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अलीगढ़ः देरी से मिलती है अधपकी रोटी, एमडीएम खाना भूल गए हैं विद्यार्थी
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रसलगंज स्थित जूनियर हाईस्कूल में अपने घर से लाया हुआ खाना खाती छात्राएं।
- फोटो : CITY OFFICE
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बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं के मध्याह्न भोजन योजना का सालाना 30 करोड़ रुपये का बजट है, लेकिन बच्चे इससे मुंह मोड़ते जा रहे हैं। शहर में स्कूली छात्र-छात्राएं घर से टिफिन लेकर आ रहे हैं। टिफिन लाने का अमर उजाला ने जब सोमवार को कारण पूछा तो बताया गया कि खाना अच्छा नहीं लगता है। रोटी देरी से मिलती हैं। वह भी अधपकी रोटी आती हैं। विद्यार्थियों ने बताया कि सब्जी में भी स्वाद नहीं आता है। अभी हाल ही में सीडीओ स्तर से दो एनजीओ का अनुबंध निरस्त किया गया है। आलम यह है कि इसके बावजूद बच्चों को निम्न दर्जे का खाना परोसा जा रहा है।
रेलवे रोड की कोयले वाली गली में कन्या पाठशाला संख्या 12 मॉडल स्कूल, कन्या पाठशाला संख्या 45 और जूनियर हाईस्कूल रेलवे रोड विद्यालय एक ही परिसर में संचालित हैं। इस परिसर में नगर खंड शिक्षा अधिकारी का कार्यालय भी मौजूद है। फिर भी एनजीओ संचालक को कोई खौफ नहीं है। इस परिसर के बच्चों के लिए एक-एक केला, रोटी और सब्जी आई। सब्जी निम्न स्तर की थी। रसलगंज स्थित जूनियर हाईस्कूल, कन्या पाठशाला संख्या आठ, बालक पाठशाला संख्या पांच में तो स्थिति उलट मिली। यहां बच्चे घर से लाया हुआ खाना खा रहे थे। पूछने पर छात्राओं और छोटी-छोटी बच्चियों ने बताया कि खाना देरी से आता है। खाना खाने में भी बुरा सा लगता है। मम्मी का खाना अच्छा है, इसलिए घर से लेकर आते हैं। इस परिसर में सोमवार को अमर उजाला टीम के सामने एनजीओ द्वारा 12 बजकर 20 मिनट पर खाना पहुंचाया गया था। इसी के साथ नई बस्ती स्थित कन्या पाठशाला संख्या 37 में भी बच्चे घर का खाना खाते हुए मिले। बच्चों ने बताया कि खाना बेकार आता है, इसलिए हम घर का खाना ही खाते हैं।
नया नया है काम, फिर भी नहीं दे रहे ध्यान
जिले के विद्यालयों में मध्याह्न भोजन बांटने के लिए 13 एनजीओ को अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह में कार्य आवंटित किया गया था। इसके बाद सभी ने अपना कार्य प्रारंभ किया। दो एनजीओ की रसोई में गड़बड़ी मिलने पर सीडीओ अनुनय झा ने दोनों का अनुबंध निरस्त किया है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि अभी हाल ही में सभी ने नया काम शुरू किया है। दो एनजीओ पर कार्रवाई हुई है। फिर भी एनजीओ संचालक अधिकारियों की नाक के नीचे दोयम दर्जे का खाना क्यों परोस रहे हैं। वह गुणवत्ता युक्त भोजन पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।
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शहर में है यह हाल तो देहात में क्या होगा
अलीगढ़ शहर में जिला स्तरीय अधिकारियों का दफ्तर व बसेरा है, लेकिन यहां एनजीओ संचालक निम्न दर्जे का खाना परोसने से नहीं कतरा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि देहात क्षेत्र में किस प्रकार का खाना बच्चों को परोसा जाता होगा।
गंदगी युक्त बर्तन में परोसा जाता है खाना
अमर उजाला की पड़ताल में यह भी देखा गया कि जिन बर्तनों के माध्यम से एमडीएम विद्यालयों में वितरण किया जा रहा है। वह सभी बर्तन गंदगी युक्त हैं।
