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Weather Forecast : ला-नीना के संकेत...अभी ठंड में और परेशान कर सकती है बारिश
Mon, 10 Oct 2022 06:08 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 10 Oct 2022 06:08 AM IST
सार
Signs of La Nina : आखिर मानसून का निर्धारित समय निकलने के बाद इतनी अधिक बारिश क्यों हो रही है? यह सवाल हर ओर से उठ रहा है। भूगर्भ विज्ञानियों का कहना है कि बारिश इसी तरह आगे और ठंड में कई बार परेशान कर सकती है। इसका सीधा असर प्रशांत महासागर के ला-नीना से है।
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विस्तार
आखिर मानसून का निर्धारित समय निकलने के बाद इतनी अधिक बारिश क्यों हो रही है? यह सवाल हर ओर से उठ रहा है। भूगर्भ विज्ञानियों का कहना है कि बारिश इसी तरह आगे और ठंड में कई बार परेशान कर सकती है। इसका सीधा असर प्रशांत महासागर के ला-नीना से है। अपने यहां तापमान में कमी और हवा के उच्च दबाव के कारण प्रशांत महासागर में ला-नीना पूरे उत्तर भारत पर यह असर दिखा रहा है। इसी वजह से बारिश देरी से हो रही है।
लगातार तीसरे वर्ष दिख रही ये ट्रिपल ट्रिप
एएमयू के भूगर्भ विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सलेहा जमाल कहती हैं कि यह प्रशांत महासागर में ला-नीना का असर है। हमारे यहां तापमान की कमी और हवा के उच्च दबाव के कारण प्रशांत महासागर में ला-नीना असर दिखा रहा है, जिसका सीधा प्रभाव उत्तर भारत पर है। यह अभी दिसंबर-जनवरी तक अपना असर दिखा रहा है। यह एक चक्र है, जिसके परिवर्तन इस तरह के असर दिखाते हैं। यह लगातार तीसरे वर्ष ट्रिपल ट्रिप है। इसकी वजह से बारिश देरी से हो रही है और अधिक हो रही है। चूंकि, शुरुआत में बारिश कम हुई थी। जितना पानी गिरना चाहिए था, उतना गिर गया। इसका सबसे अधिक असर खरीफ फसलों पर दिखेगा। मार्च अप्रैल में गर्म हवाएं और बारिश किसानों को परेशान करेगी।
हवा के कम दबाव वाले क्षेत्र में नहीं हुई बारिश
डीएस कॉलेज के भू गर्भ विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. पीके शर्मा कहते हैं कि इस समय तक मानसून लौट जाता है। मगर इस बार हवा के उच्च दबाव के चलते प्रशांत महासागर में ला-नीना असर दिखा रहा है। उसी वजह से यह मानसून का समय खत्म होने के बाद बारिश हो रही है और अभी इसके असर कुछ दिन तक और देखने होंगे। वे बताते हैं कि पिछले दिनों जिन क्षेत्रों में हवा का दबाव कम था, चाहे वह भारत हो या यूरोप। बारिश कम हुई। मगर ऊपर हवा का दबाव बढ़ते ही यह बारिश शुरू हो गई है।
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उत्तर पश्चिम भारत बना दो हवाओं का जंक्शन
क्वार्सी के शताब्दी नगर निवासी हाथरस पीसी बागला कॉलेज के भूगर्भ विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एचएस गर्ग बताते हैं कि भूमध्य सागर के चक्रवात में पश्चिमी विछोभ और हवा के कम दबाव वाले क्षेत्र में नूरा तूफान आया। इसी बीच मानसून लौट रहा था। ये दोनों घटनाएं एक साथ हुईं और उत्तर पश्चिम भारत इन हवाओं का जंक्शन बन गया, जिसके कारण यह बारिश बरेली, मुरादाबाद से अलीगढ़ मथुरा हाथरस और दिल्ली हरियाणा तक दिख रही है। यह घटना अप्रत्याशित है। वैसे अब यह कल के बाद असर कम दिखाना कर देगी।
भारत और प्रशांत महासागर
दुनिया के हर कोने का मौसम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दूसरी जगहों को किसी न किसी तरह प्रभावित जरूर करता है, मगर भारत का मानसून प्रशांत महासागर की जलवायु पर ही आधारित होता है। इसलिए उसके मौसम में बदलाव भारत को सीधे प्रभावित करता है।
इस तरह ये असर होता है
प्रशांत महासागर से हवाएं भूमध्य रेखा के समानांतर पश्चिम की ओर बहती हैं। ये हवाएं दक्षिण अमेरिका से एशिया की ओर गर्म पानी को ले जाती हैं। अल-नीनो और ला-नीना दो विपरीत प्रभाव हैं, जिनका पूरी दुनिया के मौसम, जंगल की आग और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। सामान्यत: इन दोनों के संस्करण नौ से 12 महीने तक चलते हैं और कई बार इनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इनके आने का कोई नियमित क्रम नहीं है। ये हर दो से सात साल के बीच आते हैं। हालांकि ला-नीना की तुलना में अल-नीनो ज्यादा आता है।
ये होते हैं अंतर...
