अतीत का अलीगढ़ 20: 1810 में बनी थी अलीगढ़ की पहली जेल, किराये के दो कमरों से हुई थी शुरू
राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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विस्तार
जेल अप्रिय जगह है। शायद ही कोई जेल जाना चाहता होगा। लेकिन दुर्दांत अपराधियों को खुले में नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए जेल एक जरूरत भी है। अलीगढ़ में जेल का इतिहास लगभग 220 साल पुराना है। सर्वप्रथम 1804 ईस्वी में कोल तहसील में किराये के दो कमरे लेकर जेल का रूप दिया गया था। उस वक्त जिले में तकरीबन 40 अपराधी थे जिन्हें जेल में रखा जाना था। दो कमरों की जगह 40 अपराधियों के लिए नाकाफी थी। यद्यपि अंग्रेजों ने फौज को पहरे पर लगाया था। लेकिन इन अपराधियों में कई पहरेदारों की आंखों में धूल झोंकर भागने में सफल रहे थे। लिहाजा अंग्रेजों ने जेल निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाए।
34000 रुपये लागत आई थी जेल के निर्माण में
अलीगढ़ जिले की पहली आपराधिक जेल का निर्माण 1810 ईस्वी में पूरा हुआ था। इसकी लागत 34000 रुपये आई थी। इसके साथ ही सिविल जेल और जेल अस्पताल 1816 ईस्वी में निर्मित किए गए थे। 1817 में जेल से फौजी पहरेदारी हटा दी गई। इनकी जगह पर आगरा प्रांतीय बटालियन के जवान पहरे पर लगाए गए। यह व्यवस्था 1831 तक चलती रही। इसके बाद विशेष जेल सुरक्षा गारद की स्थापना की गई जिसने आगरा प्रांतीय बटालियन की जगह ली।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में आंदोलनकारियों ने जेल को क्षतिग्रस्त कर छुड़ाए थे कैदी
अंग्रेजों ने 1857 के स्वाधीनता आंदोलन को हमेशा अपने कागजातों में बगावत या विद्रोह का ही दर्जा दिया। प्रशासनिक रिपोर्टों में भी इसे म्यूटिनी या बगावत ही लिखा गया। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में आंदोलनकारियों ने जेल को काफी नुकसान पहुंचाया था। लगभग कैदी भी मुक्त करा लिए गए थे। कई कैदियों ने तो आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ अपनी हिस्सेदारी भी की। प्रथम स्वाधीनता आंदोलन की विफलता के बाद अंग्रेजों ने अनूपशहर मार्ग और रुहेलखंड रेलवे स्टेशन के मध्य जेल का पुनर्निर्माण कराया। इसे द्वितीय श्रेणी की जेल का दर्जा दिया गया। रोचक बात यह थी कि जेल की निगरानी जिले के सिविल सर्जन को सौंपी गई थी।
हैरतः कैदियों की संख्या घटती गई
आज की जेलों में दिनोंदिन कैदियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। मौजूदा समय में 1100 कैदियों की क्षमता वाली अलीगढ़ की जेल में 4200 से ज्यादा कैदी हैं। कानून व्यवस्था पर अंग्रेजों की पकड़ कह लें अंग्रेजी शासन काल में कैदियों की संख्या कम होती गई। 1845-1849 के दौरान अलीगढ़ की जिला जेल में कैदियों की औसत संख्या 648 थी। इसके पचास साल बाद यानि कि 1895-1899 के दौरान कैदियों की औसत संख्या घटकर 420 रह गई थी। इस काल में भी कैदियों को हुनरमंद बनाने का काम किया जाता था। जेल में रहने के दौरान उन्हें रस्सी की बटाई, कालीन बुनाई और ईंट पथाई का काम सिखाया जाता था।
कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम थे जिले के 127 गांव
1870 का अधिनियम संख्या 8 लागू किया गया था। इसमें कन्या भ्रूण हत्या को दंडनीय बनाया गया था। जिले में कन्या भ्रूण हत्या के लिए अंग्रेजी प्रशासन ने 127 गांवों को चिह्नित किया था, जिनमें कन्या भ्रूण हत्या प्रचलन में थी। अंग्रेजों ने साफ तौर पर तो नहीं लिखा लेकिन इस बात का उल्लेख किया कि राजपूतों, जाटों, अहीर और गूजर जातियों संदेह के दायरे में थीं। 1871-72 में अंग्रेजों ने पुरुष-महिला लिंगानुपात जानने के लिए विशेष जनगणना भी कराई थी। कन्या भ्रूण हत्या के मामले में 1885 में गांवों की संख्या घटकर 85 हो गई । जाहिर है कि समय के साथ कन्या भ्रूण हत्या में कमी आती गई। 1890
के बाद तो बहुत कम गांव जिले में ऐसे रह गए जहां से कन्या भ्रूण हत्या कीजानकारी मिली हो।
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)