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हथियार समर्पण के साथ हुई ल्हौसरा की रंजिश में सुलह

Thu, 21 Jan 2021 12:47 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 21 Jan 2021 12:47 AM IST
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Reconciliation with Lausra due to surrender of arms
अभिषेक शर्मा
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आठवीं पास ठा. मुनेशपाल सिंह को गर्वमेंट प्रेस में सेवारत पिता महेंद्र सिंह ने गर्वमेंट प्रेस में ही ट्रेनिंग शुरू करा दी थी। मंशा थी कि 18 बरस का हो चुका बेटा, समय रहते सरकारी सेवा में आ जाएगा। मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। मामूली से झगड़े ने गांव में रंजिश की ऐसी नींव रखी कि पिता-भाई की हत्या के बदले उन्हें खुद हथियार उठाने पड़े। दीवानी के तिहरे हत्याकांड की चर्चाओं का आलम यह रहा कि उनका जेल में रहते चार घंटे तक दूरदर्शन के रिपोर्टर ने साक्षात्कार लिया और टीवी पर दिखाया। परिवार से ऐसी दूरी हुई कि तीन-तीन बेटियों में से किसी का अपने हाथ से कन्यादान न कर सके। मगर बरौली विधायक ठा. दलवीर सिंह व तत्कालीन सीओ जगदीश शर्मा ने सुलह की नीव रखी जो सफल हुई और हथियार समर्पण के साथ समझौते की पंचायत में दो ठाकुर पक्षों के बीच की इस रंजिश का खात्मा कराया गया।
24 साल बाद जेल से रिहा हुए ल्हौसरा की रंजिश के अहम किरदार ठा. मुनेशपाल सिंह ने बुधवार को दीवानी में अमर उजाला से बातचीत में अपना अतीत साझा किया। उन्होंने बताया कि पांच भाइयों में उनके सबसे बड़े भाई राजवीर सिंह अंडला पर डीजल पंप चलाते थे। उनकी 1978 में हत्या हुई। वह गांव से अलग की रंजिश थी। गांव में कोई किसी तरह की रंजिश न थी। मगर अचानक 1983 में दूसरे भाई बलवीर सिंह पर हमले ने गांव में नई रंजिश शुरू कर दी। तब तक वे शांत रहे। फिर पिता की हत्या हुई और पिता की हत्या में गवाह दंपती को मारा गया। इस रंजिश ने उन्हें झकझोर दिया और सुलह की बात न बनती देख बदले की भावना जाग उठी। बस वहीं से जीवन बागियों की राह चल पड़ा। तिहरे हत्याकांड के बाद 15 माह 13 दिन जेल रहना पड़ा। बाद में सजा होने पर 1997 में जेल चले गए। तब से जेल में ही थे।
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वे बताते हैं कि जब तिहरे हत्याकांड के बाद जेल गए थे, तब दूरदर्शन टीवी के रिपोर्टर ने जेल में आकर उनका साक्षात्कार लिया और सत्यकथा में भी पूरा प्रकरण प्रकाशित हुआ। जेल जाने के बाद तीन बेटियों व दो बेटों की शादी हुईं। इनमें किसी बेटी की शादी में नहीं आ सके। बड़े बेटे की शादी में भी पैरोल नहीं मिली। छोटे बेटे की शादी में जरूर 72 घंटे का पैरोल मिला था।
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दलवीर सिंह, जगदीश शर्मा व जे रविंद्र गौड़ का ऋणी रहूंगा
वे अपने जीवन में तीन लोगों का बड़ा अहसान मानते हैं। मौजूदा विधायक ठा. दलवीर सिंह को इसलिए ऋणी मानते हैं कि उन्होंने सुलह के समय खुलेआम इस बात की गारंटी ली थी कि मुनेशपाल आगे से कुछ नहीं करेगा, इस बात की गारंटी लेता हूं। हालांकि मुनेशपाल उस समय जेल में थे और दलवीर सिंह ने उनसे बिना बात किए यह गारंटी ले ली थी। सुलह के बाद दो लोगों को जेल भेजकर यह संदेश दलवीर सिंह ने भिजवाया था। तत्कालीन सीओ जगदीश शर्मा के ऋणी इस बात से रहेंगे कि उन्होंने इस रंजिश में सुलह का प्रयास किया और दलवीर सिंह व क्षत्रिय महासभा के लोगों से बात कर दोनों पक्षों को सुलह के लिए तैयार किया। वरना न जाने क्या क्या होता। जिस समय बन्नादेवी में मेघराज सिंह के प्लाट में पंचायत हुई, उसमें डीएम-एसएसपी मौजूद थे। वहां बागियों की तरह हथियारों सहित दोनों पक्षों को समर्पण कराया गया था। फिर सुलह पर मुहर लगी थी और दोनों पक्षों के हाथ मिलवाए थे। जो आज तक कायम हैं। तीसरे 2015-16 में एसएसपी रहे जे रविंद्र गौड़ ने जिला स्तरीय रिहाई समिति में रहते, उनके चाल चलन, उम्र व सुलह के बाद कोई अपराध न होने को आधार मानकर रिहाई की मजबूत संस्तुति अपनी रिपोर्ट में की थी। जिसके आधार पर आज सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है।
मां-बीवी ने कहा, अब बस, परिवार संग बिताउंगा जीवन
रिहाई के बाद मंगलवार शाम जब मुनेशपाल घर पहुंचे तो मां व बीवी ने एक ही बात कही कि अब बहुत हो गया। अब घर पर ही रहना है। नाती हो गए हैं। परिवार के साथ ही जीवन बिताना है। टीपी नगर में जमीन देने के बाद जो रकम मिली थी। उससे दूसरी जगह कृषि भूमि खरीद ली है। खेती करने के साथ पशुओं का व्यापार करके परिवार का साथ दूंगा। नई पीढ़ी को एक ही संदेश है कि अपराध किसी तरह का हो, चाहे रंजिश का या पेशेवर, उससे अपने साथ के अलावा परिवार को भी काफी कुछ भुगतना पड़ता है। उनके दो छोटे भाई उनकी पैरवी में ही लगे रहते थे।

जेल में छोड़ा मेहनताना, तीन बार मिली पैरोल
मुनेशपाल बताते हैं कि इस अवधि में उन्हें दो-दो माह की तीन बार पैरोल मिली है। पहली पैरोल 2000 में, दूसरी 2001 में और तीसरी 2015 में मिली थी। जेल में रहते काम के बदले उन्हें पहले 7 हजार रुपये मिल चुके हैं, जबकि अब वह रिहाई के समय करीब 6 हजार 8 सौ रुपये छोड़ आए हैं।
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