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2 लाख के कर्ज पर 16 लाख भुगतान...फिर भी कर्जदार परेशान

Sat, 12 Jun 2021 01:07 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 12 Jun 2021 01:07 AM IST
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Aligarh news
कहने को सरकार सूदखोरी लाइसेंस खत्म करने पर विचार कर रही है। मगर अपने शहर में अवैध सूदखोरों के आतंक से कमजोर वर्ग बेहद परेशान है। ताजा मामला सासनी गेट इलाके का शुक्रवार को एसएसपी दफ्तर पहुंचा। जहां पीड़ित ने बताया कि 2 लाख के कर्ज के बदले उसने 16 लाख रुपये का भुगतान कर दिया है। फिर भी सूदखोर उस पर कर्जा बता रहा है। अब रुपये देने की हैसियत नहीं है। पांच साल के बच्चे को बेचकर ही कर्ज निपटा सकता है। अन्यथा परिवार सहित आत्महत्या को मजबूर होगा। मामले को गंभीरता से लेते हुए सीओ प्रथम ने आनन-फानन समस्या का समाधान कराया और दोनों पक्षों में वार्ता के बाद एक भी रुपये का आगे लेनदेन न होना तय कराया।
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सासनी गेट जयगंज इलाके के गौरव पाठक चारू पाठक दंपती दोपहर में एसएसपी दफ्तर पहुंचे। जहां सीओ प्रथम से मुलाकात कर बताया कि गौरव मूर्तियों के शृंगार का काम मजदूरी पर करता है। उसने 2015 में अपनी बहन की शादी के लिए इलाके के ही एक सूदखोर से 2 लाख रुपये उधार लिए थे, जिसकी 10 प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज देना तय हुआ था। अब तक वह 16 लाख रुपये का भुगतान धीरे-धीरे कर चुका है और अभी भी सूदखोर उस पर 40 लाख रुपये का बकाया बताता है। न देने पर तरह-तरह की धमकियां देता है। हालात यह हैं कि वह अपनी कमाई का काफी हिस्सा उसे देता है। लॉकडाउन काल में काम न चलने के कारण रुपये देने में असमर्थ रहा है तो दबंग सूदखोर ने उसके मकान पर ताला डालकर उन्हें बाहर कर दिया और वे किराये पर रहने को मजबूर हैं। इसके बाद भी वह कर्जा मांगने के नाम पर धमकी देता है। ऐसे में उनके पास पांच साल के बेटे को बेचकर कर्ज उतारने के सिवाय कोई चारा नहीं है। अन्यथा वह परिवार सहित आत्महत्या को मजबूर होगा।
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इस मामले में थाना पुलिस को निर्देशित कर आरोपी पक्ष को थाने बुलवाया। बाद में पीड़ित को भी थाने भेजा गया। जहां सीओ ने आरोपी पक्ष को अवैध रूप से ब्याज वसूली के मुकदमे व कार्रवाई की चेतावनी दी। जिस पर दोनों पक्षों में बातचीत के बाद सहमति बनी कि अब वह रुपये नहीं मांगेगा। उसका मकान भी छोड़ देगा। इस पर पीड़ित परिवार सहमत हो गया और दोनों में लिखित सहमति कराई गई। इसके बाद दोनों पक्ष थाने से वापस गए। सीओ प्रथम राघवेंद्र सिंह के अनुसार इस वार्ता पर पीड़ित ने सहमति जताई। तभी यह निर्णय लिया गया। अन्यथा मुकदमे की कार्रवाई तय थी।
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