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Qazi Abdul Sattar: जहां उर्दू बोली-समझी जाती है, वहां काजी सत्तार के उपन्यास के कद्रदानों की भरमार

Sun, 29 Oct 2023 03:11 AM IST
चमन शर्मा इकराम वारिस, अमर उजाला, अलीगढ़
इकराम वारिस, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Sun, 29 Oct 2023 03:11 AM IST
सार

सीतापुर जिले के गांव मछरेटा में जमींदार परिवार में 8 फरवरी 1933 को जन्मे काजी अब्दुल सत्तार एएमयू में वर्ष 1957 में ‘उर्दू शायरी में कुनूतियात’ विषय पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। वह उर्दू के प्रवक्ता नियुक्त हुए। वर्ष 1967 में रीडर, वर्ष 1981 में प्रोफेसर, 1987 में विभाग के चेयरमैन बने और 1992 में सेवानिवृत्त हुए। 29 अक्तूबर 2018 में काजी सत्तार ने अंतिम सांस ली।

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Lots of appreciation for Qazi Abdul Sattar novel
काजी अब्दुल सत्तार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उर्दू के मशहूर उपन्यासकार काजी अब्दुल सत्तार की पुण्यतिथि 29 अक्तूबर को है। शिकस्त की आवाज, मज्जू भैया, दारा शिकोह, ग़ालिब सहित कई बेहतरीन उपन्यास के लिए उन्हें 41 वर्ष की आयु में पद्मश्री सम्मान मिला था। उनके उपन्यासों के भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया में लोग उनके मुरीद हैं। 

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सीतापुर जिले के गांव मछरेटा में जमींदार परिवार में 8 फरवरी 1933 को जन्मे काजी अब्दुल सत्तार एएमयू में वर्ष 1957 में ‘उर्दू शायरी में कुनूतियात’ विषय पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। वह उर्दू के प्रवक्ता नियुक्त हुए। वर्ष 1967 में रीडर, वर्ष 1981 में प्रोफेसर, 1987 में विभाग के चेयरमैन बने और 1992 में सेवानिवृत्त हुए। 29 अक्तूबर 2018 में काजी सत्तार ने अंतिम सांस ली।
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काजी सत्तार को मिले सम्मान
1973 : प्रथम गालिब पुरस्कार
1974 : पद्मश्री
1977 : मीर अवॉर्ड
1977 : यूपी उर्दू अकादमी पुरस्कार
1987 : अल्मी पुरस्कार
1987 : राष्ट्रीय पुरस्कार यूपी सरकार
1996 : निशान-ए-सर सैयद पुरस्कार
1998 : ज्ञानेंद्र पुरस्कार
2002 : बहादुर शाह जफर पुरस्कार
2005 : अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दोहा (कतर)
2006 : राष्ट्रीय इकबाल पुरस्कार
2008 : आईएसटी विश्वविद्यालय उर्दू शिक्षक पुरस्कार
2011 : यूपी हिंदी संस्थान का प्रथम पुरस्कार

जोश पर पाकिस्तान में की गई आलोचना का दिया था करारा जवाब : प्रेम कुमार

पाकिस्तान में जोश मलिहाबादी पर की गई तनकीद (आलोचना) का काजी अब्दुल सत्तार ने करारा जवाब दिया था। इसका जिक्र साहित्यकार प्रेम कुमार ने उनके साक्षात्कार पर आधारित अपनी पुस्तक “बातों-मुलाकातों में काजी अब्दुल सत्तार” में किया है। इसी किताब का एक अंश देखें - '' किसी का अहद-ए-जवानी में पारसा होना / कसम खुदा की ये तौहीन है जवानी की! जोश मलिहाबादी, मिर्जा गालिब के बाद की कतार के उन कम शायरों में से थे, जिनमें जमाने को देखने, दिखाने का सलीका और शऊर था। जन्मे तो अवध प्रांत के लखनऊ (मलिहाबाद) में, लेकिन साठ साल तक हिंदुस्तान में रहने के बाद अचानक पाकिस्तान जाने की तैयारी कर ली। फिर तो पंडित नेहरू के मनाने पर भी नहीं माने। जोश के बहुत हमनवां दोस्त और हिमायती थे उपन्यासकार काजी अब्दुल सत्तार।

' यादों की बारात ' शीर्षक से
जोश की आत्मकथा प्रकाशित हुई तो कुछ पाकिस्तानी आलोचकों ने उसमें कुछ झूठे होने का आरोप लगा दिया। फिर तो काजी अब्दुल सत्तार, उनको उनके ही मुंह से बहुत कंगाल होना कबूल करवाते हुए, आलोचकों पर चढ़ बैठे। जानते हो, मलिहाबाद के तालुकेदार के बेटे थे जोश! तालुकेदार की हैसियत - गुड़गुड़ी, तुड़तुड़ी, हाथी, पतुरिया, कर्जा, घंटा और अदालत, जिस तालुकेदार की रिहाइश में न हो वह तालुकेदार नहीं। गुड़गुड़ी माने हुक्का तो तुड़तुड़ी = गाली देने वालीजबान, तालुकेदार अस्सी साल का हो तब भी खिदमत में पततुरिया रहेगी सोलह साल की ही। तुम्हारी औकात कि तुम जोश को झूठा बता दो! जोश के मयार और काजी की बेबाकी को सलाम।

पढ़ाते समय उस वक्त की तस्वीरें खींच देते थे : प्रो. फरीदी

 एएमयू के उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो. कमरुल हुदा फरीदी ने कहा कि कुछ लोगों की शख्सियत ऐसी होती है कि उन्हें देखकर आप प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे काजी अब्दुल सत्तार थे। वह अंदर और बाहर से एक मजबूत इंसान थे। काजी अब्दुल सत्तार के उपन्यास में उनकी जिंदादिली और बेबाक जिंदगी का अक्स दिखता है। अपने सिद्धांत से कभी समझौता नहीं किया। शिक्षक बेहतर थे। पढ़ाने का अंदाज अलहदा था। पढ़ाने के दौरान उस वक्त की तस्वीरें खींच देते थे। मानो आंखों के सामने वह मंजर चल रहा हो।

उपन्यास और कहानियों में जमींदारी का अक्स : प्रो. तारिक
एएमयू के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. तारिक छतारी ने कहा कि काजी अब्दुल सत्तार के उपन्यास और कहानियों में जमींदारी का अक्स दिखता है। आधुनिक और परंपरागत दोनों जगह उनकी कहानियों और उपन्यास में देखने को मिलता है। उनके उपन्यास में ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र है। वह उस दौर की बातों को आज से जोड़कर लिखते थे।

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