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अलीगढ़ में बोले कर्मी, तनख्वाह न बढ़ी तो दे देंगे जान
Updated Sat, 15 Jul 2017 01:02 AM IST
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तनख्वाह न बढ़ी तो दे देंगे जान
ब्यूरो, अमर उजाला, अलीगढ़।
तनख्वाह न बढ़ने से स्टेडियम के वेतनभोगी कर्मचारियों ने खुदकुशी करने की धमकी दी है। आरोप लगाया कि सरकार सबकी सुन रही है, मगर, वेतनभोगी कर्मचारियों की नहीं। इतनी कम तनख्वाह में परिवार के साथ गुजर-बसर करना मुश्किल हो रहा है।
महारानी अहिल्याबाई होल्कर स्पोर्ट्स स्टेडियम में सन् 1993 में 650 रुपये के मासिक वेतन पर बतौर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी लगे सुनील दत्त शर्मा ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब है। अब उन्हें हर महीने 4420 रुपये मिलते हैं, जो नाकाफी हैं।
उन्होंने कहा कि उनकी तनख्वाह नहीं बढ़ाई गई तो बैडमिंटन कोर्ट की छत से कूदकर जान देंगे। कहा, अब सब्र करने की इंतिहा हो गई है। इसलिए अब वेतनभोगी कर्मचारियों की तनख्वाह 15 हजार रुपये तो होनी ही चाहिए।
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कहा, तनख्वाह की रकम दिन के हिसाब से महज 149 रुपये बैठ रही है, जो तीन बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है, 19 साल की सेवा का क्या यही सिला मिलना चाहिए? वहीं, इनके साथ रवींद्र कुमार पिछले पांच साल और रामबाबू भी डेढ़ साल से इतनी कम तनख्वाह में काम करने को मजबूर हैं।
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ब्यूरो, अमर उजाला, अलीगढ़।
तनख्वाह न बढ़ने से स्टेडियम के वेतनभोगी कर्मचारियों ने खुदकुशी करने की धमकी दी है। आरोप लगाया कि सरकार सबकी सुन रही है, मगर, वेतनभोगी कर्मचारियों की नहीं। इतनी कम तनख्वाह में परिवार के साथ गुजर-बसर करना मुश्किल हो रहा है।
महारानी अहिल्याबाई होल्कर स्पोर्ट्स स्टेडियम में सन् 1993 में 650 रुपये के मासिक वेतन पर बतौर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी लगे सुनील दत्त शर्मा ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब है। अब उन्हें हर महीने 4420 रुपये मिलते हैं, जो नाकाफी हैं।
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उन्होंने कहा कि उनकी तनख्वाह नहीं बढ़ाई गई तो बैडमिंटन कोर्ट की छत से कूदकर जान देंगे। कहा, अब सब्र करने की इंतिहा हो गई है। इसलिए अब वेतनभोगी कर्मचारियों की तनख्वाह 15 हजार रुपये तो होनी ही चाहिए।
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कहा, तनख्वाह की रकम दिन के हिसाब से महज 149 रुपये बैठ रही है, जो तीन बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है, 19 साल की सेवा का क्या यही सिला मिलना चाहिए? वहीं, इनके साथ रवींद्र कुमार पिछले पांच साल और रामबाबू भी डेढ़ साल से इतनी कम तनख्वाह में काम करने को मजबूर हैं।