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महिला दिवसः खुद की मेहनत और मां की तपस्या से पा लिया मुकाम
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सराक्षी श्रीवास्तव अपनी मां रीना श्रीवास्तव के साथ।
- फोटो : CITY OFFICE
इकराम वारिस
सामाजिक बंदिशों, सगे-संबंधियों के तानों और पारिवारिक समस्याओं के बावजूद शहर की बेटियों ने वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसका सपना उन्होंने खुद या फिर उनके घरवालों ने देखा था। धुन की पक्की ये बेटियां सफलता के नए आयाम लिखने को तैयार हैं। बेटियों की इस सफलता के पीछे उनकी मांओं की तपस्या भी है, जो विपरीत परिस्थितियों में ढाल बनकर खड़ी हो गईं और बेटी तक आंच नहीं आने दी। जब भी बेटी हताश होती तो एक गुरु की तरह उनका मार्गदर्शन करतीं और उनको सफल होने के लिए प्रेरित करतीं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शहर की कुछ ऐसी ही बेटियों और उनकी मांओं पर पेश है रिपोर्ट -
मां के परिश्रम व खुद की मेहनत से बिखेरी मुस्कान
यूपी महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मुस्कान मलिक की मां अनीसा मलिक कहती हैं, जब बेटी ने आठ साल की उम्र में पहली बार बल्ला पकड़ा तो सगे-संबंधियों ने तारीफ करने की बजाय उलाहना देना शुरू कर दिया। कहा, लड़की का क्रिकेट खेलना ठीक नहीं है, यह लड़कों को ही जंचता है। लेकिन मैंने, लोगों की रायशुमारी को कभी तवज्जो नहीं दी, सिर्फ उनकी बातों को सुनती रही। बेटी के सपने को पूरा करने के लिए मुश्किलों का भी सामना किया। आज मुस्कान की मेहनत और लगन का ही नतीजा है कि वह यूपी महिला क्रिकेट टीम की कप्तान है। जमालपुर निवासी अनीसा बताती हैं, मुस्कान को क्रिकेट को लेकर जुनून है, जब भी अलीगढ़ आती है तो क्रिकेट एकेडमी में प्रैक्टिस करने के बाद घर की छत पर बने नेट में प्रैक्टिस करती है। क्रिकेट के कारण ही उसकी पढ़ाई ठीक से नहीं हुई या यूं कहें कि उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता। फिलहाल, वह अरबी बोर्ड से हाईस्कूल समकक्ष की पढ़ाई कर रही है। अनीसा का कहना है, उन्हें बेटी पर नाज है, आज उसकी वजह से उन्हें सम्मान मिल रहा है।
जी-तोड़ मेहनत और धुन की पक्की सोनिया बनीं सोना
सिविल थाने के सामने स्थित एडीएम कॉलोनी की रहने वाली सोनिया हाल ही में झारखंड महिला क्रिकेट टीम की उप कप्तान चुनी गई हैं। यह मुमकिन हो पाया है, सोनिया की जी-तोड़ मेहनत और लगन की वजह से। इस उपलब्धि पर मां चंद्रवती को अपनी बेटी पर नाज है। वह कहती हैं, सोनिया ने छह साल की उम्र से क्रिकेट खेलना शुरू किया था। अपने खेल में निखार लाने के लिए जमकर मेहनत करती है। वह पहले उत्तर प्रदेश से खेल रही थी, लेकिन कुछ वर्षों बाद झारखंड को अपना नया ठिकाना बनाया। अलग-अलग आयु वर्ग में उसने लगातार शानदार प्रदर्शन किया है और इसी प्रदर्शन के बूते उसे झारखंड की महिला क्रिकेट टीम का उप कप्तान बनाया गया है। चंद्रवती ने बताया, बेटी के क्रिकेट खेलने को लेकर किसी ने सामने आपत्ति तो नहीं की लेकिन पीठ पीछे बातें जरूर हुईं। मगर मैंने, इसकी परवाह नहीं की, बल्कि सोनिया को अच्छा क्रिकेटर बनने के लिए पूरा मौका दिया। उसने भी परिवार को निराश नहीं किया। उम्मीद है कि एक दिन वह नीली जर्सी में जरूर दिखेगी।
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सराक्षी ने कंपनी सेक्रेटरी बन पिता का सपना किया पूरा
सराय नवाब की रीना श्रीवास्तव की बेटी सराक्षी ने कंपनी सेक्रेटरी की परीक्षा पास करके अपने स्वर्गीय पिता राकेश श्रीवास्तव का सपना पूरा किया। रीना कहती हैं, उनके पति ने छोटी बेटी को कंपनी सेक्रेटरी बनाने का सपना देखा था, लेकिन दुर्योग से वर्ष 2015 में वह हम सबको छोड़कर स्वर्गलोक वासी हो गए। इस वज्रपात से पूरा परिवार सदमे में था। पति के गुजर जाने के बाद दोनों बेटियों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। ऐसे में तमाम मुश्किल हालातों का डटकर सामना किया और बेटियों से कहा कि वह मन लगाकर पढ़ाई करें। सराक्षी ने भी पिता के सपने को पूरा करने के लिए दिन रात एक कर दिया। पांच साल में जब सराक्षी ने कंपनी सेक्रे टरी की परीक्षा पास की, तो फिर सबकी आंखों में आंसू आ गए लेकिन इस बार ये आंसू खुशी के थे। रीना बताती हैं, उनकी उम्मीदों पर बेटियां खरा सोना निकलीं। बड़ी बेटी फार्मेसी कॉलेज में लेक्चरर हैं।
