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एक पेड़ की जिदंगी बचाने की कोशिश
Updated Tue, 19 Jun 2018 02:16 AM IST
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
दो साल पहले तक मैं हरा-भरा था। मेरी छांव में शिक्षक-छात्र सुस्ताते थे, टहनियों पर परिंदे गुनगुनाते थे। राही मासूम रजा मेरी छांव में महफिल जमा चुके हैं तो शहरयार ने भी मेरी सोहबत में कितने ही शेर गुनगुनाए हैं। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं हूं कौन? दरअसल मैं पिलखन (पाकड़) का एक पुराना पेड़ हूं, जो कई दशक से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मास कम्युनिकेशन विभाग के पास लहराता हुआ आबाद था, लेकिन इन दिनों धीमी मौत मर रहा हूं। प्लीज, मुझे बचा लीजिए। मेरी काया, मेरी छाया को बचा लीजिए।
छात्र-शिक्षकों के बीच मैं विजडम ट्री के नाम से मशहूर रहा हूं। बुजुर्ग लोग मेरी उम्र 80 से 100 वर्ष तक बताते हैं, जबकि मैं खुद भूल चुका हूं कि मेरी असल उम्र क्या है। याद हैं तो सिर्फ वे सुख-दुख की बातें, जो मेरी छाया में बैठकर तमाम शिक्षकों-छात्रों, कलाकारों-कलमकारों ने एक दूसरे से साझा की हैं।
अपनी शीतल छाया में युवा दिलों में प्रेम के अंकुर उगते भी मैंने देखे हैं। 2016 के पतझड़ के बाद मेरी डालें टूटकर गिरने लगीं। आप मेरी दो साल पुरानी तस्वीर और आज की तस्वीर देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरी हालत क्या से क्या हो चुकी है। मेरी ये हालत क्यों हुई, ये तो विशेषज्ञ ही बता सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि मेरे नीचे की जमीन को जब ईंट-कंक्रीट से पाटा गया, तभी से मेरी तबियत भी बिगड़ने लगी। आप सब से गुजारिश है कि मेरी इस धीमी मौत का जो भी कारण हो, उसका पता लगाकर मुझे बचाने की कृपा करें।
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इस एतिहासिक पेड़ को बचाने का हर संभव प्रयास होना चाहिए। जो लोग पौधारोपण करके फोटो छपवाने की होड़ में लगे रहते हैं, उन्हें एक मरते हुए पेड़ को बचाने के लिए भी आगे आना चाहिए। पेड़ के नीचे से ईंट-कंक्रीट की फर्श हटाई जाए और वैज्ञानिक तरीके से इसकी रक्षा का हर उपाय किया जाना चाहिए।
सुबोध नंदन शर्मा, पर्यावरणविद
पेड़ को बचाने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान, लैंड्स एंड गार्डन तथा कृषि विज्ञान संकाय के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में इस एतिहासिक पेड़ के पास खुदाई का काम चल रहा है और दवा का छिड़काव किया जा रहा है।
प्रो. शाफे किदवई, एएमयू पीआरओ ऑफिस के एमआईसी
हेडिंग...
