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अलीगढ़ आया था अबु बशर, नागौरी का भी रहा संपर्क
Sun, 20 Feb 2022 01:23 AM IST
राजेश सिंह
क्राइम डेस्क, अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
क्राइम डेस्क, अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
Published by: राजेश सिंह
Updated Sun, 20 Feb 2022 01:23 AM IST
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प्रतिबंधित संगठन सिमी और उसके माड्यूल्स आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के जिक्र के साथ अलीगढ़ का नाम जुड़ता है। अहमदाबाद में सीरियल बम धमाके में फैसले के बाद यहां भी तमाम चर्चाएं हैं, क्योंकि अलीगढ़ शहर सिमी का गढ़ रहा है। खास बात यह है कि सजा पाने वालों में शामिल अबु बशर कांड के बाद सीधे यहां आया था और एक रात यहां रुका था। इस कांड के मुख्य साजिशकर्ता सफदर नागौरी के भी अलीगढ़ से गहरे संपर्क रहे हैं। हालांकि, एजेंसियों के पास पहले से ये इनपुट थे, मगर दो साल पहले जब सिमी के सदस्य को यहां से दबोचा गया था, तभी दिल्ली स्पेशल सेल ने खुलासा किया था कि अबु बशर 2008 अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद उसी के घर रुका था।
अलीगढ़ आने के इनपुट की 2020 में हुई थी तस्दीक
2008 में अहमदाबाद बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के सरायमीर बीनापारा का आईएम का खास सदस्य अबु बशर अलीगढ़ पहुंचा और एक रात यहां रुकने के बाद आगे निकल गया। इस बात के इनपुट उसी समय एजेंसियों को मिल गए थे। बाद में इस कांड के मुख्य साजिशकर्ता सफदर नागौरी के अलीगढ़ कनेक्शनों का भी इनपुट मिला। मगर तस्दीक नहीं हो पाई थी। हालांकि बाद में अबु बशर व उसके अन्य साथी गिरफ्तार हुए, तब भी ये इनपुट पुष्ट नहीं हो पाए थे। मगर 5 दिसंबर 2020 को दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने सिविल लाइंस इलाके से एक बुजुर्ग व्यक्ति अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया था।
इसकी पहचान 19 साल से फरार सिमी के सक्रिय सदस्य के रूप में हुई। उस समय दिल्ली पुलिस ने बताया था कि बतौर उर्दू व फारसी अनुवादक के रूप में पहचान रखने वाले अब्दुल्ला ने वर्ष 1985 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अरबी में एमए किया था। सिमी के संपर्क में आकर वह सिमी के कार्यक्रमों में शामिल होने लगा। उसे सिमी की मैगजीन के हिंदी वर्जन का संपादक बनाया गया। बाद में वह दिल्ली जामिया नगर में जाकर बस गया। दिल्ली से फरार होने के बाद वह अलीगढ़ आ गया। जिस समय गिरफ्तारी हुई, उस समय दोदपुर इलाके में परिवार के साथ किराये पर रहता था।
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गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस ने बताया था कि वह आतंकी वह अबु बशर से मिला था। 2008 में सीरियल बम धमाकों के बाद अबु बशर अलीगढ़ में अब्दुल्ला के घर रुका था। हालांकि अब्दुल्ला का नाम सिमी के शांत स्वभाव वाले सदस्यों की सूची में था। इसलिए बहुत ज्यादा सक्रियता दिखाई नहीं देती थी। यही वजह रही कि स्थानीय एजेंसियों ने पिछले काफी समय से उस पर ध्यान देना बंद कर दिया था।
