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जहरीली शराब कांड का एक साल : अदालतों में बहस जारी, बचाव पक्ष खोज रहा कमजोर कड़ी
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जिस जहरीली शराब कांड का दंश सवा सौ परिवारों ने झेला है। उसके मुकदमों का ट्रायल अदालत में जारी है। तीन मुकदमे ऐसे हैं, जिनमें जल्द निर्णय आने की उम्मीद है। मगर बचाव पक्ष इन मुकदमों में पुलिस की उन कमजोर कड़ियों को खोज रहा है, जिनके सहारे आरोपों को झूठा साबित किया जा सके। अभियोजन और पुलिस की मजबूती पैरवी जारी है। प्रयास हैं कि आरोपियों को सजा दिलाई जा सके। हालांकि, अब तक 20 से ज्यादा आरोपियों को जमानत दिला पाने में बचाव पक्ष सफल रहा है।
इस कांड के 33 मुकदमों में से 10 का ट्रायल एडीजे प्रथम शाहिद रजा की अदालत में चल रहा है। एडीजीसी अमर सिंह तोमर बताते हैं कि दो मुकदमे निर्णय की दहलीज पर हैं। गवाही अंतिम दौर में है। प्रयास है कि जल्द से जल्द मुकदमे निस्तारित कराए जाएं। इसी तरह 12 मुकदमे एडीजे-9 सुनील सिंह की अदालत में हैं, जहां वरिष्ठ एडीजीसी चौ. जितेंद्र सिंह व एडीजीसी जेपी राजपूत अभियोजन पैरवी कर रहे हैं। यहां भी लक्ष्य निर्धारित कर कुछ मुकदमे निस्तारित करने का प्रयास है। एक मुकदमा निर्णय की दहलीज पर है। एडीजे-17 की अदालत में भी 9 मुकदमे हैं, जहां एडीजीसी हर्षवर्द्धन सिंह व सुधांशु अग्रवाल अभियोजन पैरोकारी कर रहे हैं।
- पुलिस ने इस कांड के कई मुकदमों में जल्दबाजी या कहें हड़बड़ाहट में लिखा पढ़ी की है। कई आरोपी ऐसे हैं, जिन्हें गलत तरीके से फंसाकर जेल भेजा है। मसलन अकराबाद के अधौन की फैक्टरी में बरामदगी को लेकर लिखा पढ़ी में बहुत कुछ झोल है। इस बात को तथ्य के साथ अदालत के समक्ष रखा गया है। इन्हीं तथ्यों के सहारे हमें इसमें न्याय की उम्मीद है।
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- नीरज चौहान, बचाव पक्ष के अधिवक्ता
- इस कांड में सबसे अहमद किरदार माने जा रहे विजेंद्र कपूर की गिरफ्तारी, उन पर दो-ढाई मिनट के अंतराल पर हरदुआगंज और अकराबाद में बरामदगी मुकदमा, तीन बार फैक्टरी पर जाने के दौरान की कमजोर लिखा-पढ़ी साबित करती है कि पुलिस ने कुछ तो गड़बड़ किया है। उसी आधार पर हम लोग अदालत से न्याय की गुहार लगाए हुए हैं। उम्मीद है कि सफलता मिलेगी।
- योगेंद्र शर्मा, बचाव पक्ष के अधिवक्ता
- शराब कांड के सभी 33 मुकदमों को चिह्नित कर उनमें पैरोकारी की जा रही है। दो अदालतों में तो दो-दो एडीजीसी पैरवी कर रहे हैं। आरोपियों को सजा मिले, ऐसा पूरा प्रयास किया जा रहा है। मुकदमे जल्द निस्तारित हों, ये भी प्रयास जारी हैं।
- धीरेंद्र सिंह तोमर, डीजीसी फौजदारी
उठी आवाज, सवा सौ मौत के बाद भी जमानत?