पूरे पाकिस्तान में नहीं देखा ऐसा पिलखन का पेड़
भारत एवं पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय उर्दू साहित्यकार इंतजार हुसैन एएमयू के मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के पास स्थित पिलखन के पेड़ के नीचे कुर्सी मंगाकर आधे घंटे तक बैठे थे। एएमयू मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं एएमयू पीआरओ ऑफिस के मेंबर इंचार्ज प्रो. शाफे किदवई कहते हैं कि एक बार इंतजार हुसैन मॉस कम्यूनिकेशन विभाग में आए थे। उनके साथ मशहूर शायर शहरयार भी थे। जब विभाग से बाहर निकले तो उनकी नजर पिलखन के इस पेड़ पर गई। कुर्सी मंगाकर पेड़ के नीचे करीब आधे घंटे तक बैठे रहे। पेड़ की बहुत तारीफ की और कहा कि ऐसा पिलखन का पेड़ पूरे पाकिस्तान में नहीं देखा।
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दो साल पहले तक मैं हरा-भरा था। मेरी छांव में शिक्षक-छात्र सुस्ताते थे, टहनियों पर परिंदे गुनगुनाते थे। राही मासूम रजा मेरी छांव में महफिल जमा चुके हैं तो शहरयार ने भी मेरी सोहबत में कितने ही शेर गुनगुनाए हैं। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं हूं कौन? दरअसल मैं पिलखन (पाकड़) का एक पुराना पेड़ हूं, जो कई दशक से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मास कम्युनिकेशन विभाग के पास लहराता हुआ आबाद था, लेकिन इन दिनों धीमी मौत मर रहा हूं। प्लीज, मुझे बचा लीजिए। मेरी काया, मेरी छाया को बचा लीजिए।
छात्र-शिक्षकों के बीच मैं विजडम ट्री के नाम से मशहूर रहा हूं। बुजुर्ग लोग मेरी उम्र 80 से 100 वर्ष तक बताते हैं, जबकि मैं खुद भूल चुका हूं कि मेरी असल उम्र क्या है। याद हैं तो सिर्फ वे सुख-दुख की बातें, जो मेरी छाया में बैठकर तमाम शिक्षकों-छात्रों, कलाकारों-कलमकारों ने एक दूसरे से साझा की हैं।
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अपनी शीतल छाया में युवा दिलों में प्रेम के अंकुर उगते भी मैंने देखे हैं। 2016 के पतझड़ के बाद मेरी डालें टूटकर गिरने लगीं। आप मेरी दो साल पुरानी तस्वीर और आज की तस्वीर देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरी हालत क्या से क्या हो चुकी है। मेरी ये हालत क्यों हुई, ये तो विशेषज्ञ ही बता सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि मेरे नीचे की जमीन को जब ईंट-कंक्रीट से पाटा गया, तभी से मेरी तबियत भी बिगड़ने लगी। आप सब से गुजारिश है कि मेरी इस धीमी मौत का जो भी कारण हो, उसका पता लगाकर मुझे बचाने की कृपा करें।
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इस एतिहासिक पेड़ को बचाने का हर संभव प्रयास होना चाहिए। जो लोग पौधारोपण करके फोटो छपवाने की होड़ में लगे रहते हैं, उन्हें एक मरते हुए पेड़ को बचाने के लिए भी आगे आना चाहिए। पेड़ के नीचे से ईंट-कंक्रीट की फर्श हटाई जाए और वैज्ञानिक तरीके से इसकी रक्षा का हर उपाय किया जाना चाहिए।
सुबोध नंदन शर्मा, पर्यावरणविद
पेड़ को बचाने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान, लैंड्स एंड गार्डन तथा कृषि विज्ञान संकाय के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में इस एतिहासिक पेड़ के पास खुदाई का काम चल रहा है और दवा का छिड़काव किया जा रहा है।
प्रो. शाफे किदवई, एएमयू पीआरओ ऑफिस के एमआईसी
हेडिंग...
पूरे पाकिस्तान में नहीं देखा ऐसा पिलखन का पेड़
भारत एवं पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय उर्दू साहित्यकार इंतजार हुसैन एएमयू के मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के पास स्थित पिलखन के पेड़ के नीचे कुर्सी मंगाकर आधे घंटे तक बैठे थे। एएमयू मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं एएमयू पीआरओ ऑफिस के मेंबर इंचार्ज प्रो. शाफे किदवई कहते हैं कि एक बार इंतजार हुसैन मॉस कम्यूनिकेशन विभाग में आए थे। उनके साथ मशहूर शायर शहरयार भी थे। जब विभाग से बाहर निकले तो उनकी नजर पिलखन के इस पेड़ पर गई। कुर्सी मंगाकर पेड़ के नीचे करीब आधे घंटे तक बैठे रहे। पेड़ की बहुत तारीफ की और कहा कि ऐसा पिलखन का पेड़ पूरे पाकिस्तान में नहीं देखा।