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अलीगढ़ : संस्कृत की दुर्लभ पुस्तकें सहेज रखी हैं देवेंद्र ने
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डॉ. देवेंद्र।
- फोटो : CITY OFFICE
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दुर्लभ पुस्तकों को सहेजना डॉ. देवेंद्र कुमार का शौक है। संस्कृत की दुर्लभ पुस्तकें उन्होंने सहेज रखी हैं। ये पुस्तकें 1948 में नरौरा स्थित गंगा नदी के किनारे उनके पिता को पड़ी हुई मिली थीं।
विकास खंड जवां के गांव कृपारामपुर में रहने वाले डॉ. देवेंद्र कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी की उपाधि हासिल की है। उन्होंने बताया कि उन्हें दुर्लभ पुस्तकें सहेजने का शौक है। उनके पास कई ऐसी पुस्तकें हैं। इनमें प्रस्ताव प्रभाकर है, जो वर्ष 1918 में मोतीलाल बनारसीदास सैद मिट्ठा बाजार लाहौर से प्रकाशित हुई हैं।
इनके अलावा, वर्ष 1932 की पुस्तक अकिंचन कांचनम व 1935 की पुस्तक ब्रह्म सूत्र शंकर भाष्य भी है। डॉ. देवेंद्र ने कहा कि पिता पीतांबर सिंह को वर्ष 1948 में नरौरा स्थित राजघाट मेले के दौरान रेत पर दुर्लभ पुस्तकें पड़ी मिलीं थीं। चूंकि, पिताजी इन पुस्तकों को पढ़ नहीं सकते थे, इसलिए उन्हें संभालकर रख लिया। डॉ. देवेंद्र ने कहा कि उन्होंने जीवनपर्यंत पुस्तकें संभालीं, उनके दुनिया से जाने के बाद वह इन पुस्तकों को संभाल रहे हैं।
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विकास खंड जवां के गांव कृपारामपुर में रहने वाले डॉ. देवेंद्र कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी की उपाधि हासिल की है। उन्होंने बताया कि उन्हें दुर्लभ पुस्तकें सहेजने का शौक है। उनके पास कई ऐसी पुस्तकें हैं। इनमें प्रस्ताव प्रभाकर है, जो वर्ष 1918 में मोतीलाल बनारसीदास सैद मिट्ठा बाजार लाहौर से प्रकाशित हुई हैं।
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इनके अलावा, वर्ष 1932 की पुस्तक अकिंचन कांचनम व 1935 की पुस्तक ब्रह्म सूत्र शंकर भाष्य भी है। डॉ. देवेंद्र ने कहा कि पिता पीतांबर सिंह को वर्ष 1948 में नरौरा स्थित राजघाट मेले के दौरान रेत पर दुर्लभ पुस्तकें पड़ी मिलीं थीं। चूंकि, पिताजी इन पुस्तकों को पढ़ नहीं सकते थे, इसलिए उन्हें संभालकर रख लिया। डॉ. देवेंद्र ने कहा कि उन्होंने जीवनपर्यंत पुस्तकें संभालीं, उनके दुनिया से जाने के बाद वह इन पुस्तकों को संभाल रहे हैं।
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