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44 साल बाद 6 जुलाई 2006 को खोला गया था नाथू ला दर्रा
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नाथुला में तैनाती के समय सैनिक सुरेश (बाएं) अपने साथी के साथ।
- फोटो : CITY OFFICE
छह जुलाई 2006 को आज ही के दिन 44 साल बाद भारत और चीन के बीच नाथू ला दर्रा खोल दिया गया था। सन 1962 के चीन युद्ध के बाद इसको बंद कर दिया गया था। 1987-88 में नाथू ला दर्रे पर तैनात रहे सैनिक सुरेश राघव ने अपनी यादें साझा कीं।
उन्होंने बताया कि मैं भारतीय सेना की शिक्षा कोर में 1985 में भर्ती हुआ था। पहली पोस्टिंग 164 माउंटेन ब्रिगेड में थी। इसी क्षेत्र में नाथू ला पास है। 1987-88 में भी हालात बहुत खराब थे। उस समय भी ऐसा लगता था कि युद्ध कभी भी हो सकता है। आज भी चीन भारत को आंख दिखाने का काम कर रहा है। चीन उस समय भी युद्ध नहीं चाहता था और न ही आज चाहता है। चीन की विस्तारवादी नीति है। वह अपने भौगोलिक क्षेत्र को बढ़ाना चाहता है। यही कारण है कि अभी तक हमारे देश की सीमाएं और चीन की सीमाएं निश्चित नहीं हैं और न चीन उन्हें निश्चित करना चाहता है।
सुरेश ने बताया कि पहली पोस्टिंग के दौरान ही चार-पांच महीने के लिए अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में जाने का मौका मिला था। जगह का नाम था लुंपु। लुंपु को खराब भौगोलिक स्थितियों के कारण मर्दों की जगह भी कहा जाता था। उस समय तवांग से आगे जाने का रास्ता नहीं था। दो दिन फौजी गाड़ियों से और तीन-चार दिन पैदल चलकर ब्रिगेड हेड क्वार्टर तक पहुंचा जाता था और वहां से दो-तीन दिन आगे लगते थे। मौसम की वजह से हालात और रास्ते बहुत खराब थे। लेकिन आज की स्थिति इतनी प्रतिकूल नहीं है। सैनिकों का जोश पहले भी हाई था और आज की परिस्थितियों में बहुत ऊंचा है।
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उन्होंने बताया कि मैं भारतीय सेना की शिक्षा कोर में 1985 में भर्ती हुआ था। पहली पोस्टिंग 164 माउंटेन ब्रिगेड में थी। इसी क्षेत्र में नाथू ला पास है। 1987-88 में भी हालात बहुत खराब थे। उस समय भी ऐसा लगता था कि युद्ध कभी भी हो सकता है। आज भी चीन भारत को आंख दिखाने का काम कर रहा है। चीन उस समय भी युद्ध नहीं चाहता था और न ही आज चाहता है। चीन की विस्तारवादी नीति है। वह अपने भौगोलिक क्षेत्र को बढ़ाना चाहता है। यही कारण है कि अभी तक हमारे देश की सीमाएं और चीन की सीमाएं निश्चित नहीं हैं और न चीन उन्हें निश्चित करना चाहता है।
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सुरेश ने बताया कि पहली पोस्टिंग के दौरान ही चार-पांच महीने के लिए अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में जाने का मौका मिला था। जगह का नाम था लुंपु। लुंपु को खराब भौगोलिक स्थितियों के कारण मर्दों की जगह भी कहा जाता था। उस समय तवांग से आगे जाने का रास्ता नहीं था। दो दिन फौजी गाड़ियों से और तीन-चार दिन पैदल चलकर ब्रिगेड हेड क्वार्टर तक पहुंचा जाता था और वहां से दो-तीन दिन आगे लगते थे। मौसम की वजह से हालात और रास्ते बहुत खराब थे। लेकिन आज की स्थिति इतनी प्रतिकूल नहीं है। सैनिकों का जोश पहले भी हाई था और आज की परिस्थितियों में बहुत ऊंचा है।
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