{"_id":"62ec1cf37d882701e552c029","slug":"mahatma-gandhi-came-to-aligarh-three-times-city-office-news-ali2975275105","type":"story","status":"publish","title_hn":"अलीगढ़ की सरजमीं पर तीन बार आए थे महात्मा गांधी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अलीगढ़ की सरजमीं पर तीन बार आए थे महात्मा गांधी
विज्ञापन
रिंकू शर्मा
देश को आजादी दिलाने में अलीगढ़ की माटी ने ऐसे सपूतों को पैदा किया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने के लिए महात्मा गांधी तीन बार अलीगढ़ की सरजमीं पर आए। पहली बार महात्मा गांधी वर्ष 1916 में ट्रेन से यहां आए, तब छात्रों व युवाओं ने उनका जोरदार स्वागत किया था। गांधी जी जब भी अलीगढ़ आए तो छात्रों से जरूर रूबरू हुए। उन्होंने युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने और स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित किया था। इनके अलावा, ऐसे में भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों ने भी यहां अपना ठिकाना बनाया और आजादी का बिगुल फूंका था।
‘स्वतंत्रता संग्रामों की अमर गाथा’ पुस्तक में चिंतामिण शुक्ल ने लिखा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1916 को पहली बार अलीगढ़ स्टेशन पर आए थे। उन्हें देखने के लिए स्टेशन पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। गांधी जी सिर पर पगड़ी और अंगरखा धोती पहने गुजराती वेषभूषा में थे। स्टेशन पर छात्रों ने गांधी जी का जोरदार स्वागत किया। स्टेशन से मालवीय पुस्तकालय तक जुलूस के साथ ले जाया गया। खचाखच भरे मैदान में उन्होंने हिंदूृ-मुस्लिम एकता पर भाषण देते हुए कहा कि जब तक हममें एकता नहीं हो जाती तब तक स्वराज हासिल नहीं कर सकते। महात्मा गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खां की उस कहावत को भी दोहराया कि हिंदू-मुस्लिम देश की दो आंखें हैं। असहयोग आंदोलन के दौरान भी गांधी जी 12 अक्टूबर 1920 में दूसरी बार अलीगढ़ आए। तब उन्होंने एएमयू के स्ट्रेची हॉल के सामने भाषण दिया। तब छात्रों ने उन्हें यूनियन हाल में छात्र संघ की पहली आजीवन सदस्यता दी थी। बापू तब हबीब बाग (अब एकेडमिक स्टाफ कॉलेज) में ठहरे थे। जहां अब्दुल मजीद ख्वाजा का मकान था। तीसरी बार पांच नवंबर 1929 को पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ अलीगढ़ आए थे। छात्रों से बापू ने खादी का इस्तेमाल करने की अपील की थी। गांधीजी की अपील पर छात्रों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई। एएमयू के पूर्व छात्र मुहम्मद हरसत मोहानी ने रसलगंज में खादी भंडार खोलकर स्वदेशी आंदोलन का हवा दी थी। बापू ने अब्दुल मजीद ख्वाजा एवं छात्रसंघ के पूर्व सचिव अब्दुल बारी को कई पत्र भी लिखे, जो आज भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मौलाना आजाद लाइब्रेरी में संरक्षित हैं।
156 साल पुराना इतिहास संजोए है रेलवे स्टेशन
देश-विदेश में अलीगढ़ की पहचान ताला व तालीम के रूप में है। अलीगढ़ शहर देश की राजधानी दिल्ली से करीब 140 किलोमीटर दूर स्थित है। दिल्ली-हावड़ा के अति व्यस्ततम एवं महत्वपूर्ण रेलवे ट्रैक पर बने इस रेलवे स्टेशन का इतिहास करीब 156 साल पुराना है। अंग्रेजी हुकूमत के समय वर्ष 1865-66 में इस स्टेशन की आधारशिला रखी गई थी। करीब 80 साल तक अंग्रेजों के हाथों में स्टेशन की बागडोर रही।
विज्ञापन
विज्ञापन
देश को आजादी दिलाने में अलीगढ़ की माटी ने ऐसे सपूतों को पैदा किया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने के लिए महात्मा गांधी तीन बार अलीगढ़ की सरजमीं पर आए। पहली बार महात्मा गांधी वर्ष 1916 में ट्रेन से यहां आए, तब छात्रों व युवाओं ने उनका जोरदार स्वागत किया था। गांधी जी जब भी अलीगढ़ आए तो छात्रों से जरूर रूबरू हुए। उन्होंने युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने और स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित किया था। इनके अलावा, ऐसे में भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों ने भी यहां अपना ठिकाना बनाया और आजादी का बिगुल फूंका था।
‘स्वतंत्रता संग्रामों की अमर गाथा’ पुस्तक में चिंतामिण शुक्ल ने लिखा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1916 को पहली बार अलीगढ़ स्टेशन पर आए थे। उन्हें देखने के लिए स्टेशन पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। गांधी जी सिर पर पगड़ी और अंगरखा धोती पहने गुजराती वेषभूषा में थे। स्टेशन पर छात्रों ने गांधी जी का जोरदार स्वागत किया। स्टेशन से मालवीय पुस्तकालय तक जुलूस के साथ ले जाया गया। खचाखच भरे मैदान में उन्होंने हिंदूृ-मुस्लिम एकता पर भाषण देते हुए कहा कि जब तक हममें एकता नहीं हो जाती तब तक स्वराज हासिल नहीं कर सकते। महात्मा गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खां की उस कहावत को भी दोहराया कि हिंदू-मुस्लिम देश की दो आंखें हैं। असहयोग आंदोलन के दौरान भी गांधी जी 12 अक्टूबर 1920 में दूसरी बार अलीगढ़ आए। तब उन्होंने एएमयू के स्ट्रेची हॉल के सामने भाषण दिया। तब छात्रों ने उन्हें यूनियन हाल में छात्र संघ की पहली आजीवन सदस्यता दी थी। बापू तब हबीब बाग (अब एकेडमिक स्टाफ कॉलेज) में ठहरे थे। जहां अब्दुल मजीद ख्वाजा का मकान था। तीसरी बार पांच नवंबर 1929 को पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ अलीगढ़ आए थे। छात्रों से बापू ने खादी का इस्तेमाल करने की अपील की थी। गांधीजी की अपील पर छात्रों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई। एएमयू के पूर्व छात्र मुहम्मद हरसत मोहानी ने रसलगंज में खादी भंडार खोलकर स्वदेशी आंदोलन का हवा दी थी। बापू ने अब्दुल मजीद ख्वाजा एवं छात्रसंघ के पूर्व सचिव अब्दुल बारी को कई पत्र भी लिखे, जो आज भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मौलाना आजाद लाइब्रेरी में संरक्षित हैं।
विज्ञापन
156 साल पुराना इतिहास संजोए है रेलवे स्टेशन
देश-विदेश में अलीगढ़ की पहचान ताला व तालीम के रूप में है। अलीगढ़ शहर देश की राजधानी दिल्ली से करीब 140 किलोमीटर दूर स्थित है। दिल्ली-हावड़ा के अति व्यस्ततम एवं महत्वपूर्ण रेलवे ट्रैक पर बने इस रेलवे स्टेशन का इतिहास करीब 156 साल पुराना है। अंग्रेजी हुकूमत के समय वर्ष 1865-66 में इस स्टेशन की आधारशिला रखी गई थी। करीब 80 साल तक अंग्रेजों के हाथों में स्टेशन की बागडोर रही।
विज्ञापन