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ब्रांडेड ही नहीं, जेनरिक दवाएं भी हैं कोरोना के इलाज में कारगर
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पूरे देश मे पांव पसार चुकी कोरोना महामारी से हाहाकार मचा हुआ है। इसकी दूसरी लहर जानलेवा साबित हो रही है। जिले में ही मरने वालों का आंकड़ा 100 के पार हो गया है। सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती हैं तो बड़ी संख्या में होम आइसोलेशन में भी हैं।
कोविड अस्पतालों में तो स्वास्थ्य विभाग कोरोना मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध करा रहा है। होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों को भी स्वास्थ्य विभाग की ओर से दवाओं की किट मुफ्त में मिल रही है। लेकिन कुछ मरीज इन दवाओं के बजाय नामी कंपनियों की दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।
ये दवाएं आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। इसका एक सस्ता विकल्प जेनरिक दवाएं भी हो सकती हैं, लेकिन आमजन में एक भ्रांति है कि जेनरिक दवाएं देर से असर करती हैं। लेकिन विशेषज्ञों की राय इसके ठीक उलट है। उनका कहना है कि किसी मर्ज की जेनरिक दवा और नामी कंपनियों की दवा का साल्ट एक ही होता है। ऐसे में दोनों समान रूप से असर करती हैं।
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जेनरिक से तीन से चार गुनी महंगी होती हैं ब्रांडेड दवाएं
जिले के केमिस्ट एवं ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह टिल्लू ने बताया कि नामी कंपनियों की दवाओं की तुलना में जेनरिक दवाएं करीब तीन से चार गुना सस्ती हैं। मसलन कोरोना मरीजों को दी जाने वाली आइवर मेक्टिन की ब्रांडेड गोली थोक में 20 रुपये की आती है। उसकी जेनरिक गोली मात्र 5 रुपये में आ जाती है।
कोरोना के इलाज के लिए दी जा रही नामी कंपनियों की दवाओं औऱ जेनरिक दवाओं में कोई फर्क नहीं है। दोनों दवाओं का साल्ट एक ही है और दोनों तरह की दवाएं कोरोना मरीज के इलाज में कारगर हैं। बस लोगों को व्हाट्स एप इलाज से बचना होगा। एप पर सुझाए गए नुस्खों के बजाय डॉक्टर की सलाह पर इलाज कराएं।
- डॉ संजय भार्गव, चिकित्सक, वरुण हॉस्पिटल
- कोरोना मरीजों को दी जाने वाली नामी कंपनियों व जेनरिक दवाओं में कोई अंतर नहीं है। दोनों कोरोना मरीजों के लिए कारगर हैं। जेनरिक दवाएं मरीज को सस्ती पड़ती हैं और ब्रांडेड दवाओं के समान ही असर करती हैं। - डॉ बीपी कल्याणी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी
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कोविड अस्पतालों में तो स्वास्थ्य विभाग कोरोना मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध करा रहा है। होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों को भी स्वास्थ्य विभाग की ओर से दवाओं की किट मुफ्त में मिल रही है। लेकिन कुछ मरीज इन दवाओं के बजाय नामी कंपनियों की दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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ये दवाएं आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। इसका एक सस्ता विकल्प जेनरिक दवाएं भी हो सकती हैं, लेकिन आमजन में एक भ्रांति है कि जेनरिक दवाएं देर से असर करती हैं। लेकिन विशेषज्ञों की राय इसके ठीक उलट है। उनका कहना है कि किसी मर्ज की जेनरिक दवा और नामी कंपनियों की दवा का साल्ट एक ही होता है। ऐसे में दोनों समान रूप से असर करती हैं।
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जेनरिक से तीन से चार गुनी महंगी होती हैं ब्रांडेड दवाएं
जिले के केमिस्ट एवं ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह टिल्लू ने बताया कि नामी कंपनियों की दवाओं की तुलना में जेनरिक दवाएं करीब तीन से चार गुना सस्ती हैं। मसलन कोरोना मरीजों को दी जाने वाली आइवर मेक्टिन की ब्रांडेड गोली थोक में 20 रुपये की आती है। उसकी जेनरिक गोली मात्र 5 रुपये में आ जाती है।
कोरोना के इलाज के लिए दी जा रही नामी कंपनियों की दवाओं औऱ जेनरिक दवाओं में कोई फर्क नहीं है। दोनों दवाओं का साल्ट एक ही है और दोनों तरह की दवाएं कोरोना मरीज के इलाज में कारगर हैं। बस लोगों को व्हाट्स एप इलाज से बचना होगा। एप पर सुझाए गए नुस्खों के बजाय डॉक्टर की सलाह पर इलाज कराएं।
- डॉ संजय भार्गव, चिकित्सक, वरुण हॉस्पिटल
- कोरोना मरीजों को दी जाने वाली नामी कंपनियों व जेनरिक दवाओं में कोई अंतर नहीं है। दोनों कोरोना मरीजों के लिए कारगर हैं। जेनरिक दवाएं मरीज को सस्ती पड़ती हैं और ब्रांडेड दवाओं के समान ही असर करती हैं। - डॉ बीपी कल्याणी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी