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आज भी दरबारी यादें सहेजे है तहसील कोल की मुंशी डेस्क-First Page
Updated Tue, 26 Jun 2018 01:32 AM IST
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क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
ई-मेल से संदेश भेजने वाले पेपरलेस जॉब के इस दौर में हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कुछ कामकाज आज भी दरबारी परंपराओं की याद दिलाते हैं। तहसील कोल के दूसरे माले पर कमरा नंबर 20 में स्थापित मुंशी डेस्क अंग्रेजों द्वारा स्थापित परंपरा की गवाही देती है। यहां बैठकर काम करने वाला कर्मचारी उस पुराने दौर को याद दिलाता है, जब किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या सरकारी दफ्तर में डेस्क पर बैठा मोटे चश्मे वाला मुंशी हिसाब-किताब रखा करता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुंशी डेस्क नाम की इस व्यवस्था को स्थापित किया था। मंशा सिर्फ डाक के सुरक्षित वितरण की थी। खास बात यह है कि जिले की पांच तहसीलों में अब कोल व अतरौली में ही यह डेस्क संचालित है। बाकी तहसीलों में इस डेस्क का स्थान मेज-कुर्सी ने ले लिया है, मगर नाम मुंशी डेस्क ही है।
तहसील का एतिहासिक संदर्भ
1804 में स्थापित जिले की कोल तहसील 1880-1890 के दशक में स्थापित हुई और उस समय यह तहसील ऊपरकोट कोतवाली परिसर में हुआ करती थी। यह वही दौर था जब देश पर राजाओं का शासन था। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में भी तमाम भाषाओं में सरकारी डाक आती थी। तालाबंद डेस्क में उस डाक को सहेज कर रखा जाता था। और डेस्क मुंशी उन भाषाओं को समझकर संदेश वितरित कराता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही इस व्यवस्था को स्थापित करते हुए डेस्क मुंशी नाम दिया था। आजादी के बाद भी दस्तावेजों में यही नाम है।
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तहसील कोल की मुंशी डेस्क
डेस्क:- ऐतिहासिक डेस्क लकड़ी की बनी है। इसकी ऊंचाई सवा फीट, चौड़ाई पौने 2 फीट और लंबाई सवा 2 फीट है। डेस्क अंदर से 8 इंच गहरी है। इसमें जरूरी डाक रखकर ताला बंद की व्यवस्था है।
काम: 7 हलकों की तमीलात, हवालात, जनसूचना, वीआईपी आदि को मिलाकर प्रतिदिन 80 से 85 डाक आती हैं। आधा दर्जन तमीलात कर्मी डेस्क मुंशी नरेश तिवारी की निगरानी में इनका वितरण करते हैं।
हल्के:- तहसील कोल में 7 हल्कों की डाक आती हैं। मोरथल, लोधा, कोल, जलाली, शहर, विजयगढ़ और अकराबाद कुल 7 हल्के हैं। मोरथल में जवां भी शामिल है। इसी तरह लोधा में मोरथल का कुछ हिस्सा, जलाली में धनीपुर और शहर में सिविल लाइंस भी शामिल है।
सिर्फ अतरौली में बची है डेस्क
कलेक्ट्रेट सहित जिले की सभी 5 तहसीलों में डेस्क मुंशी नाम की व्यवस्था संचालित है। मगर कोल और अतरौली को छोड़ बाकी तहसीलों में डेस्क की जगह अब कुर्सी मेज ने ले ली है। पांचों तहसील और कलेक्ट्रेट को मिलाकर 350 से 400 डाक प्रतिदिन आती हैं।
अंग्रेजों के समय में भी यही डेस्क थी। हमारी डाक इसमें सुरक्षित रहती हैं। रोज 80 से 85 डाक आती हैं, उनके लिए यह पर्याप्त है। डाक रखकर इसमें ताला लगा दिया जाता है। वितरण के समय डाक निकाल ली जाती है। -नरेश तिवारी, डेस्क मुंशी, कोल
डेस्क कल्चर को ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थापित करके डेस्क मुंशी नाम दिया था। तभी से यही नाम चला आ रहा है। डाक के लिए डेस्क कल्चर अंग्रेजों के शासन से भी पहले का है। तहसील कोल की डेस्क उसी दौर की है। हालांकि कोल और अतरौली के अलावा और कहीं अब ये डेस्क नहीं बची हैं।-शब्बीर अहमद, नाजिर सदर, कलेक्ट्रेट।
