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एडीए बंद करो या खोलो, पर नत्थू सिंह का भुगतान करो
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किसानों को मुआवजा न देने के इरादे से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे अलीगढ़ विकास प्राधिकरण को तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट की डबल बैंच ने एडीए की ओर से दायर याचिका पहली ही सुनवाई में महज इस वजह से खारिज कर दी कि याचिका तीन साल की देरी से दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि एडीए चाहे खोलें या बंद करो, मगर किसान को मुआवजा देना ही पड़ेगा। देश की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद एडीए अब किसान को मुआवजा भुगतान संबंधी बारीकियों के अध्ययन में जुट गया है। इधर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुआवजा पाने के लिए 2010 से लड़ाई लड़ रहे किसान नत्थू सिंह को बड़ी राहत मिली है। साथ में अन्य किसानों को भी उम्मीद जागी है कि अब जल्द उन्हें बढ़ा हुआ मुआवजा मिल जाएगा।
यह था मामला
एडीए की ओर से 2004 में स्वर्ण जयंती नगर विस्तार योजना के तहत किसानों से जमीन अधिग्रहण करने की इच्छा जताई गई थी। 2005 में जमीनों के अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। इसमें किसान नत्थू सिंह की चार बीघा जमीन भी शामिल थी। 2006 में एडीए ने जमीन भी अधिग्रहण कर ली। इसके बाद किसान को मुआवजा राशि नहीं दी गई। लगातार उसे टहलाया गया। इसके बाद 2010 में हारकर नत्थू सिंह इलाहाबाद हाईकोर्ट चला गया। हाईकोर्ट ने एडीए की ओर से मुआवजा राशि न दिए जाने की दशा में जमीन का कब्जा नत्थू सिंह के ही पास रहने का आदेश दिया। इसके बाद मामला कोर्ट में चलता रहा। इसी दौरान 2013 में नया भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून आ गया। नये कानून के तहत हाईकोर्ट ने एडीए को आदेश दिया कि या तो वह जमीन छोड़ दे या फिर नत्थू सिंह को चार गुना भुगतान करे।
अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा प्रकरण
इस फैसले को चुनौती देते हुए एडीए मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट चला गया। मंगलवार को याचिका पर सुनवाई को पहली बार बेंच बैठी। बेंच ने पहले दिन ही याचिका को खारिज करते हुए तर्क दिया कि एडीए अपील अवधि निकलने के तीन साल बाद चुनौती याचिका दाखिल करने आया है। इसके चलते इसे सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया जाएगा। इधर, एडीए ने कोर्ट में स्वीकार किया कि उसके अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह नुकसान एडीए को झेलना पड़ेगा। अगर, अधिकारी समय पर किसान के मुआवजे का भुगतान कर देते तो यह सब नहीं झेलना पड़ता। नत्थू सिंह की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता डीके गर्ग ने बताया कि इस याचिका पर सुनवाई जस्टिस आरएफ नारीमन व सूर्यकांत की बैंच ने की।
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इस दौरान अदालत ने साफ साफ चाहे एडीए बंद करो या खोलो, लेकिन किसान को उसकी जमीन का मुआवजा हर हाल में देना होगा। हालांकि इस दौरान एडीए की ओर से मुआवजा राशि करोड़ों में होने का हवाला देकर असमर्थता जताई गई। मगर एडीए की याचिका पहली ही सुनवाई में खारिज कर दी गई। बता दें कि किसान नत्थू सिंह की तरह और भी किसान हैं जो एडीए से 8 हजार रुपये सर्किल रेट के आधार पर भुगतान का दावा कर रहे हैं।
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। ऐसे में अब यह देखा जाएगा कि किसानों को मुआवजा किस तरह दिया जाए। इसके लिए अध्ययन के बाद ही निर्णय लिया जाएगा।
-डीएस भदौरिया, प्रभारी सचिव एडीए
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यह था मामला
एडीए की ओर से 2004 में स्वर्ण जयंती नगर विस्तार योजना के तहत किसानों से जमीन अधिग्रहण करने की इच्छा जताई गई थी। 2005 में जमीनों के अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। इसमें किसान नत्थू सिंह की चार बीघा जमीन भी शामिल थी। 2006 में एडीए ने जमीन भी अधिग्रहण कर ली। इसके बाद किसान को मुआवजा राशि नहीं दी गई। लगातार उसे टहलाया गया। इसके बाद 2010 में हारकर नत्थू सिंह इलाहाबाद हाईकोर्ट चला गया। हाईकोर्ट ने एडीए की ओर से मुआवजा राशि न दिए जाने की दशा में जमीन का कब्जा नत्थू सिंह के ही पास रहने का आदेश दिया। इसके बाद मामला कोर्ट में चलता रहा। इसी दौरान 2013 में नया भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून आ गया। नये कानून के तहत हाईकोर्ट ने एडीए को आदेश दिया कि या तो वह जमीन छोड़ दे या फिर नत्थू सिंह को चार गुना भुगतान करे।
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अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा प्रकरण
इस फैसले को चुनौती देते हुए एडीए मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट चला गया। मंगलवार को याचिका पर सुनवाई को पहली बार बेंच बैठी। बेंच ने पहले दिन ही याचिका को खारिज करते हुए तर्क दिया कि एडीए अपील अवधि निकलने के तीन साल बाद चुनौती याचिका दाखिल करने आया है। इसके चलते इसे सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया जाएगा। इधर, एडीए ने कोर्ट में स्वीकार किया कि उसके अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह नुकसान एडीए को झेलना पड़ेगा। अगर, अधिकारी समय पर किसान के मुआवजे का भुगतान कर देते तो यह सब नहीं झेलना पड़ता। नत्थू सिंह की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता डीके गर्ग ने बताया कि इस याचिका पर सुनवाई जस्टिस आरएफ नारीमन व सूर्यकांत की बैंच ने की।
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इस दौरान अदालत ने साफ साफ चाहे एडीए बंद करो या खोलो, लेकिन किसान को उसकी जमीन का मुआवजा हर हाल में देना होगा। हालांकि इस दौरान एडीए की ओर से मुआवजा राशि करोड़ों में होने का हवाला देकर असमर्थता जताई गई। मगर एडीए की याचिका पहली ही सुनवाई में खारिज कर दी गई। बता दें कि किसान नत्थू सिंह की तरह और भी किसान हैं जो एडीए से 8 हजार रुपये सर्किल रेट के आधार पर भुगतान का दावा कर रहे हैं।
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। ऐसे में अब यह देखा जाएगा कि किसानों को मुआवजा किस तरह दिया जाए। इसके लिए अध्ययन के बाद ही निर्णय लिया जाएगा।
-डीएस भदौरिया, प्रभारी सचिव एडीए
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