आरोपियों को जमानत मिलने पर पीड़ित सवाल उठा रहे हैं। वे कहते हैं कि सवा सौ लोगों को मौत के मुंह में पहुंचाने वालों के साथ इतनी रियायत क्यों बरती गई। उन्हें सिर्फ पुलिस ने जेल भेजकर खानापूर्ति की है। कौरह रुस्तमपुर के मृत उमेश की पत्नी गीता कहती हैं कि दो बच्चों को खेती के जरिये पाल रही हूं, सीने को ठंडक उस दिन मिलेगी, जब ऐसा करने वालों को सजा होगी। इसी गांव के मृत भोला सिंह की पत्नी खुशबू भी दो बेटों को खेती के सहारे पाल रही हैं और उन्हें भी इस कांड में अदालत से उम्मीद है, मगर जमानत पर आरोपियों के छूटने की खलिश भी। जवां छेरत के मृत गंगाराम, नारायण सिंह के परिजन भी कहते हैं कि इस कांड में पुलिस न्याय दिला पाने में देरी के कारण असफल साबित हो रही है। एक साल पूरा हो गया।
सिर्फ 64 को मिला किसान दुर्घटना बीमा योजना में मुआवजा
जिला प्रशासन के स्तर से सभी को 5-5 लाख के मुआवजे की घोषणा की गई थी। लेकिन 64 लोगों को ही किसान दुर्घटना बीमा योजना के तहत 5-5 लाख रुपये का मुआवजा मिला है। बाकी 37 लोगों को 30-30 हजार रुपया मुआवजा दिया गया है। पांच लोग गैर जनपद के ऐसे थे, जिन्हें मुआवजे के लिए उनके संबंधित जिले को संस्तुति की गई थी। इस तरह 106 लोगों को मुआवजा वितरित किया गया। शहर के 13 और देहात के 24 मृतक परिवार ऐसे रहे, जिन्हें 5-5 लाख का मुआवजा नहीं मिल सका। 23 लोग ऐसे भी रहे, जिनके पोस्टमार्टम नहीं हुए, उन्हें सामाजिक सहायता योजना के तहत 30 - 30 हजार रुपये का मुआवजा दिया गया। शहर के 13 लोगों को 30 - 30 हजार मुआवजे के पीछे दलील दी गई कि उनके पास कृषि भूमि नहीं है। देहात के 24 लोगों को मुआवजा क्यों नहीं मिला, इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। क्वार्सी के चंदनिया के मृत नितिन की पत्नी सीमा, छोटू की पत्नी पूनम व नरेश की पत्नी लता जिला प्रशासन को कोसती नजर आती हैं। वह कहती हैं कि ठेके पर नगर निगम में नौकरी जरूर मिल गई है, मगर उससे बच्चों को पालना मुश्किल हो रहा है।
कई परिवारों को नहीं मिला मुआवजा
पिसावा के गांव शादीपुर में 9 लोगों की मौत हुई, जिनमें से पांच लोगों को मुआवजा नहीं मिला। शादीपुर में 4 में से एक को मुआवजा नहीं मिला। लोधा के गांव राइट में भी कई परिवारों को मुआवजा नहीं मिला। ग्राम प्रधान शादीपुर विजेंद्र सिंह कहते हैं कि गांव के चार लोगों का पोस्टमार्टम न होने के कारण मुआवजा न मिल पाने की बात कही गई। मगर सभी को सहायता राशि मिलनी चाहिए थी। गांव के मृत सागर की पत्नी शशि व सास सरोज का कहना है कि वह चार बच्चों को पाल रहे हैं। मुआवजा न मिलने के कारण बहुत दिक्कत हुई है। इसी तरह मान सिंह की पत्नी गुड्डी देवी मुआवजा न मिलने की बात कहकर प्रशासन को कोसती नजर आई। विशंभर की बूढ़ी मां समुद्री देवी भी बुढ़ापे में लाचार हैं। मुआवजे का आज तक उसे इंतजार है।
