{"_id":"5e2b553e8ebc3e4b494cb665","slug":"a-faimy-found-his-son-after-6-year-aligarh-news-ali224952977","type":"story","status":"publish","title_hn":"मैं बिछड़ों को मिलाने जा रहा हूं, चलो दीवार ढाने जा रहा हूं...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मैं बिछड़ों को मिलाने जा रहा हूं, चलो दीवार ढाने जा रहा हूं...
विज्ञापन
यवाओं के साथ थाने में पीड़ित।
- फोटो : AKBARABAD
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
किसी ने शायर ने लिखा है- मैं बिछड़ों को मिलाने जा रहा हूं, चलो दीवार ढाने जा रहा हूं..। ये लाइन अकराबाद के उन तीन युवकों पर सटीक बैठती हैं, जिन्होंने छह साल से अपनों से बिछड़े एक युवक को उसके परिवार से मिलाया है।
सड़क पर भूख और ठंड से अकड़ते लोगों को उनके घर पहुंचाना आसान नहीं होता। खासकर तब जब वो अपना पता तक भूल चुके हों और भटकने पर मजबूर हों। लेकिन इन युवाओं की मेहनत और लगन ने एक परिवार की खुशी लौटा दी है। कस्बा अकराबाद निवासी तीन दोस्त अरमान(21) पुत्र महफूज अली, राहुल कुमार(22) पुत्र लाल सिंह, हिमांशु (28) पुत्र महेशचंद्र पाठक ने बताया कि करीब पांच महीने पहले दिव्यांग ललित भकटता हुआ कस्बे में आ गया। वह कस्बे के मुख्य बाजार में घूमता रहता था। कुछ दुकानदार उसे खाने का सामान दे देते तो खा लेता।
लेकिन किसी ने उसके बारे में यह जानने की कोशिश नहीं की, कि वह आया कहां से है। युवाओं ने बताया कि हम तीनों ने उसके साथ समय बिताना शुरू किया, ताकि उसके बारे में जानकारी हासिल कर सकें। ललित ने कई बार अपने घर का पता गलत बताया। कई बार मोबाइल नंबर भी गलत बताए। लेकिन हमने अपना प्रयास जारी रखा। उसकी देखभाल की। गत सोमवार को ललित ने एक और नंबर बताया। उस नंबर पर कॉल किया तो ललित की चचेरी बहन से बात हुईं। वह उत्तराखंड के गांव चनौली थाना ज्वाराघाट, अल्मोड़ा से बोल रही थी। ललित की फोटो उसके व्हाट्सएप नंबर पर भेज दी। परिजनों ने ललित को पहचान लिया। वीडियो कॉल पर बात भी की। शुक्रवार को परिजन अकराबाद थाने आकर ललित को अपने साथ ले गए।
विज्ञापन
ललित के चचेरे भाई महेशचंद्र जोशी ने बताया कि बिछड़े भाई का नाम ललित कुमार पुत्र स्व. ओमप्रकाश है। ललित दिल्ली में रहकर निजी कंपनी में नौकरी करता था। छह साल पहले ललित अचानक गायब हो गया। पिता रामप्रकाश की मृत्यु हो गई। ललित की काफी खोजबीन की गई। लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला था। ललित से मिलकर उसके परिजनों की आंखें भर आई। उन्होंने तीनों युवाओं का धन्यवाद किया।
विज्ञापन
सड़क पर भूख और ठंड से अकड़ते लोगों को उनके घर पहुंचाना आसान नहीं होता। खासकर तब जब वो अपना पता तक भूल चुके हों और भटकने पर मजबूर हों। लेकिन इन युवाओं की मेहनत और लगन ने एक परिवार की खुशी लौटा दी है। कस्बा अकराबाद निवासी तीन दोस्त अरमान(21) पुत्र महफूज अली, राहुल कुमार(22) पुत्र लाल सिंह, हिमांशु (28) पुत्र महेशचंद्र पाठक ने बताया कि करीब पांच महीने पहले दिव्यांग ललित भकटता हुआ कस्बे में आ गया। वह कस्बे के मुख्य बाजार में घूमता रहता था। कुछ दुकानदार उसे खाने का सामान दे देते तो खा लेता।
विज्ञापन
लेकिन किसी ने उसके बारे में यह जानने की कोशिश नहीं की, कि वह आया कहां से है। युवाओं ने बताया कि हम तीनों ने उसके साथ समय बिताना शुरू किया, ताकि उसके बारे में जानकारी हासिल कर सकें। ललित ने कई बार अपने घर का पता गलत बताया। कई बार मोबाइल नंबर भी गलत बताए। लेकिन हमने अपना प्रयास जारी रखा। उसकी देखभाल की। गत सोमवार को ललित ने एक और नंबर बताया। उस नंबर पर कॉल किया तो ललित की चचेरी बहन से बात हुईं। वह उत्तराखंड के गांव चनौली थाना ज्वाराघाट, अल्मोड़ा से बोल रही थी। ललित की फोटो उसके व्हाट्सएप नंबर पर भेज दी। परिजनों ने ललित को पहचान लिया। वीडियो कॉल पर बात भी की। शुक्रवार को परिजन अकराबाद थाने आकर ललित को अपने साथ ले गए।
विज्ञापन
ललित के चचेरे भाई महेशचंद्र जोशी ने बताया कि बिछड़े भाई का नाम ललित कुमार पुत्र स्व. ओमप्रकाश है। ललित दिल्ली में रहकर निजी कंपनी में नौकरी करता था। छह साल पहले ललित अचानक गायब हो गया। पिता रामप्रकाश की मृत्यु हो गई। ललित की काफी खोजबीन की गई। लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला था। ललित से मिलकर उसके परिजनों की आंखें भर आई। उन्होंने तीनों युवाओं का धन्यवाद किया।