेता है।
बिजली विभाग के ट्रांसफार्मर,कूड़ा कलेक्शन प्वाइंट भी हैं समस्या
शहर में विभिन्न स्थानों पर बिजली विभाग ने ही ट्रांसफार्मर रख दिए हैं और उनके घेरे बना दिए हैं। सबसे सटीक उदाहरण रामघाट रोड पर इंद्रप्रस्थ स्टेट के सामने रखे बिजली के ट्रांसफार्मर का है। इससे रामघाट रोड पर यह स्थान पर मात्र 15 से 20 फीट चौड़ा रह गया है। यहीं पर कू़ड़े का डंप है। जिससे समस्या और गंभीर हो जाती है।
कहां कितनी गंभीर है समस्या?
रामघाट रोड पर एक ओर दुकानों के अलावा समानांतर ठेल ढकेल मार्केट नाले के ऊपर बना है। इनके पास रुकने वाले राहगीरों के वाहन अतिक्रमण के साथ जाम की समस्या को पैदा करते हैं।
स्टेट बैंक तिराहे पर रेलवे की जमीन के किनारे ठेल ढकेल वालों ने स्थायी कब्जा कर रखा है। यहां पर रुकने वाले ग्राहकों के वाहन अक्सर यहां जाम के हालात पैदा करते हैं।
सराय हकीम, बारहद्वारी और रसलगंज की पूरी सड़क पर दोनों ओर दुकानदार नाले नाली से आगे आकर सामान रखते हैं। यह अस्थायी अतिक्रमण है, इसमें यह नहीं कह सकते कि कब्जा कर लिया है, लेकिन सड़क का ट्रैफिक प्रभावित करने या रोकने के लिए काफी है।
सूतमिल चौराहे से एटा चुंगी चौराहे तक शहर का मुख्य मार्ग है, लेकिन सड़क के दोनों ओर जबरदस्त अतिक्रमण।
क्वार्सी चौराहे से सासनी गेट चौराहे तक शहर का दूसरा मुख्य मार्ग, लेकिन यहां पर जीटी रोड से भी ज्यादा खराब स्थिति है।
यहां पर दशकों पुरानी है समस्या
बारहद्वारी, महावीर गंज, घुड़िया बाग, कनवरी गंज, सब्जी मंडी चौराहा, फूल चौराहा, दही वाली गली, सर्राफा मार्केट, रेलवे रोड, सेठ मीरीलाल प्याऊ, पत्थर बजार, सराय हकीम, अप्सरा मार्केट, रसलगंज, देहली गेट चौराहा, सराय लबरिया, हाथरस अड्ड़ा, मानिक चौक, दुबे का पड़ाव, गांधी पार्क बस स्टैंड, अचल ताल, मसूदाबाद बस स्टैंड यह शहर के पुराने हिस्से हैं। यहां पर अतिक्रमण की समस्या अपने चरम रूप में है। सिविल लाइन वाले इलाके की बात करें तो रामघाट रोड, स्टेट बैंक तिराहे, सेंटर प्वाइंट, मैरिस रोड, अमिर निशा मार्केट, दोदपुर, मेडिकल रोड, क्वार्सी चौराहा, एटा चुंगी तक अतिक्रमण की समस्या है। इस तरह पूरा शहर अतिक्रमण की समस्या से परेशान है।