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छर्रा सीट : यादवों की बादशाहत पर नए परिसीमन से लगा ब्रेक
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अभिषेक शर्मा
कभी अतरौली नार्थ, फिर गंगीरी और अब छर्रा विधानसभा सीट एक दशक पहले तक यादव बहुल रही लिहाजा इस सीट पर यादवों के वोट निर्णायक माने जाते रहे। कभी राम मंदिर लहर से और अब नए परिसीमन से यादव नेताओं की बादशाहत पर अब ब्रेक लग गया है। अब ठाकुर बहुल मानी जाने वाली इस सीट पर हर दल ठाकुर वोटरों के दम पर अपनी-अपनी तैयारी में है। विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर हर वह तैयारी जारी है, जिसके दम पर चुनाव जीता जा सके।
इस सीट के इतिहास पर गौर करें तो आजादी के बाद सिकंदराराऊ के कद्दावर नेता व जिले के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुंवर श्रीनिवास शर्मा ने पहला चुनाव कांग्रेस के बैनर तले जीता। वे लगातार तीन बार वे इस सीट से विधायक बने। उसी दौर में सांकरा क्षेत्र के दूसरे बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व प्रमुख यादव नेता बाबू सिंह जो अतरौली सीट से विधायक थे, उन्होंने सन 1967 में गंगीरी सीट पर अपना भाग्य आजमाया। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर जीत दर्ज की। वे देश के किसान नेता चौ. चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी कहे जाते थे। इन दोनों का उन्हें पूरा समर्थन था, लेकिन वे 1969 का चुनाव हार गए। फिर 1974 से 1980 तक लगातार तीन बार गंगीरी से विधायक रहे।
उस समय की सत्ताधारी कांग्रेस ने बाबू सिंह की जीत पर ब्रेक लगाने के लिए क्षेत्र के ही उभरते यादव नेता तिलक सिंह को चुनाव लड़ाया और उन्होंने 1985 में बाबू सिंह को हराकर कांग्रेस के लिए जीत दर्ज की। मगर 1989 में फिर बाबू सिंह चुनाव जीते। 1991 में राम मंदिर लहर में बने समीकरण के दम पर भाजपा ने पहली बार लोध नेता डॉ. राम सिंह को चुनाव लड़ाकर यह सीट कब्जाई। इसी बीच बाबू सिंह का देहांत हो गया। हालांकि, 1993 में बाबू सिंह के बेटे वीरेश यादव ने सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर सीट भाजपा से छीन ली। 1996 में डॉ. राम सिंह फिर विधायक चुने गए। इस चुनाव में यादव खेमे से वीरेश सपा से, कांग्रेस से तिलक सिंह के बेटे रजनीश यादव को हार का सामना करना पड़ा। 2002 में वीरेश यादव ने वापसी की तो 2007 में डॉ. राम सिंह के सिर पर जीत का सेहरा सजा। कुल मिलाकर पिता के देहांत के बाद वीरेश यादव ने एक-एक चुनाव के अंतराल से यादवों की बादशाहत कायम रखी।
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2012 में यह सीट नए परिसीमन से छर्रा के रूप में स्थापित हुई। इसमें से यादव बहुल गंगीरी व बिजौली ब्लॉक का इलाका अतरौली में जोड़ा गया, जबकि सिकंदराराऊ व कोल से ठाकुर बहुल इलाका छर्रा में शामिल हुआ और नए परिसीमन से पहली बार में सपा के ठा. राकेश सिंह ने रिकार्ड जीत दर्ज की, जबकि 2017 में भाजपा के ठाकुर नेता रवेंद्र पाल सिंह ने जीत दर्ज की है।
1952 में कांग्रेस से कुंवर श्रीनिवास शर्मा
1957 में कांग्रेस से कुंवर श्रीनिवास शर्मा
1962 में कांग्रेस से कुंवर श्रीनिवास शर्मा
1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से बाबू सिंह
1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से अनीसुर्रहमान
1974 में भारतीय क्रांति दल से बाबू सिंह
1977 में जेएनपी से बाबू सिंह
1980 में जेएनपी (एससी) से बाबू सिंह
1985 में कांग्रेस से तिलक सिंह
1989 में जनता दल से बाबू सिंह
1991 में भाजपा से डॉ. राम सिंह
1993 में सपा से वीरेश यादव
1996 में भाजपा से डॉ. राम सिंह
2002 में सपा से वीरेश यादव
2007 में भाजपा से डॉ. राम सिंह
2012 में सपा से ठा. राकेश सिंह