- एमडीएम वितरण में यदि गुणवत्ता खराब है या देरी से आने के चलते बच्चे खाना नहीं खा रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षकों को इस संबंध में हमें बताना चाहिए। जिससे समस्या का निराकरण किया जा सके। बच्चों के पौष्टिक आहार में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
- डॉ. लक्ष्मीकांत पांडेय, बीएसए
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रेलवे रोड की कोयले वाली गली में कन्या पाठशाला संख्या 12 मॉडल स्कूल, कन्या पाठशाला संख्या 45 और जूनियर हाईस्कूल रेलवे रोड विद्यालय एक ही परिसर में संचालित हैं। इस परिसर में नगर खंड शिक्षा अधिकारी का कार्यालय भी मौजूद है। फिर भी एनजीओ संचालक को कोई खौफ नहीं है। इस परिसर के बच्चों के लिए एक-एक केला, रोटी और सब्जी आई। सब्जी निम्न स्तर की थी। रसलगंज स्थित जूनियर हाईस्कूल, कन्या पाठशाला संख्या आठ, बालक पाठशाला संख्या पांच में तो स्थिति उलट मिली। यहां बच्चे घर से लाया हुआ खाना खा रहे थे। पूछने पर छात्राओं और छोटी-छोटी बच्चियों ने बताया कि खाना देरी से आता है। खाना खाने में भी बुरा सा लगता है। मम्मी का खाना अच्छा है, इसलिए घर से लेकर आते हैं। इस परिसर में सोमवार को अमर उजाला टीम के सामने एनजीओ द्वारा 12 बजकर 20 मिनट पर खाना पहुंचाया गया था। इसी के साथ नई बस्ती स्थित कन्या पाठशाला संख्या 37 में भी बच्चे घर का खाना खाते हुए मिले। बच्चों ने बताया कि खाना बेकार आता है, इसलिए हम घर का खाना ही खाते हैं।
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नया नया है काम, फिर भी नहीं दे रहे ध्यान
जिले के विद्यालयों में मध्याह्न भोजन बांटने के लिए 13 एनजीओ को अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह में कार्य आवंटित किया गया था। इसके बाद सभी ने अपना कार्य प्रारंभ किया। दो एनजीओ की रसोई में गड़बड़ी मिलने पर सीडीओ अनुनय झा ने दोनों का अनुबंध निरस्त किया है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि अभी हाल ही में सभी ने नया काम शुरू किया है। दो एनजीओ पर कार्रवाई हुई है। फिर भी एनजीओ संचालक अधिकारियों की नाक के नीचे दोयम दर्जे का खाना क्यों परोस रहे हैं। वह गुणवत्ता युक्त भोजन पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।
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शहर में है यह हाल तो देहात में क्या होगा
अलीगढ़ शहर में जिला स्तरीय अधिकारियों का दफ्तर व बसेरा है, लेकिन यहां एनजीओ संचालक निम्न दर्जे का खाना परोसने से नहीं कतरा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि देहात क्षेत्र में किस प्रकार का खाना बच्चों को परोसा जाता होगा।
गंदगी युक्त बर्तन में परोसा जाता है खाना
अमर उजाला की पड़ताल में यह भी देखा गया कि जिन बर्तनों के माध्यम से एमडीएम विद्यालयों में वितरण किया जा रहा है। वह सभी बर्तन गंदगी युक्त हैं।
- एमडीएम वितरण में यदि गुणवत्ता खराब है या देरी से आने के चलते बच्चे खाना नहीं खा रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षकों को इस संबंध में हमें बताना चाहिए। जिससे समस्या का निराकरण किया जा सके। बच्चों के पौष्टिक आहार में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
- डॉ. लक्ष्मीकांत पांडेय, बीएसए

रेलवे रोड स्थित कन्या कन्या पाठशाला संख्या 45 में अधपकी रोटी दिखाती छात्रा। - फोटो : CITY OFFICE