ये है सिमी का अलीगढ़ से जुड़ाव, मुख्यालय पर 2001 से ताला
स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) की स्थापना जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई के रूप में अप्रैल 1977 में अलीगढ़ में हुई। उस समय शमशाद मार्केट पर कार्यालय बनाकर प्रो. मो.अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने इसे खड़ा किया। इसे एसआईओ (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन) का दूसरा रूप बताया गया। मगर जैसे-जैसे देश में सांप्रदायिक घटनाओं और देश विरोधी गतिविधियों में 1984 के बाद सिमी कार्यकर्ताओं के नाम सामने आने लगे तो 2001 में प्रतिबंध के बाद से वहां ताला लग गया। हालांकि 2008 में अल्प समय के लिए प्रतिबंध हटा, लेकिन वह फिर बरकरार हो गया।
इसके आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही को प्रतिबंध के बाद जेल गए और रिहा होने के बाद वह आजमगढ़ में अपना क्लीनिक चलाने लगे। शमशाद मार्केट मुख्यालय पर आज भी ताला लगा है और खुफिया निगरानी रहती है। खास बात यह है कि जो उस समय के सक्रिय सदस्यों की सूची खुफिया तंत्र के पास थी, उनमें ज्यादातर या तो बुजुर्ग हो गए हैं, या फिर उनकी सक्रियता खत्म हो गई। कुछ इसके कटरपंथी ग्रुप इंडियन मुजाहिदीन से जुड़कर काम करने लगे थे।
बाटला हाउस कांड के बाद मो.सेफ के अलीगढ़ आने के थे इनपुट
अकेले अबु बशर ही नहीं, उसके दूसरे साथी आजमगढ़ के संजरपुर के मो.सैफ को लेकर भी अलीगढ़ आने के इनपुट रहे हैं। उस समय शोर मचा था कि वह किसी पुलिस अधिकारी के रिश्तेदार के घर आकर ठहरकर गया है। एजेंसियों ने खूब जांच पड़ताल की, मगर इसकी तस्दीक नहीं हो पाई। यह उस समय का वाकया है, जब बाटला हाउस कांड हुआ और उसमें एक इंस्पेक्टर की जान गई। तब एजेंसियों ने उस कांड के फरारों पर फोकस करना शुरू किया। इस दौरान मो.सेफ को लेकर अलीगढ़ आकर रुककर जाने के इनपुट मिले। एक रेलवे टिकट भी मिला। इसे लेकर शहर के होटल, ढाबों व सरायों में कई दिन तक जांच पड़ताल चली। मगर इसकी तस्दीक आज तक नहीं हो सकी।
30 साल से फरार मो. यासीन को आज तक नहीं खोज पाई पुलिस
इसी कड़ी में अलीगढ़ का रहने वाला मोहम्मद यासीन भी है। 30 साल से फरार इस आतंकी को 2010 के दशक में दुबई में देखा गया था। फिर कोई सुराग नहीं है। इनपुट ये मिले थे कि वो पाकिस्तान में शरण पाया हुआ है। 12 अप्रैल 1992 में खुफिया तंत्र ने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी पर उतरे ट्रक में शॉल की गांठ की जांच पर एके-47 बरामद की थी। इस मामले में श्रीनगर का शेख जावेद दबोचा गया था। मगर जमानत पाने के बाद वह फरार होकर पाकिस्तान में जाकर छुप गया। उस समय यह भी खुलासा हुआ था कि यह एके-47 सेंटर प्वाइंट के पास रहने वाले मोहम्मद यासीन को भेजी गई थी। शेख जावेद की गिरफ्तारी होते ही मोहम्मद यासीन भाग गया। इसी बीच उसकी पत्नी सेंटर प्वाइंट वाले मकान को बेचकर भाग गई। मूल रूप से जयगंज खाईडोरा क्षेत्र का रहने यासीन आज तक फरार है। एके-47 बरामदगी से जुड़ा सिविल लाइंस थाने में दर्ज मुकदमा संख्या-144/92 भी दाखिल दफ्तर हो चुका होगा।
--------इन वजहों से आतंकियों के ठिकाने के रूप में कुख्यात रहा अलीगढ़--------
