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हजारों टन सीमेंट व ईंटें बनने के बाद भी बढ़ रहा राख का पहाड़
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आशीष निगम, अलीगढ़।
कासिमपुर पावर हाउस के राख के पहाड़ से उड़ रही धूल से आसपास के गांव वाले परेशान हैं। सवा छह लाख वर्गमीटर क्षेत्रफल फैले राख के पहाड़ को पांच मीटर ऊपर उठाने और इस दौरान तेज हवाएं चलने से पूरे इलाके में राख फैल गई है। राख और सीमेंट उत्पादन एक दूसरे जुड़े हैं, क्योंकि सीमेंट में दस फीसदी राख होती है।
छह सीमेंट फैक्ट्रियां पावर हाउस से राख लेती हैं। कई ब्रिक्स निर्माता कंपनी भी इसका प्रयोग कर रही हैं। इन सभी का उत्पादन हजारों टन में हो रहा है। मुफ्त में राख मिलने के तमाम दावों के बीच लोगों को इसकी उपलब्धता नहीं हो रही है, क्योंकि इसके लिए अनुमति लेना जरूरी है, जो आसानी से नहीं मिल रही है। इन्हीं वजहों से राख की मात्रा बढ़ रही है, जो तेज हवा चलते ही आसपास में फैल जाती है।
कोयला चलित पावर प्लांट में होने वाले बेतहाशा राख उत्पादन के कारण इसके इर्द-गिर्द ही सीमेंट फैक्ट्रियां संचालित होती हैं। जिले में अल्ट्रा टेक सीमेंट, मंगलम सीमेंट, जेके सीमेंट की उत्पादन यूनिट हैं। कासिमपुर पावर हाउस से साहिबाबाद में संचालित दो अन्य सीमेंट फैक्ट्रियां भी राख लेती हैं। एक प्रतिष्ठित सीमेंट कंपनी के मैनेजर ने बताया कि सीमेंट में औसतन दस फीसदी राख होती है। इसी राख में जिप्सम और क्लिंकर मिला कर सीमेंट बनती है।
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ग्रे सीमेंट में राख पड़ती है, लेकिन सफेद सीमेंट में राख की आवश्यकता नहीं है। फ्लाई ऐश यानी राख से ओपीसी (आर्डनरी पोर्टलैंड सीमेंट) और पीपीसी (पोर्टलैंड पोजोलोना सीमेंट) बनती है। सीमेंट निर्माता केवल वही राख लेते हैं, जो सायलो मशीन से सीधे बंद कंटेनर में भरी जाती है। सीमेंट फैक्ट्रियों के अलावा ब्रिक्स निर्माता फर्में भी राख का प्रयोग करती हैं। कुछ जगहों पर ब्रिक्स राख से बनाती है तो कुछ जगहों पर अन्य पदार्थ और रसायनों से बनाती है।
कासिमपुर में वर्तमान में हर दिन लगभग एक हजार टन राख निकल रही है। जल्द 660 मेगावाट की नई यूनिट भी उत्पादन शुरू कर देगी। जिससे राख और बढ़ेगी। एक तरफ राख का पहाड़ बड़ा हो रहा है, वहीं खपत कम होने से इसका रखरखाव चुनौती बनता जा रहा है। विंडबना ये भी है कि पावर हाउस प्रबंधन कहता है कि बंधे से राख पूरी तरह से मुफ्त में दी जा रही है, वहीं इसके लिए जरूरी अनुमति पत्र बनवाना आसान नहीं है। अगर ये अनुमति आसान होती तो अलीगढ़ में फ्लाई ऐश ब्रिक्स बनाने का कारोबार बेहतर ढंग से हो रहा होता।
पावर हाउस का राख उत्पादन
1- 64 हजार टन राख का उत्पादन महीने में, अगर प्लांट पूरे लोड पर चले।
2- 1000 टन राख बन जाती है औसतन एक दिन में, एक रैक कोयला जलने पर।
3- सायलो मशीन से निकलने वाली राख प्रतिदिन 600-700 टन तक होती है।
4- सायलो मशीन वाली राख ही सीमेंट फैक्ट्रियां इस्तेमाल करती है, बंधे की नहीं।
5- सीमेंट का रेट वर्तमान में 320, 340 से लेकर 360 रुपये प्रति 50 किलोग्राम।
6- बंधे की राख का सर्वाधिक प्रयोग इंटरलॉकिंग ब्रिक्स और भराई के कामों में।
मुफ्त में राख ले जाने की अनुमति जरूरी
पावर हाउस के इंजीनियर जबर सिंह ने बताया कि बंधे से राख लेे जाने का कोई पैसा नहीं लिया जाता है। बशर्ते इसके लिए अनुमति लेनी जरूरी है, ताकि बंधे को नुकसान न हो। अनुमति होने से नुकसान होने की सूरत में संबंधित व्यक्ति से इसकी भरपाई कराई जाती है।
