फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Aligarh News ›   Full story of Sweet Chamcham of Iglas Aligarh

Chamcham: ऐसी मिठाई, जो बनती है केवल एक जगह, पर दीवाने है उसके देश-विदेश में, लज़ीज चमचम की मीठी कहानी

Thu, 20 Jul 2023 11:27 AM IST
चमन शर्मा शिवओम शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़
शिवओम शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Thu, 20 Jul 2023 11:27 AM IST
सार

वृंदावन की ऋतंभरा दीदी ने इगलास की चमचम का ओर्डर देकर 250 से 300 पैकट चार-चार पीस के तैयार कराए। उन्होंने चमचम के इन पैकेटों को बार्डर पर फौजी भाईयों के लिए दिया था। पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्दू भी एक बार इगलास से गुजरने के दौरान चमचम लेकर गए थे। भाभी जी घर पर हैं सीरियल में गुलफाम कली का किरदार निभाने वाली फालगुनी राजाणी व सीरियल के लेखक मनोज संतोषी भी चमचम के मुरीद हैं। नेता से लेकर अभिनेता तक इगलास की चमचम का स्वाद ले चुके हैं।

विज्ञापन
Full story of Sweet Chamcham of Iglas Aligarh
इगलास की प्रसिद्ध मिठाई चमचमच - फोटो : शिवओम शर्मा

विस्तार

बर्फी, जलेबी, पेड़ा, लड्डू ऐसी मिठाईयां हैं, जो हर जगह पर तैयार की जाती हैं। पर एक ऐसी मिठाई है, जो भारत ही नहीं पूरे विश्व में केवल एक ही जगह पर बनाई जाती है। वह मिठाई मिले किसी भी शहर में,  पर वह उस एक जगह के नाम से ही जोड़कर बेची जाती है। बात हो रही है उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ जनपद के इगलास में बनने वाली मिठाई चमचम की। चमचम को एक बार खाने के बाद बस दिल से बस यही आवाज आती है मचमच यानि चाहिए और। 

विज्ञापन


इगलास की चमचम, इस मिठाई को इसलिए कहते हैं क्योंकि इस मिठाई के बनने की शुरूआत इगलास से हुई और यह कहीं और नहीं बनती, केवल इगलास में ही बनती है। अगर किसी अन्य शहर में यह बिकती हुई मिलती है, तब भी यह इगलास की चमचम के नाम से ही बेची जाती है। चमचम आखिर इतनी ख्याति प्राप्त मिठाई क्यों है, इसका निर्माण कब से शुरू हुआ, यह कैसे बनती है, देखने में और खाने में कैसी लगती है, यह कहां से खरीदी जा सकती है, ऐसे ही कई सवालों के जवाब आपको चमचम खाने के लिए इगलास तक पहुंचने को मजबूर कर देंगे।
विज्ञापन


इगलास की चमचम को पैक करते कारीगर
विज्ञापन
विज्ञापन


इसलिए रखा इसका चमचम नाम
स्व. लाला रघुवरदयाल उर्फ रग्घा सेठ ने जब पहली बार चमचम बनाने की सोची, तो इस मिठाई के नामकरण को लेकर विचार किया। इस मिठाई के चासनी में डूबे रहने के दौरान चम चम चमकने से ही अचानक उनके दिमाग में इस मिठाई का नाम चमचम रखने की बात आई। तभी से इस मिठाई को चमचम कहा जाने लगा।

चमचम बनाने की तैयारी

79 साल पहले चमचम आई अस्तित्व में
आज से 79 साल पहले 1944 में अलीगढ़ जनपद के इगलास में हलवाई स्व. लाला रघुवरदयाल उर्फ रग्घा सेठ ने चमचम पहली बार बनाई। उस समय रग्घा सेठ हाथों से चमचम को तैयार करते थे। जिसने भी उस समय चमचम पहली बार खाई, वह उसका मुरीद हो गया। उस समय चमचम खाने के बाद लोग कहते थे कि रग्घा सेठ आपने गजब की मिठाई बनाई है। मुंह में रखते ही कुछ क्षण में मिठास घोल देती है। 23 जुलाई 1996 में रग्घा सेठ का देहांत हो गया। चमचम निर्माण के काम को उनके पुत्र दिनेश सिंघल व छोटेलाल ने आगे बढ़ाया और एक विशेष पहचान दिलाई।

