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राहुल फिर दौड़ाने आ रहे ‘किसान एक्सप्रेस’
अभिषेक शर्मा
Updated Fri, 30 Sep 2016 01:47 AM IST
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राहुल फिर दौड़ाने आ रहे ‘किसान एक्सप्रेस’
- फोटो : अमर उजाला
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राहुल गांधी पांच साल बाद एक बार फिर ‘किसान एक्सप्रेस’ दौड़ाने आ रहे हैं। बस इस बार कुछ मुद्दे बदले हैं और उनकी इस ‘किसान एक्सप्रेस’ का नाम बदला है। मगर प्रयास वही किसानों की हमदर्दी बटोरने का है।
हालांकि राहुल गांधी के रोड शो, खाट पंचायत और यात्राओं में भीड़ जुट रही है। लोग कांग्रेस के प्रति आकर्षित होते दिख रहे हैं। मगर यह भविष्य के गर्त में है कि क्या पिछली बार की तरह इस बार यह भीड़ वोट में तब्दील हो पाएगी या नहीं?
यमुना एक्सप्रेस-वे निर्माण के समय यमुना पट्टी के गांव टप्पल व भट्टा पारसौल पर हुए आंदोलनों के बाद 2010 में राहुल गांधी ने अपनी कोर टीम के साथ किसान पदयात्रा कर लोगों को खुद से जोड़ने का आह्वान किया।
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भूमि अधिग्रहण बिल पर लोगों की राय जानी और अलीगढ़ में किसान महापंचायत कर उनकी कुछ अन्य समस्याओं से भी रू-ब-रू हुए। हालांकि उनके वायदे के अनुसार यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल को संशोधित भी किया।
मगर चुनाव के समय में राहुल के चेहरे का लाभ कांग्रेस न ले सकी। न तो किसानों ने 2012 के विधानसभा चुनाव में कोई लाभ दिया और न 2014 के लोक सभा चुनाव में किसान कांग्रेस के साथ खड़ा दिखा।
अब एक बार फिर रोजाना तकरीबन चार किमी की जागिंग करने वाले राहुल गांधी रैली, रोड शो व पद यात्रा के जरिये लखनऊ के रास्ते दिल्ली की दूरी तय करने की कवायद में हैं। फंडा बिल्कुल क्लियर है किसान राजनीति, क्योंकि आज भी किसान केवल किसान होता है और उसकी समस्याएं पूरे देश में एक जैसी ही हैं।
किसानों के मुद्दे पर जाति, धर्म और वर्ग की राजनीति कुछ हद तक फीकी पड़ जाती है। किसान राजनीति के इस बाण को तरकश से निकालने वाली कांग्रेस भलीभांति जानती है।
वर्तमान परिस्थितियों में यूपी के किसानों के कर्ज से बड़ा और कोई मंत्र नहीं, जो विपक्षियों को परास्त कर दे। खुद उनकी सरकार में भी किसानों का बड़ा कर्ज माफ किया गया था। उसी मुद्दे को लेकर वह किसानों के बीच और प्रदेश की बेहाल कानून व्यवस्था व विकास व्यवस्था को लेकर शहरी मतदाताओं के बीच जा रहे हैं।
इस बार भी लोग कह रहे हैं कि पहले भी राहुल भइया उनका दर्द जानते रहे। लोग उनसे जुड़ भी रहे हैं। मगर ऊंट किस करवट बैठेगा यह भविष्य तय करेगा।
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हालांकि राहुल गांधी के रोड शो, खाट पंचायत और यात्राओं में भीड़ जुट रही है। लोग कांग्रेस के प्रति आकर्षित होते दिख रहे हैं। मगर यह भविष्य के गर्त में है कि क्या पिछली बार की तरह इस बार यह भीड़ वोट में तब्दील हो पाएगी या नहीं?
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यमुना एक्सप्रेस-वे निर्माण के समय यमुना पट्टी के गांव टप्पल व भट्टा पारसौल पर हुए आंदोलनों के बाद 2010 में राहुल गांधी ने अपनी कोर टीम के साथ किसान पदयात्रा कर लोगों को खुद से जोड़ने का आह्वान किया।
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भूमि अधिग्रहण बिल पर लोगों की राय जानी और अलीगढ़ में किसान महापंचायत कर उनकी कुछ अन्य समस्याओं से भी रू-ब-रू हुए। हालांकि उनके वायदे के अनुसार यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल को संशोधित भी किया।
मगर चुनाव के समय में राहुल के चेहरे का लाभ कांग्रेस न ले सकी। न तो किसानों ने 2012 के विधानसभा चुनाव में कोई लाभ दिया और न 2014 के लोक सभा चुनाव में किसान कांग्रेस के साथ खड़ा दिखा।
अब एक बार फिर रोजाना तकरीबन चार किमी की जागिंग करने वाले राहुल गांधी रैली, रोड शो व पद यात्रा के जरिये लखनऊ के रास्ते दिल्ली की दूरी तय करने की कवायद में हैं। फंडा बिल्कुल क्लियर है किसान राजनीति, क्योंकि आज भी किसान केवल किसान होता है और उसकी समस्याएं पूरे देश में एक जैसी ही हैं।
किसानों के मुद्दे पर जाति, धर्म और वर्ग की राजनीति कुछ हद तक फीकी पड़ जाती है। किसान राजनीति के इस बाण को तरकश से निकालने वाली कांग्रेस भलीभांति जानती है।
वर्तमान परिस्थितियों में यूपी के किसानों के कर्ज से बड़ा और कोई मंत्र नहीं, जो विपक्षियों को परास्त कर दे। खुद उनकी सरकार में भी किसानों का बड़ा कर्ज माफ किया गया था। उसी मुद्दे को लेकर वह किसानों के बीच और प्रदेश की बेहाल कानून व्यवस्था व विकास व्यवस्था को लेकर शहरी मतदाताओं के बीच जा रहे हैं।
इस बार भी लोग कह रहे हैं कि पहले भी राहुल भइया उनका दर्द जानते रहे। लोग उनसे जुड़ भी रहे हैं। मगर ऊंट किस करवट बैठेगा यह भविष्य तय करेगा।