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हम खुश हैं पापा और आप सब कैसे हैं, भाभी कैसी हैं
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कासगंज। हत्या का शिकार हुई रत्नेश और उसके दोनों बच्चों की अस्थियों का अंतिम संस्कार करते परिवार ?
- फोटो : KASGANJ
कासगंज। पापा हम सब खुश हैं, आप सब कैसे हैं और भाभी कैसी हैं। भाभी का रत्नेश को इस वजह ख्याल था क्यों कि उसके भाई की शादी दो माह पूर्व हुई थी। आखिरी बार 13 फरवरी 2018 की शाम को फोन पर पिता मोतीलाल की यह बातें बेटी से हुईं थीं, जो बार-बार उनके कानों में गूंज रहीं थीं और वे इन बातों को यादकर फफक-फफक कर रो रहे थे। मां, भाई सबका रो-रोकर बुरा हाल था।
अस्थियों के अंतिम संस्कार की जैसे जैसे तैयारियां बढ़ती जा रहीं थीं पिता मोतीलाल की आंखों के आंसू तेजी से बह रहे थे। वे फफक कर कह रहे थे कि मेरी लाडली मुझसे इतना प्यार करती थी कि प्रतिदिन फोन पर बात कर खुद और बच्चों का हाल बताती थी, बल्कि पूरे परिवार का हाल जानती भी थी। वह इतनी भोली थी कि उसने अपने पति राकेश जो उसका कातिल बना उसकी कभी बुराई नहीं की। दामाद ही कातिल बना और बेटी को ही मौत के घाट नहीं उतारा बल्कि मेरे धेवते और धेवती को भी मार डाला। मां केला देवी बार-बार उस लम्हें को याद कर रहीं थी जब राकेश के साथ अपनी लाडली रत्नेश की शादी की थी। भाई जितेंद्र, राजू और भाभी सरिता देवी का भी बुरा हाल है।
कांधों पर नहीं हाथों में हुई अंतिम विदाई
मौत के बाद लोगों को चार कांधे दिए जाते हैं, लेकिन इस घटना के बाद तो यह परंपरा भी टूटती दिखी। साढ़े तीन साल बाद मृतकों की अस्थियां मिलीं तो इन्हें पोटली में बांधकर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। बहन और भांजों की अस्थियों की पोटली हाथों में लेकर फफकते हुए भाई श्मशान तक पहुंचे। यह दृश्य देख लोगों की जुबां पर यही बात थी कि मौत के बाद जिन्हें कांधे होने चाहिए उनकी अंतिम विदाई हाथों में हो रही है।
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ससुरालीजनों के साथ तलाशता रहा कातिल दामाद
मृतका रत्नेश के भाई जितेंद्र कुमार ने बताया कि उसके बहनोई राकेश ने 14 फरवरी 2018 को फोन करके बताया था कि तुम्हारी बहन रत्नेश और दोनों बच्चे कहीं गायब हो गए हैं, मैं उनकी तलाश में लगा हूं। आप लोग जल्दी आ जाओ। जैसे ही यह जानकारी मिली तो दिल्ली में रह रहे भाई को पहले ही नोएडा भेज दिया और फिर परिवार के साथ खुद नोएडा पहुंच गए। तलाश जारी रही। 7 दिनों तक तो बहनोई राकेश तलाश में साथ घूमता रहा और उसके बाद बहन के चरित्र पर उंगली उठाते हुए तेवर बदल लिए। शक होने पर उसके खिलाफ तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने एक न सुनी। तब न्यायालय का सहारा लेकर मुकदमा दर्ज कराया था।
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अस्थियों के अंतिम संस्कार की जैसे जैसे तैयारियां बढ़ती जा रहीं थीं पिता मोतीलाल की आंखों के आंसू तेजी से बह रहे थे। वे फफक कर कह रहे थे कि मेरी लाडली मुझसे इतना प्यार करती थी कि प्रतिदिन फोन पर बात कर खुद और बच्चों का हाल बताती थी, बल्कि पूरे परिवार का हाल जानती भी थी। वह इतनी भोली थी कि उसने अपने पति राकेश जो उसका कातिल बना उसकी कभी बुराई नहीं की। दामाद ही कातिल बना और बेटी को ही मौत के घाट नहीं उतारा बल्कि मेरे धेवते और धेवती को भी मार डाला। मां केला देवी बार-बार उस लम्हें को याद कर रहीं थी जब राकेश के साथ अपनी लाडली रत्नेश की शादी की थी। भाई जितेंद्र, राजू और भाभी सरिता देवी का भी बुरा हाल है।
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कांधों पर नहीं हाथों में हुई अंतिम विदाई
मौत के बाद लोगों को चार कांधे दिए जाते हैं, लेकिन इस घटना के बाद तो यह परंपरा भी टूटती दिखी। साढ़े तीन साल बाद मृतकों की अस्थियां मिलीं तो इन्हें पोटली में बांधकर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। बहन और भांजों की अस्थियों की पोटली हाथों में लेकर फफकते हुए भाई श्मशान तक पहुंचे। यह दृश्य देख लोगों की जुबां पर यही बात थी कि मौत के बाद जिन्हें कांधे होने चाहिए उनकी अंतिम विदाई हाथों में हो रही है।
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ससुरालीजनों के साथ तलाशता रहा कातिल दामाद
मृतका रत्नेश के भाई जितेंद्र कुमार ने बताया कि उसके बहनोई राकेश ने 14 फरवरी 2018 को फोन करके बताया था कि तुम्हारी बहन रत्नेश और दोनों बच्चे कहीं गायब हो गए हैं, मैं उनकी तलाश में लगा हूं। आप लोग जल्दी आ जाओ। जैसे ही यह जानकारी मिली तो दिल्ली में रह रहे भाई को पहले ही नोएडा भेज दिया और फिर परिवार के साथ खुद नोएडा पहुंच गए। तलाश जारी रही। 7 दिनों तक तो बहनोई राकेश तलाश में साथ घूमता रहा और उसके बाद बहन के चरित्र पर उंगली उठाते हुए तेवर बदल लिए। शक होने पर उसके खिलाफ तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने एक न सुनी। तब न्यायालय का सहारा लेकर मुकदमा दर्ज कराया था।