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पद्मभूषण नीरज की दुर्लभ वस्तुएं करेंगे दान ः गुंजन
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मिलन प्रभात गुंजन।
- फोटो : CITY OFFICE
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पद्मभूषण स्वर्गीय गोपाल दास नीरज के 4 जनवरी को होने वाले जन्मदिन पर उनके बेटे मिलन प्रभात गुंजन अलीगढ़ आ गए हैं। जनकपुरी स्थित पैतृक आवास पर मिलन प्रभात गुंजन ने पिता की जयंती पर होने वाले वाले आयोजनों के विषय में बताया। साथ ही पिता के साथ कवि सम्मेलन में मंच को साझा करने की स्मृतियां भी ताजा कीं।
बृहस्पतिवार को अमर उजला से बातचीत में मिलन प्रभात गुंजन ने कहा कि वह पिता की स्मृतियों को सहेज कर रखना चाहते हैं। इसीलिए नुमाइश मैदान में बन रहे संग्रहालय को पिता से जुड़ी दुर्लभ वस्तुएं (पेन, डायरी, हाथ से लिखे पत्र, पुराने फोटो, लिखी गईं किताबों की मूल प्रति आदि) दान दे देंगे। इसके अलावा धर्मपुर कोर्टयार्ड में भी शनिवार शाम पांच बजे से कवि सम्मेलन आयोजित हो रहा है। इसमें कवि अपनी कविताओं के माध्यम से गोपाल दास नीरज के रचना कर्म को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे। नीरज के नाम पर एक ट्रस्ट भी गठित किया है, जिससे नए कवियों व रचनाकारों को बढ़ावा दिया जा सके।
गुंजन कहते हैं कि जब वह छोटे थे तो अपने पिता के साथ कानपुर में कवि सम्मेलन में गए। वहां पर आयोजक ने उनसे पूछा कि क्या कविता पढ़ोगे। इस पर उन्होंने हामी भर दी और पिता (नीरज जी) की ही एक कविता, जो उन्हें याद थी, वही प्रस्तुत कर दी। आयोजक की ओर से उन्हें उस समय 10 रुपये का पुरस्कार दिया गया। उस समय 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद का समय चल रहा था। सैनिकों की मदद के लिए सैनिक कल्याण कोष बनाया गया था। यह 10 रुपये का पुरस्कार उन्होंने सैनिक कोष मेें दे दिया था। जब पापा को बात पता चली तो मुझे लगा नाराज होंगे लेकिन खुशी से उनकी आंखों में आंसू आ गए और मुझे गले लगा लिया।
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बृहस्पतिवार को अमर उजला से बातचीत में मिलन प्रभात गुंजन ने कहा कि वह पिता की स्मृतियों को सहेज कर रखना चाहते हैं। इसीलिए नुमाइश मैदान में बन रहे संग्रहालय को पिता से जुड़ी दुर्लभ वस्तुएं (पेन, डायरी, हाथ से लिखे पत्र, पुराने फोटो, लिखी गईं किताबों की मूल प्रति आदि) दान दे देंगे। इसके अलावा धर्मपुर कोर्टयार्ड में भी शनिवार शाम पांच बजे से कवि सम्मेलन आयोजित हो रहा है। इसमें कवि अपनी कविताओं के माध्यम से गोपाल दास नीरज के रचना कर्म को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे। नीरज के नाम पर एक ट्रस्ट भी गठित किया है, जिससे नए कवियों व रचनाकारों को बढ़ावा दिया जा सके।
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गुंजन कहते हैं कि जब वह छोटे थे तो अपने पिता के साथ कानपुर में कवि सम्मेलन में गए। वहां पर आयोजक ने उनसे पूछा कि क्या कविता पढ़ोगे। इस पर उन्होंने हामी भर दी और पिता (नीरज जी) की ही एक कविता, जो उन्हें याद थी, वही प्रस्तुत कर दी। आयोजक की ओर से उन्हें उस समय 10 रुपये का पुरस्कार दिया गया। उस समय 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद का समय चल रहा था। सैनिकों की मदद के लिए सैनिक कल्याण कोष बनाया गया था। यह 10 रुपये का पुरस्कार उन्होंने सैनिक कोष मेें दे दिया था। जब पापा को बात पता चली तो मुझे लगा नाराज होंगे लेकिन खुशी से उनकी आंखों में आंसू आ गए और मुझे गले लगा लिया।
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