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Aligarh News: चाय की हर चुस्की के साथ गहराती है दोस्ती
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चाय की चुस्की लेते युवा। संवाद
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि कैंपस की पहचान बन चुकी है। यहां हर कप के साथ दोस्ती गहराती है, हर चुस्की के साथ बहस जन्म लेती हैं और यादें बनती हैं। लाइब्रेरी कैंटीन से लेकर हॉस्टल और चाय की दुकानों तक, हर जगह चाय की खुशबू और छात्रों की महफिलें नजर आती हैं।
यूनिवर्सिटी में करीब 37 हजार विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिनमें से 20 से 22 हजार छात्र 20 हॉलों में रहते हैं। सुबह होते ही हर हॉल में चाय की केतली चढ़ जाती है। एक हॉल में प्रतिदिन औसतन 25 लीटर दूध की चाय बनती है। इस तरह पूरे कैंपस में रोज करीब 625 लीटर दूध केवल चाय के लिए खर्च होता है, जिस पर लगभग 40 हजार रुपये प्रतिदिन खर्च किए जाते हैं।
चाय के प्रति छात्रों का लगाव इतना गहरा है कि एक छात्र औसतन दिनभर में पांच से छह कप चाय पी जाता है। अनुमान है कि कैंपस और हॉलों के बाहर स्थित होटलों व कैंटीनों में छात्र प्रतिदिन करीब 1.70 लाख कप चाय पी जाते हैं।लाइब्रेरी कैंटीन, विभागीय कैंटीनों के अलावा सर शाह सुलेमान हॉल, हबीब हॉल और वीएम हॉल के आसपास की चाय दुकानों पर सुबह से देर रात तक रौनक बनी रहती है। यहां चाय के साथ राजनीति, शिक्षा, खेल, शायरी और कॅरिअर तक पर लंबी चर्चाएं होती हैं।
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हर चाय का एक नाम और अपना अलग ही किस्सा
यूनिवर्सिटी के फाइन आर्ट्स विभाग की शोधार्थी सिदरा रिजवी और हाला मसरूर ने एएमयू की चाय संस्कृति को कला के जरिए नया रूप दिया है। दोनों ने 100 इस्तेमाल किए गए टी-बैग्स पर विद्यार्थियों की भावनाओं, यादों और रिश्तों को उकेरा है।
ये टी-बैग्स कैंपस की कैंटीनों और होटलों से जुटाए गए।सिदरा और हाला ने हर टी-बैग को एक अलग एहसास और कहानी का नाम दिया है। किसी पर चाय पे चर्चा, लिखा है तो किसी पर अधूरी कहानी। अब्बा नहीं मानेंगे, अब कब मिलोगे, हॉस्टल की चाय, मां की चाय और अदरक वाली चाय जैसे नाम छात्रों की जिंदगी के उन अनकहे पलों को सामने लाते हैं, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल पाते।
यूनिवर्सिटी के पूर्व सीनियर हॉल गुलजार अहमद ने कहा कि चाय नहीं, बल्कि चाह है। जब किसी को चाहते हैं, तो उसके साथ चाय पीते हैं। यहां के विद्यार्थियों के लिए चाय हर लम्हे को पुरसुकून (संतुष्टि) कर देती है, ये तो वह है जो दिसंबर को जून कर देती है।
आधी रात और गर्म चाय का अलीगढ़ी
अंदाज...जिसका इतिहास भी है खास
1933 में शुरू हुआ था कैफे द लैला, मजाज लखनवी ने भी किया जिक्र
अमर उजाला ब्यूरो
अलीगढ़। आधी रात, गर्म चाय का अपना अलीगढ़ी अंदाज है तो इसका भी खास इतिहास है। आजादी से पहले से चाय के पुराने अड्डे मशहूर रहे हैं, जहां तमाम सियासी, सामाजिक, व्यापारिक व सरकारी अलंबरदारों का जमावाड़ा रहता था और चाय पर चर्चा और बैठकी में शहर की धड़कन बसती थी।
इंकलाबी शायर असरार-उल-हक मजाज भी एएमयू में पढ़ाई के दौरान के दीवाने थे। ये गीतगार जावेद अख्तर के मामा थे। 1932 में एएमयू के पोस्ट ऑफिस के पास उस समय एक कैफे खुला, तो मजाज ने उसका नाम अलिफ लैला सुझाया था। बाद में एक अंग्रेज प्रोफेसर ने इसका नाम कैफे द लैला कर दिया।
