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अलीगढ़: सर सैयद ने भारतीयों को आधुनिक शिक्षा दिलाने के लिए की थी पहल

Fri, 16 Oct 2020 12:01 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो दीपक शर्मा, अलीगढ़
दीपक शर्मा, अलीगढ़ Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Fri, 16 Oct 2020 12:01 AM IST
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Aligarh: Sir Syed took the initiative to provide modern education to Indians
अलीगढ़: सर सैयद अहमद खान अपने करीबी मित्रों के साथ - फोटो : CITY OFFICE
दो शताब्दी पहले की बात है, दिल्ली में रहने वाले सैयद मोहम्मद मुत्तकी और उनकी पत्नी अजीजुन्निशा बेगम के यहां पर 17 अक्तूबर 1817 को एक बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर आधुनिक भारत का महान शिल्पी, समाज सुधारक और देश व समाज को दिशा देने वाला महान व्यक्ति साबित हुआ। इनको दुनिया आज सर सैयद अहमद के नाम से जानती है।
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1857 के विद्रोह को अपनी आंखों से देखने वाले सर सैयद ने वक्त की आहट को समझ लिया था। उन्होंने यह जान लिया था कि आने वाले वक्त में ज्ञान नहीं, विज्ञान भी चाहिए। यही वजह थी कि उन्होंने अलीगढ़ की जमीन पर शिक्षा का एक पौधा लगाया, जो आज अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शक्ल में वट वृक्ष बन चुका है। ब्रिटिश सर्वोच्चता के बराबर भारतीयों को खड़ा करने के लिए यह उनका एक प्रयास था।
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कॉलेज के रूप में हुई थी विश्वविद्यालय की शुरुआत
सर सैयद अहमद खान ने 1875 में अलीगढ़ में मोअम्डन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की। बाद में 1920 में इसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी नाम पड़ा। देश में कुल 23 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, इसमें एएमयू का स्थान सबसे अहम है।
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एएमयू के इतिहास के मामलों के जानकार उर्दू अकादमी के डायरेक्टर डॉ राहत अबरार कहते हैं कि इससे आगे के सफर की बात करें तो 1920 से 1965 तक एएमयू बढ़िया तरह से चलता रहा। इसके बाद 1965 से 1972 के दौरान सरकारों ने कई तरह की पाबंदी लगा दीं। 1961 में अजीज पाशा नाम के शख्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाते हुए एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान मानने से मना कर दिया था। बाद में 1981 में केंद्र सरकार ने फिर से कानून में संशोधन किए और अल्पसंख्यक दर्जा दिया। आम सहमति से बिल पास हुआ। एएमयू को इसी बिल के पास होने के बाद से अब तक अल्पसंख्यक होने का दर्जा मिला।

जिसने यहां से की पढ़ाई, फलक पर छा गया
अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद यहां के विद्यार्थी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के साथ-साथ दूसरे देशों में भी प्रधानमंत्री की भूमिका तक पहुंचे। किसी को भारत रत्न मिला तो किसी को दूसरे बड़े सम्मान।

एएमयू से पढ़े हामिद अली अंसारी 2007 से 2017 तक देश के उप राष्ट्रपति रहे। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने 1913 में एएमयू से उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। लियाकत अली खान ने एएमयू से लॉ और पॉलिटिकल साइंस की डिग्री ग्रहण की थी। अली अशरफ फातमी ने यहाँ से शिक्षा ली। अशरफ भारत सरकार के पूर्व मानव संसाधन राज्यमंत्री रहे। दिल्ली के सीएम रहे साहिब सिंह वर्मा, पूर्व क्रिकेटर लाला अमरनाथ, कैफी आजमी, राही मासूम रजा, मशहूर गीतकार जावेद अख्तर के साथ ही फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने भी एएमयू से पढ़ाई की थी। साथ ही ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्होंने यहां से पढ़ने के बाद देश को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया।

एएमयू के इन छात्रों को मिल चुका है भारत रत्न
देश तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन और खान अब्दुल गफ्फार खान को भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है।

250 से अधिक कोर्स, लाइब्रेरी में दुर्लभ संग्रह
एएमयू में 250 से अधिक पाठ्यक्रम संचालित हैं। यहां की लाइब्रेरी समृद्ध लाइब्रेरी मानी जाती है। इसकी स्थापना 1877 में हुई। लाइब्रेरी में साढ़े चार लाख से अधिक दुर्लभ किताबें हैं। फारसी में अनुवादित गीता भी उपलब्ध है। साथ ही चार सौ साल पहले फारसी में अनुवादित की गई महाभारत की पांडुलिपि भी है। चौदह सौ साल पुरानी कुरआन लाइब्रेरी में है। साथ ही कई दुर्लभ दस्तावेज हैं, जो मुगल शासन की याद दिलाते हैं।


कुरान के साथ गीता भी, भगवान विष्णु की दुर्लभ प्रतिमा भी
हिंदू-मुस्लिम एकता के हितैषी रहे सर सैयद अहमद द्वारा स्थापित किए गए इस विश्वविद्यालय के संग्रहालय में भगवान विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा व लाइब्रेरी में कुरआन के साथ ही गीता की प्राचीन पांडुलिपियाँ रखी हैं। साथ ही लाइब्रेरी में महावीर जुल स्तूप, आदिनाथ की प्रतिमाएं, कंक्रीट के सूर्यदेव की प्रतिमा भी यहां मौजूद हैं, संग्रहालय में लोहे व पत्थर के पुराने हथियार, पुराने बर्तन भी हैं, ये दुर्लभ वस्तुओं को समेटे दुर्लभ जगह है।
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