मंहगी मिठाई नहीं है चमचम

जब रग्घा सेठ ने चमचम बनाना शुरू किया, तब इसका एक पीस 2 पैसे का मिलता था। अब चमचम 240 रूपये प्रति किलो के हिसाब से मिलती है। एक किलो पर 20 पीस के लगभग चढ़ते हैं। जहां पहले चमचम को मिट्टी के बर्तन में पैक  कर दिया जाता था, अब इसे पॉलिथीन में रखकर गत्ते के डिब्बे में पैक कर दिया जाता है। 

गुलाब जामुन की तरह है चमचम
इगलास की चमचम देखने में लगभग गुलाब जामुन की तरह होती है। इसका रंग भी गुलाब गुलाब जामुन से मिलता जुलता है। गुलाब जामुन थोड़ी नरम होती है, जबकि चमचम रबादार होती है। गुलाब जामुन अगर कोई एक खाएगा, तो चमचम 2 से 3 पीस खा जाएगा।  

इगलास की चमचम को चासनी में सेंकते हुए

ऐसे बनती है शुद्ध और गुणवत्ता से युक्त चमचम
चमचम निर्माता छोटे लाल ने बताया कि चमचम बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध दूध को खट्टा से फाड़कर छैना तैयार किया जाता है। छैना में थोड़ी से सूजी मिलाई जाती है, ताकि उसके गोले बनाए जा सकें। उसमें इलाइची मिलाकर मथते थे। छैना के गोले तैयार कर उन्हें चीनी की चासनी में सेका जाता है। चमचम को ब्राउन रंग की होने तक पकाया जाता है। चमचम में घी या रिफाइंड का प्रयोग नहीं किया जाता। जिसके कारण चमचम खाने से नुकसान भी नहीं होता। चमचम शुद्ध मिठाई है, जिसमें मिलावट की सम्भावना न के बराबर होती  है।

रग्घा सेठ की पुरानी दुकारन

घर पर भी ऐसे बना सकते हैं चमचम
छोटे लाल बताते हैं कि चमचम को घर पर भी आसानी से बनाया जा सकता है। इसके लिए ज्यादा सामान भी की जरूरत नहीं पड़ती है। दूध, इलायची, सूची और चीनी की चासनी हो। दूध को फाड़कर उसमें सूजी, इलाइची मिलाकर गोले तैयार कर लिए जाएं। इन गोलों को चीनी की चासनी में सेक लिया जाए। फिर ठंडा कर लिया जाए और घरवालों, मेहमानों को चमचम खिलाएं।

चमचम 8 से 30 दिन तक सही बनी रहती है

छोट लाल ने बताया कि चमचम को अगर सामान्य तापमान पर रखा जाए, तो यह 8 से 10 दिन तक सही बनी रहती है। अगर चममच को फ्रिज में खुला रखा जाए, तो यह एक महीने तक भी खाने योग्य रहती है। 

