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मियावाकी पद्धति में 40 लाख पौधों से तैयार होंगे मिनी वन
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जनपद को हरा-भरा बनाने और लोगों को प्रदूषण से राहत दिलाने के लिए बड़ा प्रयास शुरू हुआ है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन एवं वन विभाग संयुक्त रूप से जनपद में हरियाली बढ़ाने के लिए जापान की मियावाकी पद्धति अपनाकर घने मिनी वन तैयार करेगा।
मियावाकी पद्धति का उपयोग कर शहर और उसके आसपास खाली पड़े भूखंड अथवा बंजर भूमि पर मिनी वन बनाने की परियोजना शुरू करने की तैयारी है। करीब 40 लाख पौधों के जरिए जिले भर में यह मिनी वन तैयार किए जाएंगे।
जिले में प्रदूषण के बढ़ते आंकड़े सभी को डराते हैं। इस तस्वीर को बदलने और प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन एवं वन विभाग संयुक्त रूप से जिले के सभी औद्योगिक क्षेत्रों में जल्द ही मियावाकी पद्धति से मिनी वन तैयार करने की योजना पर काम शुरू करेंगे।
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अफसरों ने लिया जायजा
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के मुख्य प्रबंधक अवधेश हंस, डीजीएम प्रकाश चंद्र गुप्ता ने वन संरक्षक अदिति शर्मा, प्रभागीय वन निदेशक दिवाकर वशिष्ठ आदि अफसरों के साथ पार्कों एवं जंगलों का निरीक्षण किया। वन विभाग के अफसरों ने बताया कि ग्रामसमाज की कब्जा मुक्त कराई गई भूमि पर पौधरोपण कराने के साथ ही मियावाकी पद्धति से घने मिनी वन तैयार किए जा सकते हैं। इस दिशा में काम भी शुरू हो गया है। डीएफओ दिवाकर वशिष्ठ ने बताया कि मियावाकी पद्धति मुख्य रूप से जापान की पद्धति है। इसके प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी हैं। इस पद्धति के तहत पौधों के बीच में दूरी बहुत कम रखी जाती है। इसमें छोटे से स्थान पर भी अधिक संख्या में पौधरोपण हो जाता है। एक साथ तीन अलग-अलग प्रजातियों के पौधे रोपे जाते हैं। इनमें एक अधिक ऊंचाई वाला, दूसरा कम ऊंचाई वाला और तीसरा पौधा घना छायादार होता है। दो से तीन हफ्ते में इस पद्धति से हजारों की संख्या में पौधों को रोपा जा सकता है। इस पद्धति से कम समय में जंगलों को घने जंगलों में परिवर्तित किया जा सकता है।
मियावाकी की यह है खासियत
- इस पद्धति ने घरों के आगे अथवा पीछे खाली पड़े स्थान को छोटे बागानों में बदलकर शहरी वनीकरण की अवधारणा में क्रांति ला दी है।
- इस पद्धति में देसी प्रजाति के पौधे एक-दूसरे के समीप लगाए जाते हैं। जो कम स्थान घेरने के साथ ही अन्य पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं।
- सघनता की वजह से ये पौधे सूर्य की रोशनी को धरती पर आने से रोकते हैं। इससे धरती पर खरपतवार नहीं उग पाता है। तीन वर्षों के पश्चात इन पौधों के देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है ।
- पौधे की वृद्धि 10 गुना तेजी से होती है, जिसके परिणामस्वरूप पौधरोपण सामान्य स्थिति से 30 गुना अधिक सघन होता है।
- जंगलों को पारंपरिक विधि से उगने में लगभग 200 से 300 वर्षों का समय लगता है, जबकि मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 30 वर्षों में ही तैयार किया जा सकता है।
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मियावाकी पद्धति का उपयोग कर शहर और उसके आसपास खाली पड़े भूखंड अथवा बंजर भूमि पर मिनी वन बनाने की परियोजना शुरू करने की तैयारी है। करीब 40 लाख पौधों के जरिए जिले भर में यह मिनी वन तैयार किए जाएंगे।
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जिले में प्रदूषण के बढ़ते आंकड़े सभी को डराते हैं। इस तस्वीर को बदलने और प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन एवं वन विभाग संयुक्त रूप से जिले के सभी औद्योगिक क्षेत्रों में जल्द ही मियावाकी पद्धति से मिनी वन तैयार करने की योजना पर काम शुरू करेंगे।
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अफसरों ने लिया जायजा
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के मुख्य प्रबंधक अवधेश हंस, डीजीएम प्रकाश चंद्र गुप्ता ने वन संरक्षक अदिति शर्मा, प्रभागीय वन निदेशक दिवाकर वशिष्ठ आदि अफसरों के साथ पार्कों एवं जंगलों का निरीक्षण किया। वन विभाग के अफसरों ने बताया कि ग्रामसमाज की कब्जा मुक्त कराई गई भूमि पर पौधरोपण कराने के साथ ही मियावाकी पद्धति से घने मिनी वन तैयार किए जा सकते हैं। इस दिशा में काम भी शुरू हो गया है। डीएफओ दिवाकर वशिष्ठ ने बताया कि मियावाकी पद्धति मुख्य रूप से जापान की पद्धति है। इसके प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी हैं। इस पद्धति के तहत पौधों के बीच में दूरी बहुत कम रखी जाती है। इसमें छोटे से स्थान पर भी अधिक संख्या में पौधरोपण हो जाता है। एक साथ तीन अलग-अलग प्रजातियों के पौधे रोपे जाते हैं। इनमें एक अधिक ऊंचाई वाला, दूसरा कम ऊंचाई वाला और तीसरा पौधा घना छायादार होता है। दो से तीन हफ्ते में इस पद्धति से हजारों की संख्या में पौधों को रोपा जा सकता है। इस पद्धति से कम समय में जंगलों को घने जंगलों में परिवर्तित किया जा सकता है।
मियावाकी की यह है खासियत
- इस पद्धति ने घरों के आगे अथवा पीछे खाली पड़े स्थान को छोटे बागानों में बदलकर शहरी वनीकरण की अवधारणा में क्रांति ला दी है।
- इस पद्धति में देसी प्रजाति के पौधे एक-दूसरे के समीप लगाए जाते हैं। जो कम स्थान घेरने के साथ ही अन्य पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं।
- सघनता की वजह से ये पौधे सूर्य की रोशनी को धरती पर आने से रोकते हैं। इससे धरती पर खरपतवार नहीं उग पाता है। तीन वर्षों के पश्चात इन पौधों के देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है ।
- पौधे की वृद्धि 10 गुना तेजी से होती है, जिसके परिणामस्वरूप पौधरोपण सामान्य स्थिति से 30 गुना अधिक सघन होता है।
- जंगलों को पारंपरिक विधि से उगने में लगभग 200 से 300 वर्षों का समय लगता है, जबकि मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 30 वर्षों में ही तैयार किया जा सकता है।