भट्ठों के मजदूर परिवार आज तक नहीं लौटे
जवां के रोहरा भट्ठा व अकराबाद के सिहोर बंबा के पास के भट्ठा के मजदूरों की भी शराब पीने से मौत हुई थी। कुछ परिवार शवों को लेकर और कुछ अंतिम संस्कार कर यहां से चले गए। इसके बाद वे नहीं लौटे हैं। उन सभी के परिवारों को भट्ठा स्वामियों की तरफ से मुआवजा दिलवाया गया था। अब इन भट्ठों पर दूसरे मजदूर काम कर रहे हैं।
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इस कांड के 33 मुकदमों में से 10 का ट्रायल एडीजे प्रथम शाहिद रजा की अदालत में चल रहा है। एडीजीसी अमर सिंह तोमर बताते हैं कि दो मुकदमे निर्णय की दहलीज पर हैं। गवाही अंतिम दौर में है। प्रयास है कि जल्द से जल्द मुकदमे निस्तारित कराए जाएं। इसी तरह 12 मुकदमे एडीजे-9 सुनील सिंह की अदालत में हैं, जहां वरिष्ठ एडीजीसी चौ. जितेंद्र सिंह व एडीजीसी जेपी राजपूत अभियोजन पैरवी कर रहे हैं। यहां भी लक्ष्य निर्धारित कर कुछ मुकदमे निस्तारित करने का प्रयास है। एक मुकदमा निर्णय की दहलीज पर है। एडीजे-17 की अदालत में भी 9 मुकदमे हैं, जहां एडीजीसी हर्षवर्द्धन सिंह व सुधांशु अग्रवाल अभियोजन पैरोकारी कर रहे हैं।
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- पुलिस ने इस कांड के कई मुकदमों में जल्दबाजी या कहें हड़बड़ाहट में लिखा पढ़ी की है। कई आरोपी ऐसे हैं, जिन्हें गलत तरीके से फंसाकर जेल भेजा है। मसलन अकराबाद के अधौन की फैक्टरी में बरामदगी को लेकर लिखा पढ़ी में बहुत कुछ झोल है। इस बात को तथ्य के साथ अदालत के समक्ष रखा गया है। इन्हीं तथ्यों के सहारे हमें इसमें न्याय की उम्मीद है।
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- नीरज चौहान, बचाव पक्ष के अधिवक्ता
- इस कांड में सबसे अहमद किरदार माने जा रहे विजेंद्र कपूर की गिरफ्तारी, उन पर दो-ढाई मिनट के अंतराल पर हरदुआगंज और अकराबाद में बरामदगी मुकदमा, तीन बार फैक्टरी पर जाने के दौरान की कमजोर लिखा-पढ़ी साबित करती है कि पुलिस ने कुछ तो गड़बड़ किया है। उसी आधार पर हम लोग अदालत से न्याय की गुहार लगाए हुए हैं। उम्मीद है कि सफलता मिलेगी।
- योगेंद्र शर्मा, बचाव पक्ष के अधिवक्ता
- शराब कांड के सभी 33 मुकदमों को चिह्नित कर उनमें पैरोकारी की जा रही है। दो अदालतों में तो दो-दो एडीजीसी पैरवी कर रहे हैं। आरोपियों को सजा मिले, ऐसा पूरा प्रयास किया जा रहा है। मुकदमे जल्द निस्तारित हों, ये भी प्रयास जारी हैं।
- धीरेंद्र सिंह तोमर, डीजीसी फौजदारी
उठी आवाज, सवा सौ मौत के बाद भी जमानत?