- सिमी की स्थापना के साथ-साथ यहां उसका मुख्यालय तक होना।
- कश्मीर से आने वाले कपड़ों में 1992 में एके-47 छिपाकर लाना।
- नागौरी द्वारा अलीगढ़ की मदद से ब्लास्ट प्लान करने के साक्ष्य मिलना।
- अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद आतंकी का अलीगढ़ रुककर जाना।
- कानपुर धमाकों के बाद एनकाउंटर में मारे व पकड़े आतंकी अलीगढ़ रुके थे।
- कश्मीर के छात्र मन्नान वानी द्वारा एएमयू में ही रहकर पढ़ाई करना।
- फिर एकाएक आतंकी संगठन में शामिल होना, एन्काउंटर में मारा जाना।
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अलीगढ़ आने के इनपुट की 2020 में हुई थी तस्दीक
2008 में अहमदाबाद बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के सरायमीर बीनापारा का आईएम का खास सदस्य अबु बशर अलीगढ़ पहुंचा और एक रात यहां रुकने के बाद आगे निकल गया। इस बात के इनपुट उसी समय एजेंसियों को मिल गए थे। बाद में इस कांड के मुख्य साजिशकर्ता सफदर नागौरी के अलीगढ़ कनेक्शनों का भी इनपुट मिला। मगर तस्दीक नहीं हो पाई थी। हालांकि बाद में अबु बशर व उसके अन्य साथी गिरफ्तार हुए, तब भी ये इनपुट पुष्ट नहीं हो पाए थे। मगर 5 दिसंबर 2020 को दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने सिविल लाइंस इलाके से एक बुजुर्ग व्यक्ति अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया था।
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इसकी पहचान 19 साल से फरार सिमी के सक्रिय सदस्य के रूप में हुई। उस समय दिल्ली पुलिस ने बताया था कि बतौर उर्दू व फारसी अनुवादक के रूप में पहचान रखने वाले अब्दुल्ला ने वर्ष 1985 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अरबी में एमए किया था। सिमी के संपर्क में आकर वह सिमी के कार्यक्रमों में शामिल होने लगा। उसे सिमी की मैगजीन के हिंदी वर्जन का संपादक बनाया गया। बाद में वह दिल्ली जामिया नगर में जाकर बस गया। दिल्ली से फरार होने के बाद वह अलीगढ़ आ गया। जिस समय गिरफ्तारी हुई, उस समय दोदपुर इलाके में परिवार के साथ किराये पर रहता था।
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गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस ने बताया था कि वह आतंकी वह अबु बशर से मिला था। 2008 में सीरियल बम धमाकों के बाद अबु बशर अलीगढ़ में अब्दुल्ला के घर रुका था। हालांकि अब्दुल्ला का नाम सिमी के शांत स्वभाव वाले सदस्यों की सूची में था। इसलिए बहुत ज्यादा सक्रियता दिखाई नहीं देती थी। यही वजह रही कि स्थानीय एजेंसियों ने पिछले काफी समय से उस पर ध्यान देना बंद कर दिया था।
ये है सिमी का अलीगढ़ से जुड़ाव, मुख्यालय पर 2001 से ताला
स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) की स्थापना जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई के रूप में अप्रैल 1977 में अलीगढ़ में हुई। उस समय शमशाद मार्केट पर कार्यालय बनाकर प्रो. मो.अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने इसे खड़ा किया। इसे एसआईओ (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन) का दूसरा रूप बताया गया। मगर जैसे-जैसे देश में सांप्रदायिक घटनाओं और देश विरोधी गतिविधियों में 1984 के बाद सिमी कार्यकर्ताओं के नाम सामने आने लगे तो 2001 में प्रतिबंध के बाद से वहां ताला लग गया। हालांकि 2008 में अल्प समय के लिए प्रतिबंध हटा, लेकिन वह फिर बरकरार हो गया।