चुंगी रोड पर शेरू टी स्टाल का जिक्र तो फिल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह ने भी अपने संस्मरणों में किया है। लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने अपने साक्षात्कारों में यहां तक कहा है कि अलीगढ़ में चाय पीना एक आदत नहीं,एक तहजीब थी। यहां दुनिया और देश की राजनीति पर चर्चा होती है।अब रात की इन बैठकी में सियासी दिग्गजों और अलंबरदारों की दूरी हो गई। लेकिन नई पीढ़ी यानी युवा, छात्र और कामकाजी लोग शामिल होगए।
रात भर गुलजार रहते है चाय के ये अड्डे
गांधी नगर पार्क बस स्टैंड, मेडिकल रोड, शमशाद मार्केट, दोदपुर, रसलगंज, रेलवे स्टेशन के बगल में पान दरीबा, ऊपरकोट जामा मस्जिद, देहली गेट चौराहे पर मुन्ना चाय वाले की दुकान, अनूपशहर रोड, एफएम टावर, मदार गेट के बाहर चाय की दुकान आदि इस शहर में चाय के कुछ ठिकाने ऐसे हैं, जो रात भर गुलजार रहते थे, जिनमें कुछ अभी भी चल रहे हैं। कुछ की जगह बदल गई। अचलताल, केला नगर, गांधीपार्क बस स्टैंड की दुकानें सबसे चर्चित थीं, जो समय के साथ बंद हो गई।
बाजार के साथ बदल गया ट्रेंड
चाय की टपरियों पर डिमांड के अनुसार बिना अदरक की चाय, मलाई वाली चाय, दूध व चाय पत्ती अलग अलग उबली चाय मिलती थी। मगर अब कुछ विशेष ब्रांड वाली चाय की शॉप भी शहर में खुल गई हैं। जिनमें कुछ दिन में खुलती हैं तो कुछ रात में भी खुलती हैं।
चाय के कुछ चलन ये बाकी
-सुबह के समय टहलने जाने वाले कुछ लोग जरूर घंटाघर व बस स्टैंड पर चाय की टपरियों पर जमते हैं।
-एएमयू छात्रों की टुकड़ियां अलग अलग खेमों में शमशाद, मेडिकल, रेलवे स्टेशन व अनूपशहर रोड पर जमती हैं।
-शहर के अन्य कामकाजी युवाओं व छात्रों की टोलियां रामघाट रोड, गांधीपार्क बस स्टैंड पर आज भी जमती हैं।
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यूनिवर्सिटी में करीब 37 हजार विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिनमें से 20 से 22 हजार छात्र 20 हॉलों में रहते हैं। सुबह होते ही हर हॉल में चाय की केतली चढ़ जाती है। एक हॉल में प्रतिदिन औसतन 25 लीटर दूध की चाय बनती है। इस तरह पूरे कैंपस में रोज करीब 625 लीटर दूध केवल चाय के लिए खर्च होता है, जिस पर लगभग 40 हजार रुपये प्रतिदिन खर्च किए जाते हैं।
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चाय के प्रति छात्रों का लगाव इतना गहरा है कि एक छात्र औसतन दिनभर में पांच से छह कप चाय पी जाता है। अनुमान है कि कैंपस और हॉलों के बाहर स्थित होटलों व कैंटीनों में छात्र प्रतिदिन करीब 1.70 लाख कप चाय पी जाते हैं।लाइब्रेरी कैंटीन, विभागीय कैंटीनों के अलावा सर शाह सुलेमान हॉल, हबीब हॉल और वीएम हॉल के आसपास की चाय दुकानों पर सुबह से देर रात तक रौनक बनी रहती है। यहां चाय के साथ राजनीति, शिक्षा, खेल, शायरी और कॅरिअर तक पर लंबी चर्चाएं होती हैं।
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हर चाय का एक नाम और अपना अलग ही किस्सा
यूनिवर्सिटी के फाइन आर्ट्स विभाग की शोधार्थी सिदरा रिजवी और हाला मसरूर ने एएमयू की चाय संस्कृति को कला के जरिए नया रूप दिया है। दोनों ने 100 इस्तेमाल किए गए टी-बैग्स पर विद्यार्थियों की भावनाओं, यादों और रिश्तों को उकेरा है।