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कासिमपुर पावर हाउस के राख के पहाड़ से उड़ रही धूल से आसपास के गांव वाले परेशान हैं। सवा छह लाख वर्गमीटर क्षेत्रफल फैले राख के पहाड़ को पांच मीटर ऊपर उठाने और इस दौरान तेज हवाएं चलने से पूरे इलाके में राख फैल गई है। राख और सीमेंट उत्पादन एक दूसरे जुड़े हैं, क्योंकि सीमेंट में दस फीसदी राख होती है।
छह सीमेंट फैक्ट्रियां पावर हाउस से राख लेती हैं। कई ब्रिक्स निर्माता कंपनी भी इसका प्रयोग कर रही हैं। इन सभी का उत्पादन हजारों टन में हो रहा है। मुफ्त में राख मिलने के तमाम दावों के बीच लोगों को इसकी उपलब्धता नहीं हो रही है, क्योंकि इसके लिए अनुमति लेना जरूरी है, जो आसानी से नहीं मिल रही है। इन्हीं वजहों से राख की मात्रा बढ़ रही है, जो तेज हवा चलते ही आसपास में फैल जाती है।
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कोयला चलित पावर प्लांट में होने वाले बेतहाशा राख उत्पादन के कारण इसके इर्द-गिर्द ही सीमेंट फैक्ट्रियां संचालित होती हैं। जिले में अल्ट्रा टेक सीमेंट, मंगलम सीमेंट, जेके सीमेंट की उत्पादन यूनिट हैं। कासिमपुर पावर हाउस से साहिबाबाद में संचालित दो अन्य सीमेंट फैक्ट्रियां भी राख लेती हैं। एक प्रतिष्ठित सीमेंट कंपनी के मैनेजर ने बताया कि सीमेंट में औसतन दस फीसदी राख होती है। इसी राख में जिप्सम और क्लिंकर मिला कर सीमेंट बनती है।
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ग्रे सीमेंट में राख पड़ती है, लेकिन सफेद सीमेंट में राख की आवश्यकता नहीं है। फ्लाई ऐश यानी राख से ओपीसी (आर्डनरी पोर्टलैंड सीमेंट) और पीपीसी (पोर्टलैंड पोजोलोना सीमेंट) बनती है। सीमेंट निर्माता केवल वही राख लेते हैं, जो सायलो मशीन से सीधे बंद कंटेनर में भरी जाती है। सीमेंट फैक्ट्रियों के अलावा ब्रिक्स निर्माता फर्में भी राख का प्रयोग करती हैं। कुछ जगहों पर ब्रिक्स राख से बनाती है तो कुछ जगहों पर अन्य पदार्थ और रसायनों से बनाती है।
कासिमपुर में वर्तमान में हर दिन लगभग एक हजार टन राख निकल रही है। जल्द 660 मेगावाट की नई यूनिट भी उत्पादन शुरू कर देगी। जिससे राख और बढ़ेगी। एक तरफ राख का पहाड़ बड़ा हो रहा है, वहीं खपत कम होने से इसका रखरखाव चुनौती बनता जा रहा है। विंडबना ये भी है कि पावर हाउस प्रबंधन कहता है कि बंधे से राख पूरी तरह से मुफ्त में दी जा रही है, वहीं इसके लिए जरूरी अनुमति पत्र बनवाना आसान नहीं है। अगर ये अनुमति आसान होती तो अलीगढ़ में फ्लाई ऐश ब्रिक्स बनाने का कारोबार बेहतर ढंग से हो रहा होता।
पावर हाउस का राख उत्पादन
1- 64 हजार टन राख का उत्पादन महीने में, अगर प्लांट पूरे लोड पर चले।
2- 1000 टन राख बन जाती है औसतन एक दिन में, एक रैक कोयला जलने पर।
3- सायलो मशीन से निकलने वाली राख प्रतिदिन 600-700 टन तक होती है।
4- सायलो मशीन वाली राख ही सीमेंट फैक्ट्रियां इस्तेमाल करती है, बंधे की नहीं।
5- सीमेंट का रेट वर्तमान में 320, 340 से लेकर 360 रुपये प्रति 50 किलोग्राम।
6- बंधे की राख का सर्वाधिक प्रयोग इंटरलॉकिंग ब्रिक्स और भराई के कामों में।
मुफ्त में राख ले जाने की अनुमति जरूरी
पावर हाउस के इंजीनियर जबर सिंह ने बताया कि बंधे से राख लेे जाने का कोई पैसा नहीं लिया जाता है। बशर्ते इसके लिए अनुमति लेनी जरूरी है, ताकि बंधे को नुकसान न हो। अनुमति होने से नुकसान होने की सूरत में संबंधित व्यक्ति से इसकी भरपाई कराई जाती है।