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रमजान 2018: पढ़ें उन महिलाओं के बारे में जो एक साथ निभा रहीं कई फर्ज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
Updated Tue, 22 May 2018 03:54 PM IST
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तरावीह की नमाज अदा करते राेजेदार
- फोटो : अमर उजाला
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माह-ए-रमजान में यूं तो छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक रोजे रखकर इबादत कर रहे हैं, लेकिन कामकाजी महिलाओं का जोश भी कम नहीं है।
भीषण गर्मी में 15 घंटे का रोजा रखने के बाद भी वह घर के साथ ही आफिस की जिम्मेदारियों को बखूबी संभाल रही हैं। उनका कहना है कि रोजा रखने से थकान नहीं होती बल्कि दिनभर तरोताजा महसूस करती हैं।
बैकुंठी देवी गर्ल्स कॉलेज में उर्दू की विभागध्यक्ष डॉ. नसरीन बेगम का कहना है कि रमजान का महीना हमें बहुत सारी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है। अमन व सलामती, मोहब्बत, भाईचारे और दुखी इंसानियत की जरूरत पूरी करने का मौका देता है।
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भीषण गर्मी में 15 घंटे का रोजा रखने के बाद भी वह घर के साथ ही आफिस की जिम्मेदारियों को बखूबी संभाल रही हैं। उनका कहना है कि रोजा रखने से थकान नहीं होती बल्कि दिनभर तरोताजा महसूस करती हैं।
बैकुंठी देवी गर्ल्स कॉलेज में उर्दू की विभागध्यक्ष डॉ. नसरीन बेगम का कहना है कि रमजान का महीना हमें बहुत सारी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है। अमन व सलामती, मोहब्बत, भाईचारे और दुखी इंसानियत की जरूरत पूरी करने का मौका देता है।
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कामकाजी महिलाएं जो वक्त का खास ख्याल रखती हैं, वे अपनी जिम्मेदारियों के साथ रोजा रखती है। रोजा फर्ज है। कालेज के साथ अपने घर को संभालने के लिए मैं वक्त निकाल ही लेती हू्ं। रोजे रखने से रुहानी ताकत महसूस करती हूं।
फैशन डिजाइनर निशात मिर्जा ने बताय कि मुबारक रमजान साल में एक बार ही आता है। ऐसे में मगफिरत करने, तरावीह पढ़ने से समय का पता नहीं चलता। अलसुबह उठकर सहरी तैयार करना।
इसके बाद पूरे दिन अपने बुटीक में काम करना। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि हम अतिरिक्त काम कर रहे हैं। काफी साल से रोजा रखती हूं। इबादत करना तो दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए। इसके लिए वक्त निकालने जैसी कोई बात नहीं है। खुदा की इबादत भी दिनचर्या का हिस्सा है।
फैशन डिजाइनर निशात मिर्जा ने बताय कि मुबारक रमजान साल में एक बार ही आता है। ऐसे में मगफिरत करने, तरावीह पढ़ने से समय का पता नहीं चलता। अलसुबह उठकर सहरी तैयार करना।
इसके बाद पूरे दिन अपने बुटीक में काम करना। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि हम अतिरिक्त काम कर रहे हैं। काफी साल से रोजा रखती हूं। इबादत करना तो दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए। इसके लिए वक्त निकालने जैसी कोई बात नहीं है। खुदा की इबादत भी दिनचर्या का हिस्सा है।