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सामाजिक बंदिशों, सगे-संबंधियों के तानों और पारिवारिक समस्याओं के बावजूद शहर की बेटियों ने वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसका सपना उन्होंने खुद या फिर उनके घरवालों ने देखा था। धुन की पक्की ये बेटियां सफलता के नए आयाम लिखने को तैयार हैं। बेटियों की इस सफलता के पीछे उनकी मांओं की तपस्या भी है, जो विपरीत परिस्थितियों में ढाल बनकर खड़ी हो गईं और बेटी तक आंच नहीं आने दी। जब भी बेटी हताश होती तो एक गुरु की तरह उनका मार्गदर्शन करतीं और उनको सफल होने के लिए प्रेरित करतीं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शहर की कुछ ऐसी ही बेटियों और उनकी मांओं पर पेश है रिपोर्ट -
मां के परिश्रम व खुद की मेहनत से बिखेरी मुस्कान
यूपी महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मुस्कान मलिक की मां अनीसा मलिक कहती हैं, जब बेटी ने आठ साल की उम्र में पहली बार बल्ला पकड़ा तो सगे-संबंधियों ने तारीफ करने की बजाय उलाहना देना शुरू कर दिया। कहा, लड़की का क्रिकेट खेलना ठीक नहीं है, यह लड़कों को ही जंचता है। लेकिन मैंने, लोगों की रायशुमारी को कभी तवज्जो नहीं दी, सिर्फ उनकी बातों को सुनती रही। बेटी के सपने को पूरा करने के लिए मुश्किलों का भी सामना किया। आज मुस्कान की मेहनत और लगन का ही नतीजा है कि वह यूपी महिला क्रिकेट टीम की कप्तान है। जमालपुर निवासी अनीसा बताती हैं, मुस्कान को क्रिकेट को लेकर जुनून है, जब भी अलीगढ़ आती है तो क्रिकेट एकेडमी में प्रैक्टिस करने के बाद घर की छत पर बने नेट में प्रैक्टिस करती है। क्रिकेट के कारण ही उसकी पढ़ाई ठीक से नहीं हुई या यूं कहें कि उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता। फिलहाल, वह अरबी बोर्ड से हाईस्कूल समकक्ष की पढ़ाई कर रही है। अनीसा का कहना है, उन्हें बेटी पर नाज है, आज उसकी वजह से उन्हें सम्मान मिल रहा है।
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जी-तोड़ मेहनत और धुन की पक्की सोनिया बनीं सोना
सिविल थाने के सामने स्थित एडीएम कॉलोनी की रहने वाली सोनिया हाल ही में झारखंड महिला क्रिकेट टीम की उप कप्तान चुनी गई हैं। यह मुमकिन हो पाया है, सोनिया की जी-तोड़ मेहनत और लगन की वजह से। इस उपलब्धि पर मां चंद्रवती को अपनी बेटी पर नाज है। वह कहती हैं, सोनिया ने छह साल की उम्र से क्रिकेट खेलना शुरू किया था। अपने खेल में निखार लाने के लिए जमकर मेहनत करती है। वह पहले उत्तर प्रदेश से खेल रही थी, लेकिन कुछ वर्षों बाद झारखंड को अपना नया ठिकाना बनाया। अलग-अलग आयु वर्ग में उसने लगातार शानदार प्रदर्शन किया है और इसी प्रदर्शन के बूते उसे झारखंड की महिला क्रिकेट टीम का उप कप्तान बनाया गया है। चंद्रवती ने बताया, बेटी के क्रिकेट खेलने को लेकर किसी ने सामने आपत्ति तो नहीं की लेकिन पीठ पीछे बातें जरूर हुईं। मगर मैंने, इसकी परवाह नहीं की, बल्कि सोनिया को अच्छा क्रिकेटर बनने के लिए पूरा मौका दिया। उसने भी परिवार को निराश नहीं किया। उम्मीद है कि एक दिन वह नीली जर्सी में जरूर दिखेगी।
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सराक्षी ने कंपनी सेक्रेटरी बन पिता का सपना किया पूरा
सराय नवाब की रीना श्रीवास्तव की बेटी सराक्षी ने कंपनी सेक्रेटरी की परीक्षा पास करके अपने स्वर्गीय पिता राकेश श्रीवास्तव का सपना पूरा किया। रीना कहती हैं, उनके पति ने छोटी बेटी को कंपनी सेक्रेटरी बनाने का सपना देखा था, लेकिन दुर्योग से वर्ष 2015 में वह हम सबको छोड़कर स्वर्गलोक वासी हो गए। इस वज्रपात से पूरा परिवार सदमे में था। पति के गुजर जाने के बाद दोनों बेटियों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। ऐसे में तमाम मुश्किल हालातों का डटकर सामना किया और बेटियों से कहा कि वह मन लगाकर पढ़ाई करें। सराक्षी ने भी पिता के सपने को पूरा करने के लिए दिन रात एक कर दिया। पांच साल में जब सराक्षी ने कंपनी सेक्रे टरी की परीक्षा पास की, तो फिर सबकी आंखों में आंसू आ गए लेकिन इस बार ये आंसू खुशी के थे। रीना बताती हैं, उनकी उम्मीदों पर बेटियां खरा सोना निकलीं। बड़ी बेटी फार्मेसी कॉलेज में लेक्चरर हैं।

मुस्कान मलिक- फोटो : CITY OFFICE

सोनिया- फोटो : CITY OFFICE