2017 में भाजपा से रवेंद्र पाल सिंह
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कभी अतरौली नार्थ, फिर गंगीरी और अब छर्रा विधानसभा सीट एक दशक पहले तक यादव बहुल रही लिहाजा इस सीट पर यादवों के वोट निर्णायक माने जाते रहे। कभी राम मंदिर लहर से और अब नए परिसीमन से यादव नेताओं की बादशाहत पर अब ब्रेक लग गया है। अब ठाकुर बहुल मानी जाने वाली इस सीट पर हर दल ठाकुर वोटरों के दम पर अपनी-अपनी तैयारी में है। विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर हर वह तैयारी जारी है, जिसके दम पर चुनाव जीता जा सके।
इस सीट के इतिहास पर गौर करें तो आजादी के बाद सिकंदराराऊ के कद्दावर नेता व जिले के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुंवर श्रीनिवास शर्मा ने पहला चुनाव कांग्रेस के बैनर तले जीता। वे लगातार तीन बार वे इस सीट से विधायक बने। उसी दौर में सांकरा क्षेत्र के दूसरे बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व प्रमुख यादव नेता बाबू सिंह जो अतरौली सीट से विधायक थे, उन्होंने सन 1967 में गंगीरी सीट पर अपना भाग्य आजमाया। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर जीत दर्ज की। वे देश के किसान नेता चौ. चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी कहे जाते थे। इन दोनों का उन्हें पूरा समर्थन था, लेकिन वे 1969 का चुनाव हार गए। फिर 1974 से 1980 तक लगातार तीन बार गंगीरी से विधायक रहे।
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उस समय की सत्ताधारी कांग्रेस ने बाबू सिंह की जीत पर ब्रेक लगाने के लिए क्षेत्र के ही उभरते यादव नेता तिलक सिंह को चुनाव लड़ाया और उन्होंने 1985 में बाबू सिंह को हराकर कांग्रेस के लिए जीत दर्ज की। मगर 1989 में फिर बाबू सिंह चुनाव जीते। 1991 में राम मंदिर लहर में बने समीकरण के दम पर भाजपा ने पहली बार लोध नेता डॉ. राम सिंह को चुनाव लड़ाकर यह सीट कब्जाई। इसी बीच बाबू सिंह का देहांत हो गया। हालांकि, 1993 में बाबू सिंह के बेटे वीरेश यादव ने सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर सीट भाजपा से छीन ली। 1996 में डॉ. राम सिंह फिर विधायक चुने गए। इस चुनाव में यादव खेमे से वीरेश सपा से, कांग्रेस से तिलक सिंह के बेटे रजनीश यादव को हार का सामना करना पड़ा। 2002 में वीरेश यादव ने वापसी की तो 2007 में डॉ. राम सिंह के सिर पर जीत का सेहरा सजा। कुल मिलाकर पिता के देहांत के बाद वीरेश यादव ने एक-एक चुनाव के अंतराल से यादवों की बादशाहत कायम रखी।
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2012 में यह सीट नए परिसीमन से छर्रा के रूप में स्थापित हुई। इसमें से यादव बहुल गंगीरी व बिजौली ब्लॉक का इलाका अतरौली में जोड़ा गया, जबकि सिकंदराराऊ व कोल से ठाकुर बहुल इलाका छर्रा में शामिल हुआ और नए परिसीमन से पहली बार में सपा के ठा. राकेश सिंह ने रिकार्ड जीत दर्ज की, जबकि 2017 में भाजपा के ठाकुर नेता रवेंद्र पाल सिंह ने जीत दर्ज की है।
1952 में कांग्रेस से कुंवर श्रीनिवास शर्मा
1957 में कांग्रेस से कुंवर श्रीनिवास शर्मा
1962 में कांग्रेस से कुंवर श्रीनिवास शर्मा
1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से बाबू सिंह
1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से अनीसुर्रहमान
1974 में भारतीय क्रांति दल से बाबू सिंह
1977 में जेएनपी से बाबू सिंह
1980 में जेएनपी (एससी) से बाबू सिंह
1985 में कांग्रेस से तिलक सिंह
1989 में जनता दल से बाबू सिंह
1991 में भाजपा से डॉ. राम सिंह
1993 में सपा से वीरेश यादव
1996 में भाजपा से डॉ. राम सिंह
2002 में सपा से वीरेश यादव
2007 में भाजपा से डॉ. राम सिंह
2012 में सपा से ठा. राकेश सिंह
2017 में भाजपा से रवेंद्र पाल सिंह