इसके आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही को प्रतिबंध के बाद जेल गए और रिहा होने के बाद वह आजमगढ़ में अपना क्लीनिक चलाने लगे। शमशाद मार्केट मुख्यालय पर आज भी ताला लगा है और खुफिया निगरानी रहती है। खास बात यह है कि जो उस समय के सक्रिय सदस्यों की सूची खुफिया तंत्र के पास थी, उनमें ज्यादातर या तो बुजुर्ग हो गए हैं, या फिर उनकी सक्रियता खत्म हो गई। कुछ इसके कटरपंथी ग्रुप इंडियन मुजाहिदीन से जुड़कर काम करने लगे थे।
बाटला हाउस कांड के बाद मो.सेफ के अलीगढ़ आने के थे इनपुट
अकेले अबु बशर ही नहीं, उसके दूसरे साथी आजमगढ़ के संजरपुर के मो.सैफ को लेकर भी अलीगढ़ आने के इनपुट रहे हैं। उस समय शोर मचा था कि वह किसी पुलिस अधिकारी के रिश्तेदार के घर आकर ठहरकर गया है। एजेंसियों ने खूब जांच पड़ताल की, मगर इसकी तस्दीक नहीं हो पाई। यह उस समय का वाकया है, जब बाटला हाउस कांड हुआ और उसमें एक इंस्पेक्टर की जान गई। तब एजेंसियों ने उस कांड के फरारों पर फोकस करना शुरू किया। इस दौरान मो.सेफ को लेकर अलीगढ़ आकर रुककर जाने के इनपुट मिले। एक रेलवे टिकट भी मिला। इसे लेकर शहर के होटल, ढाबों व सरायों में कई दिन तक जांच पड़ताल चली। मगर इसकी तस्दीक आज तक नहीं हो सकी।
30 साल से फरार मो. यासीन को आज तक नहीं खोज पाई पुलिस
इसी कड़ी में अलीगढ़ का रहने वाला मोहम्मद यासीन भी है। 30 साल से फरार इस आतंकी को 2010 के दशक में दुबई में देखा गया था। फिर कोई सुराग नहीं है। इनपुट ये मिले थे कि वो पाकिस्तान में शरण पाया हुआ है। 12 अप्रैल 1992 में खुफिया तंत्र ने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी पर उतरे ट्रक में शॉल की गांठ की जांच पर एके-47 बरामद की थी। इस मामले में श्रीनगर का शेख जावेद दबोचा गया था। मगर जमानत पाने के बाद वह फरार होकर पाकिस्तान में जाकर छुप गया। उस समय यह भी खुलासा हुआ था कि यह एके-47 सेंटर प्वाइंट के पास रहने वाले मोहम्मद यासीन को भेजी गई थी। शेख जावेद की गिरफ्तारी होते ही मोहम्मद यासीन भाग गया। इसी बीच उसकी पत्नी सेंटर प्वाइंट वाले मकान को बेचकर भाग गई। मूल रूप से जयगंज खाईडोरा क्षेत्र का रहने यासीन आज तक फरार है। एके-47 बरामदगी से जुड़ा सिविल लाइंस थाने में दर्ज मुकदमा संख्या-144/92 भी दाखिल दफ्तर हो चुका होगा।
--------इन वजहों से आतंकियों के ठिकाने के रूप में कुख्यात रहा अलीगढ़--------
- सिमी की स्थापना के साथ-साथ यहां उसका मुख्यालय तक होना।
- कश्मीर से आने वाले कपड़ों में 1992 में एके-47 छिपाकर लाना।
- नागौरी द्वारा अलीगढ़ की मदद से ब्लास्ट प्लान करने के साक्ष्य मिलना।
- अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद आतंकी का अलीगढ़ रुककर जाना।
- कानपुर धमाकों के बाद एनकाउंटर में मारे व पकड़े आतंकी अलीगढ़ रुके थे।
- कश्मीर के छात्र मन्नान वानी द्वारा एएमयू में ही रहकर पढ़ाई करना।
- फिर एकाएक आतंकी संगठन में शामिल होना, एन्काउंटर में मारा जाना।