ये टी-बैग्स कैंपस की कैंटीनों और होटलों से जुटाए गए।सिदरा और हाला ने हर टी-बैग को एक अलग एहसास और कहानी का नाम दिया है। किसी पर चाय पे चर्चा, लिखा है तो किसी पर अधूरी कहानी। अब्बा नहीं मानेंगे, अब कब मिलोगे, हॉस्टल की चाय, मां की चाय और अदरक वाली चाय जैसे नाम छात्रों की जिंदगी के उन अनकहे पलों को सामने लाते हैं, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल पाते।
यूनिवर्सिटी के पूर्व सीनियर हॉल गुलजार अहमद ने कहा कि चाय नहीं, बल्कि चाह है। जब किसी को चाहते हैं, तो उसके साथ चाय पीते हैं। यहां के विद्यार्थियों के लिए चाय हर लम्हे को पुरसुकून (संतुष्टि) कर देती है, ये तो वह है जो दिसंबर को जून कर देती है।
आधी रात और गर्म चाय का अलीगढ़ी
अंदाज...जिसका इतिहास भी है खास
1933 में शुरू हुआ था कैफे द लैला, मजाज लखनवी ने भी किया जिक्र
अमर उजाला ब्यूरो
अलीगढ़। आधी रात, गर्म चाय का अपना अलीगढ़ी अंदाज है तो इसका भी खास इतिहास है। आजादी से पहले से चाय के पुराने अड्डे मशहूर रहे हैं, जहां तमाम सियासी, सामाजिक, व्यापारिक व सरकारी अलंबरदारों का जमावाड़ा रहता था और चाय पर चर्चा और बैठकी में शहर की धड़कन बसती थी।
इंकलाबी शायर असरार-उल-हक मजाज भी एएमयू में पढ़ाई के दौरान के दीवाने थे। ये गीतगार जावेद अख्तर के मामा थे। 1932 में एएमयू के पोस्ट ऑफिस के पास उस समय एक कैफे खुला, तो मजाज ने उसका नाम अलिफ लैला सुझाया था। बाद में एक अंग्रेज प्रोफेसर ने इसका नाम कैफे द लैला कर दिया।
चुंगी रोड पर शेरू टी स्टाल का जिक्र तो फिल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह ने भी अपने संस्मरणों में किया है। लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने अपने साक्षात्कारों में यहां तक कहा है कि अलीगढ़ में चाय पीना एक आदत नहीं,एक तहजीब थी। यहां दुनिया और देश की राजनीति पर चर्चा होती है।अब रात की इन बैठकी में सियासी दिग्गजों और अलंबरदारों की दूरी हो गई। लेकिन नई पीढ़ी यानी युवा, छात्र और कामकाजी लोग शामिल होगए।
रात भर गुलजार रहते है चाय के ये अड्डे
गांधी नगर पार्क बस स्टैंड, मेडिकल रोड, शमशाद मार्केट, दोदपुर, रसलगंज, रेलवे स्टेशन के बगल में पान दरीबा, ऊपरकोट जामा मस्जिद, देहली गेट चौराहे पर मुन्ना चाय वाले की दुकान, अनूपशहर रोड, एफएम टावर, मदार गेट के बाहर चाय की दुकान आदि इस शहर में चाय के कुछ ठिकाने ऐसे हैं, जो रात भर गुलजार रहते थे, जिनमें कुछ अभी भी चल रहे हैं। कुछ की जगह बदल गई। अचलताल, केला नगर, गांधीपार्क बस स्टैंड की दुकानें सबसे चर्चित थीं, जो समय के साथ बंद हो गई।
बाजार के साथ बदल गया ट्रेंड
चाय की टपरियों पर डिमांड के अनुसार बिना अदरक की चाय, मलाई वाली चाय, दूध व चाय पत्ती अलग अलग उबली चाय मिलती थी। मगर अब कुछ विशेष ब्रांड वाली चाय की शॉप भी शहर में खुल गई हैं। जिनमें कुछ दिन में खुलती हैं तो कुछ रात में भी खुलती हैं।
चाय के कुछ चलन ये बाकी
-सुबह के समय टहलने जाने वाले कुछ लोग जरूर घंटाघर व बस स्टैंड पर चाय की टपरियों पर जमते हैं।
-एएमयू छात्रों की टुकड़ियां अलग अलग खेमों में शमशाद, मेडिकल, रेलवे स्टेशन व अनूपशहर रोड पर जमती हैं।
-शहर के अन्य कामकाजी युवाओं व छात्रों की टोलियां रामघाट रोड, गांधीपार्क बस स्टैंड पर आज भी जमती हैं।