{"_id":"5d19162d8ebc3e3c7c22c126","slug":"postoffice-release-ticket-on-saree-aligarh-news-ali2071890142","type":"story","status":"publish","title_hn":"विलुप्त हुईं साड़ियां डाक विभाग ने टिकटों पर सहेजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विलुप्त हुईं साड़ियां डाक विभाग ने टिकटों पर सहेजा
विज्ञापन
भारतीय साड़ी फैशन पर डाक विभाग द्वारा जारी किए गए डाक टिकट में दर्शायी पठारे प्रभु समुदाय के महिल
- फोटो : CITY OFFICE
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश की विभिन्न परंपराओं और संस्कृतियों को डाक टिकटों के माध्यम से सहेजने वाले डाक विभाग ने अब भारतीय साड़ी फैशन को सहेजने के लिए डाक टिकटों की एक श्रृंखला जारी की है। इस श्रृंखला में रुपहले पर्दे पर छाए भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री देविका रानी के साड़ी पहनावे से लेकर पारसी गारा साड़ी, बंगाली कस्बी साड़ी और ब्रह्मिका साड़ी शामिल हैं। डाक विभाग के अनुसार पश्चिमी पहनावे के दौर में खत्म होते साड़ी के वजूद को कायम रखने के लिए यह श्रृंखला जारी की गई है। श्रृंखला के साथ ही एक विवरण पुस्तिका भी जारी की है, जिसमें साड़ी और उनके पहनावे के इतिहास लिखा है। डाक विभाग के प्रधान कार्यालयों और फ्लेटलिक ब्यूरो में इन टिकटों को बिक्री के लिए रखा गया है।
अभिनेत्री देविका रानी के चर्चित पहनावे को दर्शाया
डाक विभाग द्वारा जारी की गई चार टिकटों की श्रृंखला की एक टिकट पर भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री और 1940 के दशक में खूबसूरती की प्रतिमूर्ति मानी जाने वाली देविका रानी का साड़ी पहनावा दर्शाया गया है। विभाग द्वारा जारी विवरण पुस्तिका के अनुसार उस दौर में देविका रानी का पहनावा शालीनता के तत्कालीन मानदंडों को चुनौती देता था। उस दौर से आज तक सिनेमा और साड़ी का चोली दामन का साथ चला आ रहा है।
पारसी गारा साड़ी का दर्शाया महत्व
कशीदाकारी से सजाए गए कपड़े से बनने वाली पारसी साड़ी पर डाक विभाग ने टिकट जारी की है। बताया जाता है कि इस साड़ी को पारसी महिलाएं विशेष आयोजनों पर पहनती थीं। विवरण पुस्तिका के अनुसार पारसी महिलाएं साड़ी का पल्ला बायें कंधे से न लेकर दायें कंधे से लेते हुए पहनती थीं। पारसी जोड़ों की खास पहचान थी कि महिलाएं गारा साड़ी और पुरुष काफ्तान पहनते और साथ में सिर पर पगड़ी लगाते थे।
विज्ञापन
विलुप्त हुई कस्बी साड़ी को सहेजा
तेहरवीं शताब्दी में गुजरात से मुंबई जाने वाले एवं मुंबई के पहले निवासी पठारे प्रभु समुदाय की महिलाओं की खास कस्बी साड़ी को भी डाक विभाग ने सहेजा है। इन साड़ियों के बारे में दी जानकारी के अनुसार मखमल की यह साड़ी नौ गज की होती थी। इसके किनारे सोने और चांदी के बारीक तारों से सजाए जाते थे।
20वीं शताब्दी तक खूब चमकी ब्रह्मिका साड़ी
समाज सुधार आंदोलन के बाद महिलाओं के पहनावे में हुए बदलाव के दौर में बंगाली ब्राह्मण परिवारों की महिलाओं द्वारा अपनाई गई ब्रह्मिका साड़ी को भी विभाग ने दर्शाया है। ब्रह्मिका साड़ी के बारे में लिखा है कि टैगोर परिवार की ज्ञानदानंदिनी देवी ने महिलाओं को सहज और सरल साड़ी पहनावे का एक तरीका दिया था। इसके कारण इस साड़ी को ठाकुरबाड़ीर साड़ी (ब्रह्म समाज के प्रमुख टैगोर परिवार की शैली में पहली जाने वाली साड़ी) भी कहा जाता है। 1870 से 20वीं शताब्दी तक यह खूब प्रचालित रही।
विज्ञापन
अभिनेत्री देविका रानी के चर्चित पहनावे को दर्शाया
डाक विभाग द्वारा जारी की गई चार टिकटों की श्रृंखला की एक टिकट पर भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री और 1940 के दशक में खूबसूरती की प्रतिमूर्ति मानी जाने वाली देविका रानी का साड़ी पहनावा दर्शाया गया है। विभाग द्वारा जारी विवरण पुस्तिका के अनुसार उस दौर में देविका रानी का पहनावा शालीनता के तत्कालीन मानदंडों को चुनौती देता था। उस दौर से आज तक सिनेमा और साड़ी का चोली दामन का साथ चला आ रहा है।
विज्ञापन
पारसी गारा साड़ी का दर्शाया महत्व
कशीदाकारी से सजाए गए कपड़े से बनने वाली पारसी साड़ी पर डाक विभाग ने टिकट जारी की है। बताया जाता है कि इस साड़ी को पारसी महिलाएं विशेष आयोजनों पर पहनती थीं। विवरण पुस्तिका के अनुसार पारसी महिलाएं साड़ी का पल्ला बायें कंधे से न लेकर दायें कंधे से लेते हुए पहनती थीं। पारसी जोड़ों की खास पहचान थी कि महिलाएं गारा साड़ी और पुरुष काफ्तान पहनते और साथ में सिर पर पगड़ी लगाते थे।
विज्ञापन
विलुप्त हुई कस्बी साड़ी को सहेजा
तेहरवीं शताब्दी में गुजरात से मुंबई जाने वाले एवं मुंबई के पहले निवासी पठारे प्रभु समुदाय की महिलाओं की खास कस्बी साड़ी को भी डाक विभाग ने सहेजा है। इन साड़ियों के बारे में दी जानकारी के अनुसार मखमल की यह साड़ी नौ गज की होती थी। इसके किनारे सोने और चांदी के बारीक तारों से सजाए जाते थे।
20वीं शताब्दी तक खूब चमकी ब्रह्मिका साड़ी
समाज सुधार आंदोलन के बाद महिलाओं के पहनावे में हुए बदलाव के दौर में बंगाली ब्राह्मण परिवारों की महिलाओं द्वारा अपनाई गई ब्रह्मिका साड़ी को भी विभाग ने दर्शाया है। ब्रह्मिका साड़ी के बारे में लिखा है कि टैगोर परिवार की ज्ञानदानंदिनी देवी ने महिलाओं को सहज और सरल साड़ी पहनावे का एक तरीका दिया था। इसके कारण इस साड़ी को ठाकुरबाड़ीर साड़ी (ब्रह्म समाज के प्रमुख टैगोर परिवार की शैली में पहली जाने वाली साड़ी) भी कहा जाता है। 1870 से 20वीं शताब्दी तक यह खूब प्रचालित रही।