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ई-मेल से संदेश भेजने वाले पेपरलेस जॉब के इस दौर में हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कुछ कामकाज आज भी दरबारी परंपराओं की याद दिलाते हैं। तहसील कोल के दूसरे माले पर कमरा नंबर 20 में स्थापित मुंशी डेस्क अंग्रेजों द्वारा स्थापित परंपरा की गवाही देती है। यहां बैठकर काम करने वाला कर्मचारी उस पुराने दौर को याद दिलाता है, जब किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या सरकारी दफ्तर में डेस्क पर बैठा मोटे चश्मे वाला मुंशी हिसाब-किताब रखा करता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुंशी डेस्क नाम की इस व्यवस्था को स्थापित किया था। मंशा सिर्फ डाक के सुरक्षित वितरण की थी। खास बात यह है कि जिले की पांच तहसीलों में अब कोल व अतरौली में ही यह डेस्क संचालित है। बाकी तहसीलों में इस डेस्क का स्थान मेज-कुर्सी ने ले लिया है, मगर नाम मुंशी डेस्क ही है।
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तहसील का एतिहासिक संदर्भ
1804 में स्थापित जिले की कोल तहसील 1880-1890 के दशक में स्थापित हुई और उस समय यह तहसील ऊपरकोट कोतवाली परिसर में हुआ करती थी। यह वही दौर था जब देश पर राजाओं का शासन था। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में भी तमाम भाषाओं में सरकारी डाक आती थी। तालाबंद डेस्क में उस डाक को सहेज कर रखा जाता था। और डेस्क मुंशी उन भाषाओं को समझकर संदेश वितरित कराता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही इस व्यवस्था को स्थापित करते हुए डेस्क मुंशी नाम दिया था। आजादी के बाद भी दस्तावेजों में यही नाम है।
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तहसील कोल की मुंशी डेस्क
डेस्क:- ऐतिहासिक डेस्क लकड़ी की बनी है। इसकी ऊंचाई सवा फीट, चौड़ाई पौने 2 फीट और लंबाई सवा 2 फीट है। डेस्क अंदर से 8 इंच गहरी है। इसमें जरूरी डाक रखकर ताला बंद की व्यवस्था है।
काम: 7 हलकों की तमीलात, हवालात, जनसूचना, वीआईपी आदि को मिलाकर प्रतिदिन 80 से 85 डाक आती हैं। आधा दर्जन तमीलात कर्मी डेस्क मुंशी नरेश तिवारी की निगरानी में इनका वितरण करते हैं।
हल्के:- तहसील कोल में 7 हल्कों की डाक आती हैं। मोरथल, लोधा, कोल, जलाली, शहर, विजयगढ़ और अकराबाद कुल 7 हल्के हैं। मोरथल में जवां भी शामिल है। इसी तरह लोधा में मोरथल का कुछ हिस्सा, जलाली में धनीपुर और शहर में सिविल लाइंस भी शामिल है।
सिर्फ अतरौली में बची है डेस्क
कलेक्ट्रेट सहित जिले की सभी 5 तहसीलों में डेस्क मुंशी नाम की व्यवस्था संचालित है। मगर कोल और अतरौली को छोड़ बाकी तहसीलों में डेस्क की जगह अब कुर्सी मेज ने ले ली है। पांचों तहसील और कलेक्ट्रेट को मिलाकर 350 से 400 डाक प्रतिदिन आती हैं।
अंग्रेजों के समय में भी यही डेस्क थी। हमारी डाक इसमें सुरक्षित रहती हैं। रोज 80 से 85 डाक आती हैं, उनके लिए यह पर्याप्त है। डाक रखकर इसमें ताला लगा दिया जाता है। वितरण के समय डाक निकाल ली जाती है। -नरेश तिवारी, डेस्क मुंशी, कोल
डेस्क कल्चर को ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थापित करके डेस्क मुंशी नाम दिया था। तभी से यही नाम चला आ रहा है। डाक के लिए डेस्क कल्चर अंग्रेजों के शासन से भी पहले का है। तहसील कोल की डेस्क उसी दौर की है। हालांकि कोल और अतरौली के अलावा और कहीं अब ये डेस्क नहीं बची हैं।-शब्बीर अहमद, नाजिर सदर, कलेक्ट्रेट।