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अतीत का अलीगढ़ 12: अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर अलीगढ़ में कराई थी नील की खेती, जिले में थीं कई फैक्टरियां

Wed, 06 Dec 2023 01:48 AM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़
कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Wed, 06 Dec 2023 01:48 AM IST
सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।

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British had cultivated indigo on a large scale in Aligarh
अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अलीगढ़ जिले के लोगों को मुश्किल से इस बात का यकीन होगा कि कभी यहां बड़े पैमाने पर नील की खेती होती थी। नील की खेती एक समय में सबसे ज्यादा मूल्यवान समझी जाती थी। यूरोप में औद्योगिक क्रांति के अगुवा बने अंग्रेजों के लिए नील बेहद जरूरी उत्पाद था। यह उनके द्वारा स्थापित की गई कॉटन मिलों के लिए आवश्यकता की वस्तु थी। भारत की उर्वरा भूमि नील के उत्पादन के लिए उपयुक्त थी। लिहाजा अंग्रेज जैसे-जैसे भारत भूमि को जीतते गए नील की खेती को करवाने लगे। आलम यह था कि अंग्रेज नील की जबरन खेती करवाते थे। 

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किसानों को अपनी कुल खेती के 15 फीसदी रकबे पर नील की खेती करनी ही होती थी। जबरन नील उत्पादन के खिलाफ बिहार के चम्पारण जिले में गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ 1917 में पहला आंदोलन किया। इससे पूर्व 1859 में बंगाल में भी जबरन नील उत्पादन के खिलाफ आंदोलन हो चुका था। फिलहाल अलीगढ़ में कोई नील उत्पादन के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं चला लेकिन देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी आहिस्ता-आहिस्ता नील उत्पादन का रकबा घटता गया।
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अलीगढ़ में अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत से ही नील की खेती होने लगी थी। डी-बोइन के प्रशासन के दौरान कई अंग्रेज ठेकेदारों ने यहां नील की खेती करवानी शुरू की। खैर में  मिस्टर जार्डन, मेंडू में मिस्टर ओर, मिस्टर थार्नटन ने कोल और मछुआ में, कोल और जलाली में मिस्टर लांग क्राफ्ट, मलोई और अलहदादपुर में स्टीवर्ट और राबर्ट्सन ने नील की खेती में हाथ आजमाया। अवध प्रांत में ब्रिटिश राज कायम होने पर मिस्टर ओर अवध के लखवा की ओर शिफ्ट कर गए। जार्डन का अलीगढ़ में ही देहांत हो गया। 1848 में मिस्टर थार्नटन की भी मृत्यु हो गई। अलीगढ़ का इलाका अंग्रेजों के प्रभुत्व में आने के बाद यहां नील की कई फैक्टरियां खोली गईं।

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हाथरस में 1817 नील की फैक्टरी खोली गई थी

जे ब्लंट ने हाथरस में 1817 में नील की फैक्टरी खोली थी। अंग्रेज लिखते हैं कि क्षेत्र में मराठों का प्रभुत्व होने पर नील पर भारी कर लगाया गया जिससे इसका उत्पादन प्रभावित हुआ था। अंग्रेजी राज में इन करों को खत्म कर दिया गया था। अंग्रेजों ने इसके बाद तहसीलदारों को किसानों के साथ नील की खेती करने  के करार के लिए अधिकृत किया। इससे जिले में नील की खेती को प्रोत्साहन मिला। नील की खेती करने वालों को फैक्टरियों के अलावा सरकार भी पुरस्कृत करती थी। 1830 में नील की खेती के लिए विख्यात कलकत्ता हाउस की विफलता ने नील के खेतिहरों की बर्बादी की कहानी लिख डाली। 1834 में कलकत्ता हाउस की तमाम परिसंपत्तियां और कर्ज की हुंडियां कौड़ियों के मोल नीलाम की गई थीं। इनके ज्यादातर खरीदार साहूकारी में लिप्त थे। अपनों कर्जों की एवज में इन लोगों ने अदालतों से गांव के गांव नीलाम करा डाले।

1862 में नील के कारोबार ने फिर गति पकड़ी
पटरी से उतरने के बाद जिले में 1862 ईस्वी में एक बार फिर नील के कारोबार ने गति पकड़ी, लेकिन हालात 1830 के पहले जैसे नहीं हो सके। बहरहाल, 1870 में जिले में नील की खेती का रकबा 2908 हेक्टेयर था। अलीगढ़ में 1873 ईस्वी में नील की कुल 171 फैक्टरियां उत्पादन कर रही थीं। इनमें से ज्यादातर सिकंदराराऊ और अलीगढ़ में स्थापित थीं। 1884-85 तक आते-आते नील के रकबे में भारी इजाफा हुआ। इस साल तक  कुल 65584 एकड़ जमीन पर नील की खेती की जा रही थी। हालांकि अगले दशक (1892-93) में इसके रकबा सिकुड़ कर 40387 एकड़ रह गया था। अगले पांच वर्षों में इसमें थोड़ी थी बढ़ोतरी हुई। इस दौरान नील का रकबा 43080 एकड़ तक पहुंच गया।

नील की खेती के पतन के कारण
बीसवीं सदी की शुरुआत से पहले ही कुदरती रंगों के स्थान पर कृत्रिम रंगों का निर्माण शुरू हो गया था। कृत्रिम रंगों का उत्पादन आसान था। इनमें मेहनत कम लगती थी और ये सस्ते भी थे। लिहाजा जिले से नील की खेती का आकार सिकुड़ता गया। 1905 के बाद तो इसका रकबा सिर्फ 2218 एकड़ रह गया। इगलास और हाथरस में तो इसका पूरी तरह नामोनिशान मिट गया।  
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)

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