सेहत की उड़ान: रोबोटिक सर्जरी व एंजियोप्लास्टी से स्टेंट लगाने तक की सुविधा, एयर एंबुलेंस उतारने की तैयारी
ताला और तालीम की नगरी अब उपचार की नगरी के रूप में अपनी नई पहचान गढ़ रही है। आजादी के बाद से अब तक का सफर तय करते हुए अलीगढ़ ने चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसी छलांग लगाई है कि अब यहां कैंसर से लेकर ओपन हार्ट सर्जरी तक मुमकिन है।
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एक वक्त ऐसा भी था.. जब अलीगढ़ की गलियों में किसी गंभीर बीमारी की आहट होते ही परिजनों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती थीं। एंबुलेंस का सायरन बजते ही जेहन में पहला नाम दिल्ली के एम्स या सफदरजंग अस्पताल का आता था, लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। आज अलीगढ़ में रोबोटिक सर्जरी हो रही है। एंजियोप्लास्टी से स्टेंट लगाने तक की सुविधा है, निकट भविष्य में एयर एंबुलेंस उतारने की तैयारी हो रही है।
ताला और तालीम की नगरी अब उपचार की नगरी के रूप में अपनी नई पहचान गढ़ रही है। आजादी के बाद से अब तक का सफर तय करते हुए अलीगढ़ ने चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसी छलांग लगाई है कि अब यहां कैंसर से लेकर ओपन हार्ट सर्जरी तक मुमकिन है।
गोल्डन ऑवर की अहमियत, जब जिंदगी जीत जाती है
चिकित्सा विज्ञान में गोल्डन ऑवर यानी शुरुआती 180 मिनट किसी भी मरीज की जान बचाने के लिए सबसे कीमती होते हैं। पहले इन तीन घंटों का बड़ा हिस्सा दिल्ली के रास्ते में ट्रैफिक जाम की भेंट चढ़ जाता था, मगर अब अलीगढ़ के चिकित्सकों ने संकल्प लिया है कि ऑपरेशन यहीं होगा। अब यहां एंजियोप्लास्टी से लेकर स्टेंट डालने तक की विश्वस्तरीय सुविधाएं मौजूद हैं। यहां तक कि अब एयर एंबुलेंस की सुविधा शुरू करने पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है, जो अलीगढ़ के स्वास्थ्य ढांचे को सीधे महानगरों की कतार में खड़ा कर देगा।
क्रांतिकारी परिवर्तन, अब तक का सफर
पिछले करीब 80 वर्षों में अलीगढ़ की स्वास्थ्य सेवाओं ने जो सफर तय किया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। वर्ष 2007-08 का वह समय था, जब शहर को अपनी पहली आईसीयू एंबुलेंस और प्राइवेट अस्पतालों में आईसीयू की सुविधा मिली। वर्ष 2009-11 में डायलिसिस और कैथलैब की शुरुआत ने अलीगढ़ को आत्मनिर्भर बनाना शुरू किया। आज शहर में गैस्ट्रो, न्यूरो सर्जन और कार्डियोलॉजिस्ट मौजूद हैं जिनके पास माइक्रोस्कोप से ब्रेन सर्जरी और जॉइंट रिप्लेसमेंट करने की आधुनिक मशीनें हैं। 60 किलोमीटर की परिधि में रहने वाले लाखों लोगों के लिए अलीगढ़ अब उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र है।
जेएन मेडिकल कॉलेज
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का जेएन मेडिकल कॉलेज अपनी सीमाओं को लांघकर अब उत्तर भारत का एक प्रमुख सेंटर बन चुका है। कानपुर तक ऐसा कोई ट्रॉमा सेंटर नहीं है जो जेएन मेडिकल कॉलेज की आधुनिकता का मुकाबला कर सके। यहां के कार्डियोलॉजी विभाग में न केवल एंजियोग्राफी और पेसमेकर की सुविधा है, बल्कि जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों की निशुल्क सर्जरी भी की जा रही है। न्यूरो सर्जरी और कार्डियोलॉजी में उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों (एमसीएच और डीएम) की शुरुआत ने यह सुनिश्चित किया है कि यहां से निकलने वाले डॉक्टर देश की सेवा के लिए पूरी तरह तैयार हों। एमआरआई, सिटी स्कैन और एंडोस्कोपी जैसी सुविधाएं अब आम आदमी की पहुंच में हैं।
15 मिनट का भरोसा, एंबुलेंस नेटवर्क
इलाज तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक मरीज समय पर अस्पताल न पहुंच जाए। जनपद में एंबुलेंस का एक मजबूत नेटवर्क तैयार है, जिसमें 112 और 102 सेवा की गाड़ियां ग्रामीण और शहरी इलाकों में मुस्तैदी से तैनात हैं। एडवांस लाइफ सपोर्ट (एएलएस)- तीन ऐसी एंबुलेंस हैं जो ''चलते-फिरते अस्पताल'' की तरह हैं। इनमें वेंटिलेटर और लाइफ सेविंग उपकरण लगे हैं। इन एंबुलेंसों का लक्ष्य मरीज को महज 15 मिनट में नजदीकी सरकारी अस्पताल पहुंचाना है, ताकि इलाज में एक पल की भी देरी न हो।
सरकारी और निजी क्षेत्र का संगम
कोविड संकट ने जहां पूरी दुनिया को झकझोरा, वहीं इसने अलीगढ़ के सरकारी अस्पतालों के प्रति जनता के विश्वास को मजबूत किया। जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज तक, बुनियादी ढांचे में बड़ा सुधार हुआ है। वहीं, निजी अस्पतालों ने सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं देकर दिल्ली और एनसीआर के बड़े अस्पतालों की निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर दिया है। सबसे राहत की बात यह है कि यह तमाम उपचार बड़े शहरों की तुलना में बहुत कम दर पर उपलब्ध हैं।
चिकित्सा सेवा का नया सूरज
आज अलीगढ़ की 95 फीसदी बीमारियों का इलाज यहीं संभव है। यहां के चिकित्सा क्षेत्र ने न केवल लोगों को सेहत का उपहार दिया है, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। अब यहां का मरीज दिल्ली की सड़कों पर एंबुलेंस में संघर्ष नहीं करता, बल्कि अलीगढ़ के ही किसी अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में नया जीवन पाता है।