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सिनेमा दिवस : टेंट में बने सिनेमा हॉल में दिखाई जाती थीं फिल्में
सार
शहर में सिनेमा का इतिहास आजादी से पहले का है।शुरुआत में बालकनी नहीं होती थी, आगे की सीट थर्ड क्लास, बीच में सेंकड और पीछे प्रथम श्रेणी हुआ करती थी।मुस्लिम दर्शकों के नमाज पढ़ने के लिए इंटरवल हुआ करता था।
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विस्तार
शहर में सिनेमा का इतिहास आजादी से पहले का है। यहां 1930 से ही कपड़ों के टेंट और टिन के बनाए गए अस्थाई सिनेमा हॉल में मूक फिल्में दिखाई जाती थीं। उन्हीं दिनों रूबी नाम से पहला थिएटर स्थापित हुआ। उसी के बाद निशात, गीतांजलि और तस्वीर महल के नाम से थिएटर स्थापित हुए। 1947 के बाद से 1980 तक तो यहां सिनेमा थिएटरों की लाइन लग गई लेकिन 1990 के बाद से इन सिनेमा हाल में फिल्म देखने वालों का क्रेज भी कम होने लगा। इन सिनेमा हॉल में पसंदीदा हीरो की फिल्में देखने के लिए ऐसी भीड़ उमड़ती थी कि पुलिस को लाठियां तक फटकारनी पड़ती थीं।
लोग ब्लैक में टिकट खरीदकर फिल्म देखते थे। सिनेमा हॉल सीटियों से गूंज उठते थे। एक-एक फिल्म कई-कई हफ्तों तक लगी रहती थी।
स्थिति यह थी कि जिस चौराहे पर तस्वीर महल सिनेमा था, उसका नाम तस्वीर महल चौराहा ही कर दिया गया। मीनाक्षी सिनेमा की वजह से फ्लाईओवर का नाम मीनाक्षी पुल कहा जाने लगा। बदलाव के दौर में कुछ सिनेमाघर पिछड़ते गए। शहर में कुछ सिंगल स्क्त्रस्ीन सिनेमा तो पहले ही बंद हो चुके थे, अब जो बचे हैं, उनके सामने अस्तित्व का संकट है। यही हालात रहे तो जल्द ही गिने चुने सिंगल स्क्त्रस्ीन सिनेमा अतीत की यादों में सिमट कर रह जाएंगे। सिंगल स्क्रीन सिनेमा के परदे से लोगों की आज भी खुशनुमा यादें जुड़ी हुई हैं। इन सिनेमाघरों के जर्जर भवन इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां पर फिल्मी सितारों का दीदार करने के लिए दर्शकों का मेला लगता था।
1930 में बना था पहला बिल्डिंग वाला रूबी सिनेमा हॉल
रूबी होटल के मालिक दया बाबू दीक्षित का कहना है कि 1930 में रूबी सिनेमा हॉल बना था जो कि 1985 के बाद रुबी होटल बन गया था। उनका कहना है कि पहले एक ही पर्दे के सिनेमा हॉल हुआ करते थे। उनमें भी एक रील के बाद दूसरी रील लगाने में करीब तीन से पांच मिनट का समय लगता था। इस अवधि में सिनेमा हॉल के अंदर मनोरंजन के लिए ढोल-ताशे बजवाए जाते थे ताकि दर्शक हंगामा न करें। शुरुआत में बालकनी नहीं होती थी, आगे की सीट थर्ड क्लास, बीच में सेंकड और पीछे प्रथम श्रेणी हुआ करती थी। परिवारों के लिए स्पेशल बॉक्स भी हुआ करते थे। मुस्लिम दर्शकों के नमाज पढ़ने के लिए इंटरवल हुआ करता था।
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एक आना की मिलती थी टिकट
शुरुआत में एक आना की टिकट हुआ करती थी दो कि महंगाई के साथ-साथ बढ़कर अब 200 रुपये तक हो गई है।
फिल्मों का स्तर गिरा
ओजोन सिटी निवासी अमित सक्सेना एवं इंदू सक्सेना का कहना है कि पहले फिल्मों की स्टोरी संदेश देने वाली और शिक्षाप्रद हुआ करती थी लेकिन अब अधिकांश फिल्मों की दशा और दिशा ही बदल गई है।
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लोग ब्लैक में टिकट खरीदकर फिल्म देखते थे। सिनेमा हॉल सीटियों से गूंज उठते थे। एक-एक फिल्म कई-कई हफ्तों तक लगी रहती थी।
स्थिति यह थी कि जिस चौराहे पर तस्वीर महल सिनेमा था, उसका नाम तस्वीर महल चौराहा ही कर दिया गया। मीनाक्षी सिनेमा की वजह से फ्लाईओवर का नाम मीनाक्षी पुल कहा जाने लगा। बदलाव के दौर में कुछ सिनेमाघर पिछड़ते गए। शहर में कुछ सिंगल स्क्त्रस्ीन सिनेमा तो पहले ही बंद हो चुके थे, अब जो बचे हैं, उनके सामने अस्तित्व का संकट है। यही हालात रहे तो जल्द ही गिने चुने सिंगल स्क्त्रस्ीन सिनेमा अतीत की यादों में सिमट कर रह जाएंगे। सिंगल स्क्रीन सिनेमा के परदे से लोगों की आज भी खुशनुमा यादें जुड़ी हुई हैं। इन सिनेमाघरों के जर्जर भवन इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां पर फिल्मी सितारों का दीदार करने के लिए दर्शकों का मेला लगता था।
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1930 में बना था पहला बिल्डिंग वाला रूबी सिनेमा हॉल
रूबी होटल के मालिक दया बाबू दीक्षित का कहना है कि 1930 में रूबी सिनेमा हॉल बना था जो कि 1985 के बाद रुबी होटल बन गया था। उनका कहना है कि पहले एक ही पर्दे के सिनेमा हॉल हुआ करते थे। उनमें भी एक रील के बाद दूसरी रील लगाने में करीब तीन से पांच मिनट का समय लगता था। इस अवधि में सिनेमा हॉल के अंदर मनोरंजन के लिए ढोल-ताशे बजवाए जाते थे ताकि दर्शक हंगामा न करें। शुरुआत में बालकनी नहीं होती थी, आगे की सीट थर्ड क्लास, बीच में सेंकड और पीछे प्रथम श्रेणी हुआ करती थी। परिवारों के लिए स्पेशल बॉक्स भी हुआ करते थे। मुस्लिम दर्शकों के नमाज पढ़ने के लिए इंटरवल हुआ करता था।
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एक आना की मिलती थी टिकट
शुरुआत में एक आना की टिकट हुआ करती थी दो कि महंगाई के साथ-साथ बढ़कर अब 200 रुपये तक हो गई है।
फिल्मों का स्तर गिरा
ओजोन सिटी निवासी अमित सक्सेना एवं इंदू सक्सेना का कहना है कि पहले फिल्मों की स्टोरी संदेश देने वाली और शिक्षाप्रद हुआ करती थी लेकिन अब अधिकांश फिल्मों की दशा और दिशा ही बदल गई है।