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गौरैया बचाएं तो टिड्डी खुद भाग जाए

Tue, 02 Jun 2020 01:48 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 02 Jun 2020 01:48 AM IST
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If the sparrow is saved, the locust escapes itself
गौरैया । - फोटो : CITY OFFICE
आशीष निगम
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पूरे देश में कोरोना संकट के बीच टिड्डी संकट पैदा हो गया है। जिससे हजारों हेक्टेयर फसल नष्ट हो चुकी है और इतनी ही फसल और खराब हो रही है। हर दिन ये नुकसान बढ़ता जा रहा है। देश पहले से ही कोविड-19 के कारण खाद्यान्न संकट से जूझ रहा है, टिड्डी संकट ने इसमें और इजाफा कर दिया है। इस संकट को लेकर एएमयू के भूगोल विभाग के चेयरमैन प्रो. अतीक अहमद सिद्दीकी कहते हैं कि बड़ा सवाल ये है कि बगैर मौसम के टिड्डी कहां से आई..? इसके उड़ान का रास्ता क्या है..? रोकने का प्राकृतिक उपाय क्या है..?
उन्होंने बताया कि टिड्डी टोडे की एक प्रजाति है, जो मूलत: गरम, उमस और नमी वाले इलाकों में पैदा होती है। ऐसे में रेगिस्तानी इलाकों में बेमौसम हुई बारिश से इनकी पैदावार हुई है। वैसे टिड्डी जुलाई, अगस्त और सितंबर महीने में कभी कभार आती थी, लेकिन इस बार ये अप्रैल-मई में ही फसलों पर हमलावर हो गई है। इससे पहले वर्ष 1974 में हिंदुस्तान में पहली बार और बीते 1993 में राजस्थान में टिड्डी आईं थी। 26 वर्ष बाद ये पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में टिड्डी ने हिंदुस्तान में कोहराम मचाया है।
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ओमान और लेबनान में वर्ष 2018 के आखिरी और 2019 के शुरुआत में लुबान और मकानू नाम के दो तूफान आए थे। जिससे वहां बहुत अधिक बारिश हुई। इससे उन देशों के रेगिस्तानी इलाके झील में बदल गए। इसी कारण से गरम नमी भरे इलाकों में टिड्डी इतनी बड़ी तादाद में पैदा हुई। इनकी संख्या 400 सौ गुना बढ़ गई है। अब ये पूर्वी अफ्रीका से ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से होते हुए हिंदुस्तान पहुंची है।
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राजस्थान में आई टिड्डी पाकिस्तान के करांची से आई है। अप्रैल से मई के बीच में इन टिड्डी दलों ने देश में 90 हजार हेक्टेयर फसल चट कर डाली। राजस्थान का गंगानगर जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। बाड़मेर बीकानेर और जयपुर में भी नुकसान हुआ है। वहां से टिड्डी दल महाराष्ट्र के विदर्भ, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के झांसी व मिर्जापुर जिलों में पहुंचे है। इन दलों ने मूंग, कद्दू, भिंडी, तरबूज, खरबूज सहित अन्य सभी फसलों को नुकसान पहुंचाया है। एक वर्ग किमी में इनकी संख्या 40 से 80 लाख तक होती है। एक वक्त में टिड्डी का एक झुंड जितना खाते हैं, वह 35000 आदमी के खाने के लिए पर्याप्त है।
टिड्डी तीन महीने में तीन बार अंडे देते हैं। एक टिड्डी एक बार में 80 से 90 अंडे देते हैं। इस तरह से तीन महीने इनकी संख्या 40 लाख से एक करोड़ 20 लाख तक पहुंच जाती है। संभावना है कि आगामी जुलाई अगस्त में इनकी संख्या करोड़ों तक बढ़ जाएगी। इसी वजह किसानों में डर पैदा हो गया है और जायद की फसलें कम क्षेत्रफल में बोई जा रही है। अभी तक टिड्डी दल को भागने के लिए धमाका, धुआं, रसायन, दवाएं प्रयोग की जा रही हैं। लेकिन धमाके का असर अब इन पर नहीं हो रहा है। रसायनों के प्रयोग से बाकी लाभकारी जीवों का नुकसान हो रहा है।

ऐसे में गौरैया ही इसका सबसे बेहतर उपचार है। गौरैया टिड्डी के अंडे को खाती है। टिड्डी को खाती है, जिससे उनकी संख्या स्थिर हो जाएगी। अंडे कम होने से उनकी तादाद नहीं बढ़ेगी। वर्तमान में लॉकडाउन के चलते प्रदूषण कम हुआ है तो गौरैया की तादाद बढ़ी है। अब इसको घर घर संवर्धन किया जाए तो टिड्डी की समस्या कम हो सकती है।
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