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अतीत का अलीगढ़ 13: अंग्रेजों की नजर में सेहत के लिहाज से मुफीद था अलीगढ़ जिला, पर ये बनती थीं मौत की वजह

Sat, 09 Dec 2023 11:44 PM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़
कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Sat, 09 Dec 2023 11:44 PM IST
सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।

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Aligarh district was favorable for health in British
अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा अलीगढ़ और आसपास का जलवायु अपेक्षाकृत शुष्क था। इसलिए यहां पर आनुपातिक रूप से लोग कम बीमार होते थे। अंग्रेजों की नजर में अलीगढ़ सेहत के लिहाज से मुफीद जिला था। हालांकि बुखार, कॉलरा, चेचक, प्लेग, पेचिस और न्यूमोनिया जैसी बीमारियों का प्रकोप जब-तब देखने को मिलता था। अंग्रेजी शासन के दस्तावेज बताते हैं कि जब भी जिले में ज्यादा बारिश हुई बीमारियों ने भी जोर पकड़ा। भिन्न-भिन्न वजहों से होने वाला बुखार सबसे ज्यादा घातक और जानलेवा था।

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अंग्रेजों ने नियमित रूप से मृत्युदर की गणना का प्रयास 1865 से किया। 1872 से मृत्युदर की गणना काफी सटीक और प्रामाणिक होने लगी थी। 1877 में जिले की मृत्युदर 18.49 प्रति वर्ग मील थी । (उस समय मील के हिसाब से मृत्युदर की गणना होती थी। ) जिले की मृत्युदर में अकाल का भी असर देखने में आता था। 1778 में जिले की मृत्यु दर में अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखने को मिली थी। 1879 में मृत्यु दर की भारी वृद्धि चौंकाने वाली थी। यह 118.49 प्रति एक हजार व्यक्ति तक पहुंच गई। (मापने का पैमाना बदला)। 
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दस्तावेज बताते हैं कि इस दौर में जानलेवा बुखार का प्रकोप बहुत बढ़ गया था। हालांकि 1890 के आते-आते मृत्युदर घटकर 28.15 तक पहुंच गई थी। लेकिन कॉलरा और चेचक के फैलने से मृत्युदर बढ़कर 33.58 तक पहुंच गई थी। इस दौरान जन्म दर 37.56 की थी। 1907 में मृत्यु दर 36.88 तथा जन्मदर 44.02 फीसदी रही। 1890 के बाद मृत्यु की सबसे बड़ी वजह बुखार थी।

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सासनी में फैला था घातक टॉयफायड, कई महामारियां भी फैलती रहीं 

1890 तक मृत्यु की सबसे बड़ी वजह बुखार थी। बीमारियों की फेहरिस्त में यह सबसे ऊपर था। 1837 में जिले के में मलेरिया बुखार बड़ी तेजी से फैला। इसी साल सासनी में घातक टॉयफाइड बुखार का प्रकोप भी देखने को मिला। इसका असर पूरे छह महीने तक रहा। बताया गया कि यह मुंबई (बंबई) से आने वाले यात्रियों की वजह से फैला था। कुछ लोग इसकी वजह मानते थे कि एक जाति विशेष के लोगों ने मरी हुई गाय का मांस खाया था जो संक्रामक रोग से ग्रस्त थी। 1856 में एक और महामारी तेजी से फैली। इसने 34000 लोगों की जान ली थी। इसके बाद 1861 में कोल और हरदुआगंज में तेजी से रहस्यमय बुखार फैला। अप्रैल-मई में इसका प्रकोप होने की वजह से एक अफवाह यह भी फैलाई गई कि यह रबी की नई फसल वाले अनाज खाने से हो रही है। सबसे बड़ी बुखार की महामारी 1879 में फैली जिसने जिले के 121868 लोगों की जान ले ली। 1881 से 1890 के दौरान औसतन हर साल 29058 लोगों ने बुखार के चलते जान गंवाई। यह संख्या जिले के कुल मृत्युदर का 84.51 फीसदी थी। उल्टी-दस्त भी जिले में जानलेवा बीमारी के रूप में जानी जाती थी।

कॉलरा और चेचक
कॉलरा का प्रसार सबसे पहले 1817 में देखने में आया था। लेकिन खुद अंग्रेज मानते थे कि इस बीमारी का वजूद पहले से रहा होगा। 1821 में इसका प्रकोप इस कदर बढ़ गया था कि अंग्रेज लिखते हैं कि शवों को जलाने के लिए जिले में लकड़ियां कम पड़ गई थीं। इसके बाद 1827 और अकाल के वर्ष 1837 में भी इसका प्रकोप पूरे जिले में सामने आया था। स्मॉल पॉक्स अथवा चेचक 1850 में तेजी से फैली थी। इसके बाद 1869, 1873, 1879 में चेचक का प्रकोप काफी बढ़ा हुआ था। 1879 में चेचक ने 8311 जानें ली थीं। 1881 से 1890 के दौरान चेचक से हर साल औसतन 772 व्यक्तियों ने जान गंवाई। 1896 में जिले में अकाल का व्यापक असर था। चेचक के मामलों में वृद्धि भी देखने को मिली थी। अंग्रेजों ने चेचक के टीके भी लगवाने शुरू किए थे। 1873 में 14743 लोगों को टीके लगाए गए थे। 1907 आते-आते जिले में चेचक के टीके लगवाने वालों की संख्या 41849 तक पहुंच गई। टीकाकरण के मामले में अलीगढ़ संयुक्त प्रांत (मौजूदा उत्तर प्रदेश) अन्य जिलों में अग्रणी था।
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)

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