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दंगे के आरोपी से हुआ बरी, पर नहीं मिला हर्जाना
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पुराने शहर में वर्ष 1986 में हुए सांप्रदायिक दंगे के आरोप में मो.कामिल को फंसाना पुलिस प्रशासन को आज तक महंगा साबित हो रहा है। अदालत ने दंगे के उस मुकदमे से मो.कामिल को यह कहते हुए बरी कर दिया कि पुलिस कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाई। इससे प्रतीत होता है कि उसे द्वेषवश मुकदमे में आरोपी बनाया गया। इस आदेश के बल पर कामिल ने मानहानि का वाद दायर किया और उसे भी वह जीत गया। अदालत ने मानहानि के वाद में 19 हजार हर्जाने के आदेश दिए। मगर आज तक उसे यह हर्जाना नहीं मिला, जो ब्याज सहित बढ़कर अब 2.30 लाख रुपये हो रहा है। इसे लेकर सिविल न्यायालय ने प्रदेश के डीजीपी, डीएम, एसएसपी आदि को नोटिस जारी कर स्पष्ट तौर पर कहा है कि क्यों न सरकारी संपत्ति कुर्क कर व नीलाम कर कामिल को दिए जाने वालेे हर्जाने की वसूली की जाए।
कोतवाली सराय मियां निवासी मो.कामिल के अधिवक्ता रविंद्र शर्मा व दिवाकर अग्रवाल के अनुसार वर्ष 1986 में हुए सांप्रदायिक दंगे में कामिल आदि के खिलाफ एक मुकदमा कोतवाली में दर्ज कराया गया, जिसकी विवेचना सीबीसीआईडी स्तर से हुई और जांच एजेंसी ने उसमें कामिल आदि पर चार्जशीट दायर कर दी। दौरान-ए-सत्र परीक्षण पुलिस कोई साक्ष्य व गवाह कामिल के खिलाफ पेश न कर सकी। इस पर अदालत ने यह कहते हुए मुकदमे से कामिल को बरी किया कि प्रतीत होता है कि मुकदमा द्वेषवश दायर किया गया था। इस पर कामिल ने डीजीपी, डीएम, एसएसपी, कोतवाल आदि को पार्टी बनाते हुए मानहानि का वाद दायर कर दिया, जिसमें 13 फरवरी 1991 में अदालत ने कामिल के पक्ष में आदेश जारी करते हुए विपक्षियों को आदेश दिया कि वह पीड़ित को हर्जाने के रूप में 19 हजार रुपये का भुगतान करें। इसके बाद प्रशासन की ओर से आदेश के खिलाफ याचिका दायर की गई, मगर उसमें भी प्रशासन 2002 में हार गया। इस पर कामिल ने 2014 में फिर हर्जाना भुगतान संबंधी याचिका दायर की, जिस पर अदालत स्तर से बार-बार पुलिस प्रशासन पक्ष को तलब किया जा रहा है। मगर कोई हाजिर नहीं हो रहा। इस पर अब सिविल जज सीनियर डिवीजन के न्यायालय ने प्रदेश के डीजीपी, डीएम अलीगढ़ व एसएसपी अलीगढ़ को नोटिस जारी अंतिम अवसर प्रदान करते हुए कहा है कि वह सरकार की ओर से पैरवी कराते हुए डिक्रीधारी कामिल को भुगतान अदा कराया जाना सुनिश्चित करें, अन्यथा राज्य सरकार की संपित्त कुर्क व नीलाम कर धनराशि वसूल की जाएगी। इस मामले में अब अदालत में 7 अगस्त तारीख नियत है। वहीं हर्जाना राशि 19 हजार रुपये पर 18 फीसदी ब्याज दर से बढ़कर 2.30 लाख रुपये हो गई है।
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कोतवाली सराय मियां निवासी मो.कामिल के अधिवक्ता रविंद्र शर्मा व दिवाकर अग्रवाल के अनुसार वर्ष 1986 में हुए सांप्रदायिक दंगे में कामिल आदि के खिलाफ एक मुकदमा कोतवाली में दर्ज कराया गया, जिसकी विवेचना सीबीसीआईडी स्तर से हुई और जांच एजेंसी ने उसमें कामिल आदि पर चार्जशीट दायर कर दी। दौरान-ए-सत्र परीक्षण पुलिस कोई साक्ष्य व गवाह कामिल के खिलाफ पेश न कर सकी। इस पर अदालत ने यह कहते हुए मुकदमे से कामिल को बरी किया कि प्रतीत होता है कि मुकदमा द्वेषवश दायर किया गया था। इस पर कामिल ने डीजीपी, डीएम, एसएसपी, कोतवाल आदि को पार्टी बनाते हुए मानहानि का वाद दायर कर दिया, जिसमें 13 फरवरी 1991 में अदालत ने कामिल के पक्ष में आदेश जारी करते हुए विपक्षियों को आदेश दिया कि वह पीड़ित को हर्जाने के रूप में 19 हजार रुपये का भुगतान करें। इसके बाद प्रशासन की ओर से आदेश के खिलाफ याचिका दायर की गई, मगर उसमें भी प्रशासन 2002 में हार गया। इस पर कामिल ने 2014 में फिर हर्जाना भुगतान संबंधी याचिका दायर की, जिस पर अदालत स्तर से बार-बार पुलिस प्रशासन पक्ष को तलब किया जा रहा है। मगर कोई हाजिर नहीं हो रहा। इस पर अब सिविल जज सीनियर डिवीजन के न्यायालय ने प्रदेश के डीजीपी, डीएम अलीगढ़ व एसएसपी अलीगढ़ को नोटिस जारी अंतिम अवसर प्रदान करते हुए कहा है कि वह सरकार की ओर से पैरवी कराते हुए डिक्रीधारी कामिल को भुगतान अदा कराया जाना सुनिश्चित करें, अन्यथा राज्य सरकार की संपित्त कुर्क व नीलाम कर धनराशि वसूल की जाएगी। इस मामले में अब अदालत में 7 अगस्त तारीख नियत है। वहीं हर्जाना राशि 19 हजार रुपये पर 18 फीसदी ब्याज दर से बढ़कर 2.30 लाख रुपये हो गई है।
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