आरोपियों को जमानत मिलने पर पीड़ित सवाल उठा रहे हैं। वे कहते हैं कि सवा सौ लोगों को मौत के मुंह में पहुंचाने वालों के साथ इतनी रियायत क्यों बरती गई। उन्हें सिर्फ पुलिस ने जेल भेजकर खानापूर्ति की है। कौरह रुस्तमपुर के मृत उमेश की पत्नी गीता कहती हैं कि दो बच्चों को खेती के जरिये पाल रही हूं, सीने को ठंडक उस दिन मिलेगी, जब ऐसा करने वालों को सजा होगी। इसी गांव के मृत भोला सिंह की पत्नी खुशबू भी दो बेटों को खेती के सहारे पाल रही हैं और उन्हें भी इस कांड में अदालत से उम्मीद है, मगर जमानत पर आरोपियों के छूटने की खलिश भी। जवां छेरत के मृत गंगाराम, नारायण सिंह के परिजन भी कहते हैं कि इस कांड में पुलिस न्याय दिला पाने में देरी के कारण असफल साबित हो रही है। एक साल पूरा हो गया।
सिर्फ 64 को मिला किसान दुर्घटना बीमा योजना में मुआवजा
जिला प्रशासन के स्तर से सभी को 5-5 लाख के मुआवजे की घोषणा की गई थी। लेकिन 64 लोगों को ही किसान दुर्घटना बीमा योजना के तहत 5-5 लाख रुपये का मुआवजा मिला है। बाकी 37 लोगों को 30-30 हजार रुपया मुआवजा दिया गया है। पांच लोग गैर जनपद के ऐसे थे, जिन्हें मुआवजे के लिए उनके संबंधित जिले को संस्तुति की गई थी। इस तरह 106 लोगों को मुआवजा वितरित किया गया। शहर के 13 और देहात के 24 मृतक परिवार ऐसे रहे, जिन्हें 5-5 लाख का मुआवजा नहीं मिल सका। 23 लोग ऐसे भी रहे, जिनके पोस्टमार्टम नहीं हुए, उन्हें सामाजिक सहायता योजना के तहत 30 - 30 हजार रुपये का मुआवजा दिया गया। शहर के 13 लोगों को 30 - 30 हजार मुआवजे के पीछे दलील दी गई कि उनके पास कृषि भूमि नहीं है। देहात के 24 लोगों को मुआवजा क्यों नहीं मिला, इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। क्वार्सी के चंदनिया के मृत नितिन की पत्नी सीमा, छोटू की पत्नी पूनम व नरेश की पत्नी लता जिला प्रशासन को कोसती नजर आती हैं। वह कहती हैं कि ठेके पर नगर निगम में नौकरी जरूर मिल गई है, मगर उससे बच्चों को पालना मुश्किल हो रहा है।
कई परिवारों को नहीं मिला मुआवजा
पिसावा के गांव शादीपुर में 9 लोगों की मौत हुई, जिनमें से पांच लोगों को मुआवजा नहीं मिला। शादीपुर में 4 में से एक को मुआवजा नहीं मिला। लोधा के गांव राइट में भी कई परिवारों को मुआवजा नहीं मिला। ग्राम प्रधान शादीपुर विजेंद्र सिंह कहते हैं कि गांव के चार लोगों का पोस्टमार्टम न होने के कारण मुआवजा न मिल पाने की बात कही गई। मगर सभी को सहायता राशि मिलनी चाहिए थी। गांव के मृत सागर की पत्नी शशि व सास सरोज का कहना है कि वह चार बच्चों को पाल रहे हैं। मुआवजा न मिलने के कारण बहुत दिक्कत हुई है। इसी तरह मान सिंह की पत्नी गुड्डी देवी मुआवजा न मिलने की बात कहकर प्रशासन को कोसती नजर आई। विशंभर की बूढ़ी मां समुद्री देवी भी बुढ़ापे में लाचार हैं। मुआवजे का आज तक उसे इंतजार है।
भट्ठों के मजदूर परिवार आज तक नहीं लौटे
जवां के रोहरा भट्ठा व अकराबाद के सिहोर बंबा के पास के भट्ठा के मजदूरों की भी शराब पीने से मौत हुई थी। कुछ परिवार शवों को लेकर और कुछ अंतिम संस्कार कर यहां से चले गए। इसके बाद वे नहीं लौटे हैं। उन सभी के परिवारों को भट्ठा स्वामियों की तरफ से मुआवजा दिलवाया गया था। अब इन भट्ठों पर दूसरे मजदूर काम कर रहे हैं।