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संतान प्राप्ति के लिए सूर्यदेव ने सूकरक्षेत्र में किया था तप, वराह पुराण में सूर्यदेव के तप का मिलता है वर्णन
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तीर्थनगरी सोरों में स्थित सूर्यकुंड ।
- फोटो : KASGANJ
सोरों(कासगंज)। सूकरक्षेत्र सोरों के एक नहीं अनेको ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व से जुड़े प्रमाण हैं। वराह पुराण के अनुसार यहां भगवान सूर्य ने पुत्र की कामना के लिए तप किया था। आज इस ऐतिहासिक धरोहर को बेहतर संरक्षण की जरूरत है।
वराह पुराण के अनुसार बाल स्वरूप भगवान नारायण ने सूर्य की तपस्या से खुश होकर एक पुत्र यम एवं एक पुत्री यमी नामक जुड़वा संतान का वर दिया था। यहां सूर्य मंदिर एवं प्रतिमाओं को आक्रमणकारियों ने तोड़ डाला था, लेकिन उसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। यहां सूर्यकुंड सरोवर है। मान्यता है कि यहां अनेक संत महापुरुषों ने अपनी साधना की है। उत्तर भारत के वेद मर्मज्ञ विद्वान पंडित दशरथ शास्त्री ने भी यहां साधना की है।
तीर्थ महात्म्य के अनुसार जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक इस तीर्थ में 8 दिनों तक उपवास एवं गंगा स्नान करता है, उसे अभीष्ट फल प्राप्त होता है। बताया जाता है कि वैशाख मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी को अंधकार के बीच सोमतीर्थ का स्थान दिखाई देता है। इस तीर्थ के प्रभाव से राजा सोमदत्त के वाण से आहत श्रंगाली ने अपने प्राणों को त्यागकर कांडक्षत देश के राजा की पुत्री के रूप में जन्म लिया। फिर पुन: यहां आकर निवास किया और मोक्ष को प्राप्त किया। सोमतीर्थ और सूर्य तीर्थ होने के प्रमाण पुराणों में वर्णित हैं। आज भी बड़ी संख्या में लोग इन पवित्र स्थानों में पहुंचकर पूजा, अर्चना, हवन आदि करके मनोवांछित फलों की कामना करते हैं।
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ज्योतिषाचार्यों की बात:
तीर्थनगरी के सूर्यकुंड में सूर्योदय के समय सबसे पहले सूरज की किरणें पड़ती हैं। उस समय इसमें स्नान करने से बल, बुद्धि, आरोग्य और तेज की प्राप्ति होती है। नगर को तीर्थस्थलों के नक्शे में शामिल करना आवश्यक है। - पं. गोपाल शास्त्री
वराह पुराण में इस तीर्थंनगरी के संबंध में तमाम प्रमाण मौजूद हैं। यह ऐसा तीर्थक्षेत्र है कि सूर्यदेव ने यहां तप किया वहीं पुत्र की कामना में मार्तंड ने यहां महान तप किया। इस तीर्थ का ऐसा प्रभाव है कि मनुष्य को यहां मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है। - पं. राहुल वशिष्ठ
सोरों सूकरक्षेत्र में सूर्यकुंड का पौराणिक एवं धार्मिक रूप से विशेष महत्व है। यह भगवान सूर्य की तपस्थली है। यहां साधना करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। नगर को तीर्थंनगरी का दर्जा मिलना बेहद आवश्यक है। - पं. चक्रधर द्विवेदी
सोरों सूकरक्षेत्र प्राचीन तीर्थ है। इस आदि तीर्थ की उपेक्षा सरकारों के द्वारा की जा रही है, जो गलत है। सरकार इन पौराणिक धरोहरों के विकास के लिए तीर्थस्थल घोषित करे। - पं. अम्बरीश निर्भय, ज्योतिषाचार्य
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वराह पुराण के अनुसार बाल स्वरूप भगवान नारायण ने सूर्य की तपस्या से खुश होकर एक पुत्र यम एवं एक पुत्री यमी नामक जुड़वा संतान का वर दिया था। यहां सूर्य मंदिर एवं प्रतिमाओं को आक्रमणकारियों ने तोड़ डाला था, लेकिन उसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। यहां सूर्यकुंड सरोवर है। मान्यता है कि यहां अनेक संत महापुरुषों ने अपनी साधना की है। उत्तर भारत के वेद मर्मज्ञ विद्वान पंडित दशरथ शास्त्री ने भी यहां साधना की है।
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तीर्थ महात्म्य के अनुसार जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक इस तीर्थ में 8 दिनों तक उपवास एवं गंगा स्नान करता है, उसे अभीष्ट फल प्राप्त होता है। बताया जाता है कि वैशाख मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी को अंधकार के बीच सोमतीर्थ का स्थान दिखाई देता है। इस तीर्थ के प्रभाव से राजा सोमदत्त के वाण से आहत श्रंगाली ने अपने प्राणों को त्यागकर कांडक्षत देश के राजा की पुत्री के रूप में जन्म लिया। फिर पुन: यहां आकर निवास किया और मोक्ष को प्राप्त किया। सोमतीर्थ और सूर्य तीर्थ होने के प्रमाण पुराणों में वर्णित हैं। आज भी बड़ी संख्या में लोग इन पवित्र स्थानों में पहुंचकर पूजा, अर्चना, हवन आदि करके मनोवांछित फलों की कामना करते हैं।
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ज्योतिषाचार्यों की बात:
तीर्थनगरी के सूर्यकुंड में सूर्योदय के समय सबसे पहले सूरज की किरणें पड़ती हैं। उस समय इसमें स्नान करने से बल, बुद्धि, आरोग्य और तेज की प्राप्ति होती है। नगर को तीर्थस्थलों के नक्शे में शामिल करना आवश्यक है। - पं. गोपाल शास्त्री
वराह पुराण में इस तीर्थंनगरी के संबंध में तमाम प्रमाण मौजूद हैं। यह ऐसा तीर्थक्षेत्र है कि सूर्यदेव ने यहां तप किया वहीं पुत्र की कामना में मार्तंड ने यहां महान तप किया। इस तीर्थ का ऐसा प्रभाव है कि मनुष्य को यहां मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है। - पं. राहुल वशिष्ठ
सोरों सूकरक्षेत्र में सूर्यकुंड का पौराणिक एवं धार्मिक रूप से विशेष महत्व है। यह भगवान सूर्य की तपस्थली है। यहां साधना करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। नगर को तीर्थंनगरी का दर्जा मिलना बेहद आवश्यक है। - पं. चक्रधर द्विवेदी
सोरों सूकरक्षेत्र प्राचीन तीर्थ है। इस आदि तीर्थ की उपेक्षा सरकारों के द्वारा की जा रही है, जो गलत है। सरकार इन पौराणिक धरोहरों के विकास के लिए तीर्थस्थल घोषित करे। - पं. अम्बरीश निर्भय, ज्योतिषाचार्य