40 वर्ष बाद: छोटे भाई की हत्या में बड़े को उम्रकैद, जमीन के विवाद में हुए हत्याकांड पर आया अदालत का फैसला
इस फैसले पर चंद्रमुखी बताती है कि जब उसके पति की हत्या हुई तो उसका बड़ा बेटा सुभाष आठ व छोटा जुगेंद्र ढाई वर्ष का था। जैसे तैसे बच्चों को पाला और मुकदमे से लेकर बच्चों के लालन-पालन में जमीन तक बिक गई।
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अलीगढ़ में इगलास के गांव नगला चूरा में चालीस वर्ष पहले छोटे भाई की हत्या के आरोप से बचने के लिए बड़े भाई ने खूब जतन किए। मगर चार दशक बाद न्यायालय ने आरोपी को उम्र के आखिरी पड़ाव पर दोषी करार देकर उम्रकैद व जुर्माने की सजा से दंडित किया है। सोमवार को यह फैसला एडीजे प्रथम मनोज कुमार अग्रवाल की अदालत ने जब सुनाया। इसके बाद सजायाफ्ता को अभिरक्षा में लेकर जेल भेज दिया गया।
अभियोजन अधिवक्ता एडीजीसी जेपी राजपूत के अनुसार घटना तीन जून 1983 की है। वादी नगला चूरा की चंद्रमुखी ने चार जून को थाने में तहरीर देकर मुकदमा दर्ज कराया कि उनके ससुर रेवती सिंह ने अपनी पुस्तैनी जमीन का दो बेटों उसके पति रघुनाथ सिंह व जेठ जयपाल सिंह के बीच बंटवारा किया। मगर जेठ जयपाल सिंह अपने हिस्से की जमीन को उसके पति रघुनाथ से बदलना चाहता था। रघुनाथ ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए नकार दिया कि बंटवारा एक बार होता है, बार बार नहीं। इसे लेकर जयपाल के मन में कब्जे की नीयत आ गई और कई बार झगड़े हुए। घटना वाली सुबह महिला का पति खेत से लौटकर चक्की पर आटा पिसवाने गया।
वहां से लौटते समय आरोपी जयपाल व उसके साथ गांव का सोहन सिंह आए और खाना खाकर घर के बाहर आए पति को घेरकर लाठी डंडों से पीटना शुरू कर दिया। शोरशराबे पर परिवार के अन्य लोग एकत्रित हुए, जिन्हें देख हमलावर भाग गए। बाद में नाजुक हालत में रघुनाथ को मेडिकल कॉलेज लाया गया। जहां उनकी मौत हो गई। अगले दिन मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने विवेचना के बाद दोनों आरोपियों पर चार्जशीट दायर की। न्यायालय में सत्र परीक्षण के दौरान सोहन की मौत हो गई। वहीं अब जयपाल को केश डायरी, साक्ष्यों व गवाही के आधार पर अदालत ने दोषी करार देकर सोमवार को उम्रकैद व बीस हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया है।
17 में से मात्र दो गवाह मिले जीवित, तीन द्वितीय गवाहों ने गवाही
एडीजीसी जेपी राजपूत बताते हैं कि इस मुकदमे में कुल 17 गवाह पुलिस चार्जशीट के अनुसार थे। जिनमें से 10 जुलाई 1984 को एडीजे प्रथम की अदालत में पहली गवाही रघुनाथ की पत्नी चंद्रमुखी की और चश्मदीद खचेर सिंह की हुई। इसके बाद दो अगस्त 1984 को हाईकोर्ट ने मामले में स्टे लगा दिया। तब से मुकदमा अलग-अलग चार अदालतों में गया। मगर हाईकोर्ट को पत्राचार के बाद भी कोई अग्रिम आदेश न मिलने के कारण कोई कार्यवाही नहीं हुई। 39 साल बाद इसी वर्ष 14 मार्च को खुद बचाव पक्ष की ओर से एडीजे प्रथम की कोर्ट में यह अर्जी दायर की गई कि पहले दो गवाहों से पुन: जिरह कराई जाए। इस पर वादी चंद्रमुखी को न्यायालय ने तलब किया।
इस पर अधिवक्ता की सलाह से चंद्रमुखी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने गवाह को पुन: तलब करने का आदेश निरस्त करते हुए पुरानी गवाही मानने का आदेश देकर दिन प्रतिदिन सुनवाई के आदेश दिए। साथ में छह माह में निस्तारण को कहा। इसके बाद जब प्रथम दो के बाद शेष पंद्रह गवाह तलाशे गए तो कोई नहीं मिला। मगर एक पोस्टमार्टम, सीएमओ दफ्तर के चालक और थाने के सेवानिवृत्त दरोगा को द्वितीय गवाह के रूप में तलाशा जा सका। जिसमें तीनों ने यह स्वीकारा कि उनके सामने गवाह लिखा पढ़ी किए थे और पूरी प्रक्रिया अपने सामने उन्होंने देखी। इस तरह पांच लोगों की गवाही व मुकदमे की डायरी के आधार पर दोषी करार देकर सजा सुनाई गई।
बिक गई जमीन, बुढ़ापे में मिला सुकून
इस फैसले पर चंद्रमुखी बताती है कि जब उसके पति की हत्या हुई तो उसका बड़ा बेटा सुभाष आठ व छोटा जुगेंद्र ढाई वर्ष का था। जैसे तैसे बच्चों को पाला और मुकदमे से लेकर बच्चों के लालन-पालन में जमीन तक बिक गई। तमाम प्रयास दबाव व समझौते के हुए। मगर वह नहीं मानी। अब चालीस वर्ष बाद भी पुन: जिरह के पीछे उनकी मंशा दबाव की थी। मगर हाईकोर्ट ने उसे राहत दी और पति की हत्या में दोषी को सजा से दिल को सुकून मिला है।