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लगातार तीसरे वर्ष दिख रही ये ट्रिपल ट्रिप
एएमयू के भूगर्भ विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सलेहा जमाल कहती हैं कि यह प्रशांत महासागर में ला-नीना का असर है। हमारे यहां तापमान की कमी और हवा के उच्च दबाव के कारण प्रशांत महासागर में ला-नीना असर दिखा रहा है, जिसका सीधा प्रभाव उत्तर भारत पर है। यह अभी दिसंबर-जनवरी तक अपना असर दिखा रहा है। यह एक चक्र है, जिसके परिवर्तन इस तरह के असर दिखाते हैं। यह लगातार तीसरे वर्ष ट्रिपल ट्रिप है। इसकी वजह से बारिश देरी से हो रही है और अधिक हो रही है। चूंकि, शुरुआत में बारिश कम हुई थी। जितना पानी गिरना चाहिए था, उतना गिर गया। इसका सबसे अधिक असर खरीफ फसलों पर दिखेगा। मार्च अप्रैल में गर्म हवाएं और बारिश किसानों को परेशान करेगी।
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हवा के कम दबाव वाले क्षेत्र में नहीं हुई बारिश
डीएस कॉलेज के भू गर्भ विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. पीके शर्मा कहते हैं कि इस समय तक मानसून लौट जाता है। मगर इस बार हवा के उच्च दबाव के चलते प्रशांत महासागर में ला-नीना असर दिखा रहा है। उसी वजह से यह मानसून का समय खत्म होने के बाद बारिश हो रही है और अभी इसके असर कुछ दिन तक और देखने होंगे। वे बताते हैं कि पिछले दिनों जिन क्षेत्रों में हवा का दबाव कम था, चाहे वह भारत हो या यूरोप। बारिश कम हुई। मगर ऊपर हवा का दबाव बढ़ते ही यह बारिश शुरू हो गई है।
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उत्तर पश्चिम भारत बना दो हवाओं का जंक्शन
क्वार्सी के शताब्दी नगर निवासी हाथरस पीसी बागला कॉलेज के भूगर्भ विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एचएस गर्ग बताते हैं कि भूमध्य सागर के चक्रवात में पश्चिमी विछोभ और हवा के कम दबाव वाले क्षेत्र में नूरा तूफान आया। इसी बीच मानसून लौट रहा था। ये दोनों घटनाएं एक साथ हुईं और उत्तर पश्चिम भारत इन हवाओं का जंक्शन बन गया, जिसके कारण यह बारिश बरेली, मुरादाबाद से अलीगढ़ मथुरा हाथरस और दिल्ली हरियाणा तक दिख रही है। यह घटना अप्रत्याशित है। वैसे अब यह कल के बाद असर कम दिखाना कर देगी।
भारत और प्रशांत महासागर
दुनिया के हर कोने का मौसम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दूसरी जगहों को किसी न किसी तरह प्रभावित जरूर करता है, मगर भारत का मानसून प्रशांत महासागर की जलवायु पर ही आधारित होता है। इसलिए उसके मौसम में बदलाव भारत को सीधे प्रभावित करता है।
इस तरह ये असर होता है
प्रशांत महासागर से हवाएं भूमध्य रेखा के समानांतर पश्चिम की ओर बहती हैं। ये हवाएं दक्षिण अमेरिका से एशिया की ओर गर्म पानी को ले जाती हैं। अल-नीनो और ला-नीना दो विपरीत प्रभाव हैं, जिनका पूरी दुनिया के मौसम, जंगल की आग और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। सामान्यत: इन दोनों के संस्करण नौ से 12 महीने तक चलते हैं और कई बार इनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इनके आने का कोई नियमित क्रम नहीं है। ये हर दो से सात साल के बीच आते हैं। हालांकि ला-नीना की तुलना में अल-नीनो ज्यादा आता है।
ये होते हैं अंतर...
- अल-नीनो का असर होगा तो बारिश कम होगी
- ला-नीना का असर होगा तो बारिश अधिक होगी