अतीत का अलीगढ़ 8: अलीगढ़ के अधिकतर मुस्लिमों की जड़ें जुड़ी थीं राजपूत परिवारों से, ये था उनका हाल
राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
विस्तार
जिले के तौर पर अलीगढ़ का जिक्र हो और उसमें मुसलमानों का जिक्र न हो , यह असंभव है। अंग्रेजी शासन काल के दस्तावेज बताते हैं कि जिले के अधिकतर मुस्लिमों की जड़ें हिंदुओं से जुड़ी हुई थीं। आपवादिक रूप से ही कुछ लोग विदेशी मूल के थे। जिले में रहने वाले मुस्लिमों की ज्यादातर आबादी धर्मांतरण से पहले राजपूत थी। अलीगढ़ जिले के मुस्लिमों की कुल आबादी में 93.09 फीसदी लोग सुन्नी मतावलंबी थे। शियाओं की संख्या काफी कम (2.69 फीसदी) थी। लालबेगी जाति से मुस्लिम बने लोगों की संख्या 3.67 थी।
शियाओं की ज्यादातर आबादी जलाली कस्बे में रहा करती थी। कुछ प्रभावशाली शिया लोग ऊपरी दोआबे में रहा करते थे। मुस्लिम लोगों के बीच भी जातियों और उपजातियों का विभाजन था। यह इस बात पर निर्भर था कि किस हिंदू जाति से उनकी जड़ें जुड़ी थीं। 1901 की जनगणना में मुस्लिमों के बीच 62 जातियों का उल्लेख है। सिर्फ 1589 लोग खुद को विशुद्ध मुस्लिम होने का दावा किया करते थे। मुस्लिमों की 62 जातियों में से 21 तो ऐसी थीं जिनकी आबादी सौ से भी कम थी। लिहाजा उनका खास महत्व नहीं था। 20 अन्य जातियों से जुड़े मुस्लिमों की संख्या एक हजार से कम थी।
शेख
1901 की जनगणना के मुताबिक मुसलमानों की आबादी का 17.59 फीसदी हिस्सा शेखों का था। इनकी संख्या 26206 थी। इनमें से आधे लोग कोल तहसील के बाशिंदे थे। अतरौली और हाथरस में भी शेखों की अच्छी-खासी आबादी रहा करती थी। मुस्लिमों की बड़ी आबादी खेती-बाड़ी से करती थी। जबकि काफी लोग व्यापार और कारोबार से भी जुड़े थे। शेखों के बीच भी उपजातियों का विभाजन था। इनमें से मुख्य रूप से कुरैशी (9968) और सिद्दीकी (3831) लोग थे। फार्रुखी लोगों की तादात 671 और वानी इस्रैल की संख्या 241 थी। अन्य उल्लेखनीय जातियां अंसारी, उस्मानी और खुरासैनी थीं। शेखों में ज्यादातर लोग अपना प्रभुत्व जताने के लिए अपने नाम के साथ हिंदू उपजाति का उल्लेख किया करते जहां से उनकी जड़ें जुड़ी थीं।
पठान
जिले में पठानों की संख्या ठीकठाक थी। मुस्लिमों की कुल आबादी का ये 13.22 फीसदी हुआ करते थे। इनकी संख्या 19694 गिनी गई थी। पठानों की दो तिहाई आबादी अतरौली और अलीगढ़ (कोल) तहसीलों में रहा करती थी। इसके अलावा छिटपुट इनकी आबादी पूरे जिले में थी। इनकी आरंभिक रिहाइश जलाली कस्बे में थी। लेकिन प्रमुख पठान परिवार मसलन भीकमपुर और दतौली का शेरवानी परिवार जिले में बाद में आकर बसा था। बारला के अफगान भी बाद में बसे थे। ये अहमद शाह दुर्रानी के वंशज थे। इनकी भी कई शाखाएं थीं। इनमें प्रमुख गौरी थे जिनकी संख्या 4588 थी। ज्यादातर लोग अतरौली और कोल तहसील में बसे थे। इसके अलावा यूसुफजई लोगों की संख्या 2785 थी । इनमें से ज्यादातर लोग कोल तहसील के बाशिंदे थे।
राजपूत मुस्लिम
राजपूतों से मुस्लिम बने लोगों की संख्या 13456 थी जो जिले की कुल मुस्लिम आबादी का 9.03 फीसदी थी। इनमें से बड़ी संख्या में राजपूत मुस्लिम खैर और कोल तहसील के बाशिंदे थे। राजपूत मुस्लिमों में सबसे बड़ी संख्या चौहानों की थी। 1901 की जनगणना में इनकी संख्या 3414 बताई गई थी। मुस्लिम राजपूतों में से कई की जड़ें गहलोत, राठौर, भदौरिया राजपूतों से जुड़ी थीं। मुख्यतः इनका निवास हाथरस, खैर, बैस (अतरौली) में था। अन्य मुस्लिम जातियों को अंग्रेजी शासन महत्वहीन बताता था। हालांकि इनकी संख्या ठीकठाक थी। इनमें उल्लेखनीय जाति थी तेली। इनकी आबादी 10168 थी। मुख्य रूप से ये सिकंदराराऊ में रहा करते थे। इसके अलावा उल्लेखनीय जातियां थीं भिस्ती (9457), कस्साब या कसाई (7541) और मेवाती (6557)। मेवाती लोग भी मेवात से पलायन करके मुख्यतः सिकंदराराऊ में बसे थे। लोहारों की संख्या भी 5000 थी। इसके अलावा गूजर, जुलाहा, घोसी, मुस्लिम अहीर लोग भी थे जिनकी संख्या उल्लेखनीय नहीं थी।
सैयद
सैयद मुसलमानों की संख्या जिले में 6108 थी। इनमें ज्यादातर हुसैनी थे। अपने नाम के आगे ये रिजवी, बुखारी, जैदी और तकवी लगाते थे। सैयदों की आधी आबादी कोल तहसील में रहा करती थी।
ईसाई
दोआब के दूसरे हिस्सों की तरह ईसाई धर्म ने अलीगढ़ में काफी प्रगति की थी। 1881 की जनगणना में जिले में इनकी संख्या सिर्फ 57 थी। 1891 में इनकी संख्या 203 तक पहुंच गई। मिशनरियों के अभियान का असर कह लें अगले दस साल बाद यानि कि 1901 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 4888 तक पहुंच गई। उस दौर में अमेरिकन एपिस्कोपल मेथोडिस्ट कनेक्शन मिशनरी का जिले में सबसे ज्यादा असर था। इस मिशनरी एजेंसी से जिले के 4706 ईसाई जुड़े हुए थे। इसका मुख्यालय अलीगढ़ था। खैर, अतरौली, हरदुआगंज, टप्पल, सोमना, जलाली, इगलास, गंगीरी, छर्रा, अकराबाद, सासनी, सिकंदराराऊ में भी मिशनरी एजेंसी ने धर्मांतरण कार्यक्रम चलाया था। इसके प्रभाव से कुछ लोग ईसाई धर्म से जुड़े भी थे।
जारी...
स्रोतः अलीगढ़ का गजेटियर 1909