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कारगिल शहीद: टाइगर हिल जीत में निभाई थी अहम भूमिका, दस घुसपैठिये किये थे ढेर
Tue, 23 Jul 2019 08:53 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Tue, 23 Jul 2019 08:53 AM IST
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कारगिल शहीद नायक रविकरन सिंह (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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20 साल 18 दिन पहले नावली के लाल रविकरन ने 12 हजार फुट की ऊंचाई पर दुश्मन को ललकारते हुए आठ गालियां खाईं थीं। अंतिम सांस तक लड़े रविकरन ने पाक के 10 घुसपैठियों को मार गिराया था। कारगिल शहीद नायक रविकरन सिंह कर्नल कुशाल सिंह ठाकुर की टुकड़ी में सबसे आगे थे।
नौहझील के गांव नावली निवासी किसान ब्रजेंद्र सिंह के बेटे रविकरन सिंह सन् 1985 में आगरा स्थित बीआरओ से सेना में भर्ती हुए थे। ट्रेनिंग के बाद वह 18 ग्रेनेडियर लड़ाकू यूनिट में सिपाही बने। कारगिल की लड़ाई में वह जम्मू कश्मीर में भेजे गए।
उनकी यूनिट 12 हजार से अधिक ऊंचाई पर स्थित टाइगर हिल पर लड़ रही थी। यूनिट का नेतृत्व कर्नल कुशाल ठाकुर कर रहे थे। उनकी यूनिट अग्रज भूमिका में थी। पाक सैनिक घुसपैठियों से आमने सामने की लड़ाई व गोलाबारी चल रही थी।
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नौहझील के गांव नावली निवासी किसान ब्रजेंद्र सिंह के बेटे रविकरन सिंह सन् 1985 में आगरा स्थित बीआरओ से सेना में भर्ती हुए थे। ट्रेनिंग के बाद वह 18 ग्रेनेडियर लड़ाकू यूनिट में सिपाही बने। कारगिल की लड़ाई में वह जम्मू कश्मीर में भेजे गए।
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उनकी यूनिट 12 हजार से अधिक ऊंचाई पर स्थित टाइगर हिल पर लड़ रही थी। यूनिट का नेतृत्व कर्नल कुशाल ठाकुर कर रहे थे। उनकी यूनिट अग्रज भूमिका में थी। पाक सैनिक घुसपैठियों से आमने सामने की लड़ाई व गोलाबारी चल रही थी।
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कर्नल कुशाल ठाकुर की यूनिट के जवान बचाव करते हुए चोटियों से हमला कर रहे थे। इसमें चार जुलाई को दोपहर के समय नायक रविकरन सिंह लगातार गोलियां दाग रहे थे।
इसी दौरान घुसपैठियों की ओर से हुई फायरिंग में रवीकरन सिंह के पहले हाथ में, फिर सीने के साथ शरीर में आठ गोलियां लगी थीं। इतने पर भी रवीकरन सिंह अंतिम सांस तक ट्रिगर खींचते रहे। अंत में वह वीरगति को प्राप्त हो गए। सात जुलाई 1999 को उनका पार्थिव शरीर मथुरा लाया गया और गांव नावली में अंतिम संस्कार किया गया।
इसी दौरान घुसपैठियों की ओर से हुई फायरिंग में रवीकरन सिंह के पहले हाथ में, फिर सीने के साथ शरीर में आठ गोलियां लगी थीं। इतने पर भी रवीकरन सिंह अंतिम सांस तक ट्रिगर खींचते रहे। अंत में वह वीरगति को प्राप्त हो गए। सात जुलाई 1999 को उनका पार्थिव शरीर मथुरा लाया गया और गांव नावली में अंतिम संस्कार किया गया।