चमचम के ये हैं मुरीद
छोटे लाल ने बताया कि वृंदावन की ऋतंभरा दीदी ने इगलास की चमचम का ओर्डर देकर 250 से 300 पैकट चार-चार पीस के तैयार कराए। उन्होंने चमचम के इन पैकेटों को बार्डर पर फौजी भाईयों के लिए दिया था। पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्दू भी एक बार इगलास से गुजरने के दौरान चमचम लेकर गए थे। भाभी जी घर पर हैं सीरियल में गुलफाम कली का किरदार निभाने वाली फालगुनी राजाणी व सीरियल के लेखक मनोज संतोषी भी चमचम के मुरीद हैं। नेता से लेकर अभिनेता तक इगलास की चमचम का स्वाद ले चुके हैं। उत्तर प्रदेश के साथ-साथ हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, दिल्ली, गुजरात, बिहार आदि राज्यों में चमचम के जलवे हैं। इसकी मिठास देश के कौने-कौने तक पहुंच चुकी है। लोग जब कभी अलीगढ़-मथुरा रोड पर रोडवेज बस स्टेंड के सामने गुजरते हैं, तो चमचम खरीदना नहीं भूलते हैं।  

चमचम के गोले बनाते हुए कारीगर

कटोरदान में इगलास की चमचम
पद्मश्री विजेता कवि अशोक चक्रधर ने "कटोरदान में इगलास की चमचम" शीर्षक से कविता लिखी है। इसमें उन्होंने चमचम के महत्व को प्रदर्शित किया है। पुराने समय में चमचम घर के कटोरदान में अपनी जगह बनाए हुए थी, पर आज फ्रिज में रखे कटोरे में इसे देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है और मुंह में पानी आने लगता है।

लज़ीज चमचम मिठाई

ऐसे पहुंचते हैं चमचम की निर्माण नगरी इगलास तक
इगलास अलीगढ़ शहर से 24 किमी दूर अलीगढ़-मथुरा रोड पर स्थित है। अलीगढ़ पहुंचकर पुराने बस स्टेंड से इगलास के लिए बस भी मिलती है। इगलास खैर से 28 किमी, हाथरस शहर से 16 किमी, सासनी से 14 किमी और मथुरा से 40 किमी दूरी पर है। इगलास के रोडवेज बस स्टेंड पर पहुंचते ही, वहां पर 40 से 50 दुकानों पर चमचम आपको बिकती हुई मिल जाएगी। 

चमचम बिना अधूरा है अतिथि सत्कार

इगलास ही नहीं पूरे अलीगढ़ जनपद में किसी के घर आने पर स्वागत में अगर चमचम प्रस्तुत न की जाए, तो सत्कार अधूरा लगता है। मेहमानों को सुबह के नाश्ते में चमचम भी दी जाती  है। ऐसा शायद ही कोई होगा, जो इगलास से गुजरे और चमचम न लेकर जाए। अलीगढ़ के लोगों की रिश्तेदारियों में चमचम की खास मांग होती है। रिश्तेदारों का यही कहना होता है कि हमारे यहां आना, तो चमचम लेकर जरूर आना।

चमचम के लिए चीनी की चासनी तैयार करते हुए

चमचम से जुड़ी खास बातें

  • इगलास की चमचम के आगे फीके हैं सब पकवान
  • चमचम सिर्फ इगलास में ही बनती है
  • इगलास के अलावा ये कहीं नहीं बिकती, अगर बिकती भी है, तो इगलास की चमचम कहकर ही बेची जाती है
  • मथुरा-वृंदावन आने वाले भक्त भी चममच के लिए इगलास तक चले आते हैं
  • चमचम की बिक्री पूरे साल होती है, पर दीवाली पर इसकी डिमांड बढ़ जाती है
  • अलीगढ़ जनपद की मशहूर मिठाई है चमचम
  • चममच इतनी लज़ीत होती है कि एक बार जो खाता है, वह दोबार जरूर मांगता है
  • चमचम बनाने के कारोबार में सैकड़ों लोग रोजगार पा रहे हैं
  • इगलास में रघ्घा सेठ की दुकान के साथ मंगला चमचम वाले, ननुआ मिठाई वाले, बेसवां चमचम वाले, दुर्गा चमचम आदि की दुकानों पर चमचम के चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है
  • अब तो लोग चमचम गिफ्ट में भी देते हैं
  • इगलास की चमचम को जीआई टैग भी मिलने की चर्चा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed